क्या आपने कभी सोचा है कि एक ऐसा लड़का, जो पढ़ना-लिखना तक नहीं जानता था, हिंदुस्तान का सबसे महान बादशाह कैसे बन गया? एक ऐसा शासक, जिसके नाम के आगे आज भी दुनिया ‘महान’ या ‘The Great’ लगाती है।
आज मैं आपको किसी राजा की सूखी और बेजान जीवनी नहीं, बल्कि एक कहानी सुनाने वाला हूँ। यह कहानी है उस 13 साल के लड़के ‘जलाल’ की, जिसके सिर पर काँटों भरा ताज रखा गया था, जब उसका साम्राज्य बस नाम का था। यह कहानी है उसके डर, संघर्ष और उस हिम्मत की, जिसने उसे जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर बना दिया।
तो चलिए, समय में पीछे चलते हैं और उस पल को जीते हैं, जब पंजाब के कलानौर के एक छोटे से बगीचे में, ईंटों के एक सिंहासन पर बैठाकर एक लड़के को हिंदुस्तान का शहंशाह घोषित कर दिया गया था।
काँटों भरा ताज और एक वफ़ादार संरक्षक
साल था 1556। बादशाह हुमायूँ की मौत की ख़बर से मुग़ल खेमे में मातम और डर का माहौल था। दुश्मन चारों तरफ़ से सिर उठा रहे थे और सबसे बड़ा ख़तरा था हेमू, एक शक्तिशाली हिन्दू सेनापति जो दिल्ली पर कब्ज़ा कर चुका था।
उस मुश्किल घड़ी में, हुमायूँ के सबसे वफ़ादार सेनापति, बैरम ख़ान ने एक बड़ा फ़ैसला लिया। उन्होंने 13 साल के जलालुद्दीन को ही बादशाह घोषित कर दिया।
कल्पना कीजिए उस लड़के की! जिसके खेलने-कूदने के दिन थे, उसके कंधों पर एक बिखरते हुए साम्राज्य को बचाने का बोझ डाल दिया गया था। बैरम ख़ान ने उसके पास आकर कहा, “शहंशाह, घबराने का वक़्त नहीं है। दिल्ली को वापस लेना होगा। हिंदुस्तान आपकी तरफ़ देख रहा है।”
नन्हे जलाल की आँखों में डर तो था, पर एक अजीब सी चमक भी थी। उसने सिर हिलाया। यहीं से महान अकबर का शासनकाल का पहला अध्याय शुरू हुआ, जो इतिहास की सबसे बड़ी लड़ाइयों में से एक, पानीपत की दूसरी लड़ाई की ओर बढ़ रहा था।
पानीपत की दूसरी लड़ाई: जब किस्मत ने दिया साथ
हेमू की सेना मुग़लों से कहीं ज़्यादा बड़ी और ताक़तवर थी। एक पल तो ऐसा लगा कि मुग़लों की हार तय है। लड़ाई के दौरान एक तीर सीधा हेमू की आँख में जा लगा और वह हाथी से गिर गया। बस, यही वो पल था जिसने पूरी लड़ाई का पासा पलट दिया।
हेमू की हार के साथ, अकबर के लिए दिल्ली के दरवाज़े खुल गए। यह सिर्फ़ एक जंग की जीत नहीं थी, यह एक लड़के के बादशाह बनने की शुरुआत थी। लेकिन असली चुनौती तो अब शुरू होनी थी।
क्या एक 13 साल का लड़का इतने बड़े हिंदुस्तान पर राज कर सकता था?
सिर्फ़ बादशाह नहीं, एक visionary का उदय
शुरुआती कुछ सालों तक, बैरम ख़ान ने ही एक संरक्षक के तौर पर शासन चलाया। लेकिन अकबर अब बड़ा हो रहा था। वह सिर्फ़ नाम का बादशाह बनकर नहीं रहना चाहता था। उसने धीरे-धीरे सत्ता अपने हाथों में ली और ऐसे फ़ैसले लेने शुरू किए, जिन्होंने सबको हैरान कर दिया।
अकबर समझ चुका था कि हिंदुस्तान जैसे विशाल और विविध देश पर सिर्फ़ तलवार के दम पर राज नहीं किया जा सकता। यहाँ दिलों को जीतना होगा।
अकबर की शासन व्यवस्था: कैसे साम्राज्य को एक सूत्र में पिरोया?
अकबर को पता था कि एक मज़बूत साम्राज्य के लिए एक बेहतरीन शासन व्यवस्था ज़रूरी है। उसने ऐसी नीतियाँ बनाईं जो आज भी मैनेजमेंट के छात्रों को पढ़ाई जाती हैं:
- मनसबदारी प्रथा: यह एक अनोखी प्रणाली थी। इसमें हर अधिकारी को उसकी योग्यता के अनुसार एक ‘मनसब’ (पद) दिया जाता था। इससे सेना और प्रशासन, दोनों को व्यवस्थित रखने में मदद मिली।
- ज़ब्ती प्रणाली: उसने ज़मीन की पैमाइश करवाई और उपज के आधार पर लगान तय किया। इससे किसानों को सुरक्षा मिली और राज्य की आय भी स्थिर हो गई।
- एक केंद्रीकृत सरकार: उसने पूरे साम्राज्य को सूबों (प्रांतों) में बाँटा और हर सूबे में एक सूबेदार नियुक्त किया, जो सीधे बादशाह को जवाबदेह था।
अकबर की धार्मिक नीति: दिलों को जीतने की कला
यह अकबर के शासन की सबसे बड़ी ख़ासियत थी। वह जानता था कि भारत में अलग-अलग धर्मों के लोग रहते हैं और अगर साम्राज्य को जोड़कर रखना है, तो सबको सम्मान देना होगा।
- जज़िया कर की समाप्ति: उसने हिंदुओं पर लगने वाले ‘जज़िया कर’ को हटा दिया। यह एक बहुत बड़ा क़दम था, जिसने उसे हिंदू प्रजा के बीच लोकप्रिय बना दिया।
- इबादत खाना: उसने फतेहपुर सीकरी में एक ‘इबादत खाना’ (प्रार्थना गृह) बनवाया, जहाँ वह सभी धर्मों (हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी, जैन) के गुरुओं को बुलाता और उनके साथ धर्म-दर्शन पर चर्चा करता था।
- दीन–ए–इलाही: इन सभी चर्चाओं के बाद, उसने एक नए विचार ‘दीन-ए-इलाही’ की शुरुआत की, जिसमें सभी धर्मों की अच्छी बातों का समावेश था। यह कोई नया धर्म नहीं था, बल्कि आपसी भाईचारे का एक संदेश था।
अकबर के नवरत्न: जब कला और ज्ञान का हुआ सम्मान
अकबर खुद तो पढ़ा-लिखा नहीं था, लेकिन वह ज्ञान और कला का बहुत बड़ा पारखी था। उसने अपने दरबार में एक से बढ़कर एक विद्वानों, कलाकारों और सलाहकारों को जगह दी, जिन्हें अकबर के नवरत्न के नाम से जाना जाता है।
सोचिए, कैसा रहा होगा वो दरबार जहाँ:
- अबुल फ़ज़ल जैसा विद्वान अकबर की जीवनी ‘अकबरनामा’ लिख रहा हो।
- तानसेन अपने संगीत से बादलों को बुलाने की ताक़त रखता हो।
- राजा बीरबल अपनी हाज़िरजवाबी से बादशाह का दिल जीत लेते हों।
- राजा टोडरमल जैसी आर्थिक प्रतिभा देश की लगान व्यवस्था बना रही हो।
यह नवरत्न ही अकबर की असली ताक़त थे, जिन्होंने उसके साम्राज्य को सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनाया।
अकबर के शासनकाल की बड़ी बातें (Benefits/Key Features)
अगर हम महान अकबर का शासनकाल को कुछ बिंदुओं में समझना चाहें, तो ये हैं वो बड़ी बातें:
- एक विशाल और मज़बूत साम्राज्य: उसने मुग़ल साम्राज्य का विस्तार लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में कर दिया।
- धार्मिक सहिष्णुता की मिसाल: उसने सभी धर्मों का सम्मान किया और एक सेक्युलर शासन की नींव रखी।
- कुशल प्रशासनिक व्यवस्था: उसकी बनाई हुई प्रशासनिक और राजस्व नीतियाँ आने वाली कई पीढ़ियों तक चलती रहीं।
- कला और साहित्य का स्वर्ण युग: उसके समय में वास्तुकला, चित्रकला, संगीत और साहित्य का अभूतपूर्व विकास हुआ।
- आम जनता की भलाई: उसने किसानों और आम लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए कई सुधार किए।
निष्कर्ष: सिर्फ़ एक शहंशाह नहीं, एक सोच का नाम है अकबर
अकबर की कहानी हमें सिखाती है कि महान बनने के लिए डिग्रियों की नहीं, बल्कि दूरदृष्टि, हिम्मत और सबको साथ लेकर चलने की भावना की ज़रूरत होती है। वह एक अनपढ़ लड़का था, लेकिन उसकी सीखने की ललक और खुले विचारों ने उसे ‘अकबर महान’ बना दिया।
उसका शासनकाल सिर्फ़ इमारतों और जीती हुई लड़ाइयों का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि जब कोई शासक अपनी प्रजा के दिलों पर राज करता है, तो इतिहास उसे सदियों तक याद रखता है।
तो अगली बार जब आप फतेहपुर सीकरी या आगरा के क़िले को देखें, तो उसे सिर्फ़ एक इमारत की तरह मत देखिएगा। याद कीजिएगा उस 13 साल के लड़के को, जिसने ईंटों के सिंहासन से शुरुआत करके हिंदुस्तान के दिल पर अपनी अमिट छाप छोड़ी।
अकबर के शासनकाल से जुड़े कुछ सवाल (FAQs)
1. अकबर को ‘महान’ क्यों कहा जाता है?
अकबर को उसकी धार्मिक सहिष्णुता की नीति, कुशल शासन प्रणाली, कला और साहित्य को दिए गए संरक्षण और एक विशाल साम्राज्य को सफलतापूर्वक चलाने की क्षमता के कारण ‘महान’ कहा जाता है।
2. अकबर के नवरत्न कौन थे?
अकबर के नवरत्न उसके दरबार के नौ सबसे प्रतिभाशाली लोग थे, जिनमें अबुल फ़ज़ल, फ़ैज़ी, तानसेन, बीरबल, राजा टोडरमल, राजा मान सिंह, अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ाना, फ़क़ीर अज़ुद्दीन और मुल्ला दो प्याज़ा शामिल थे।
3. दीन-ए-इलाही क्या था?
दीन-ए-इलाही अकबर द्वारा शुरू किया गया एक नैतिक और दार्शनिक विचार था, जिसमें सभी धर्मों की अच्छी बातों, जैसे- शांति, एकता और ईश्वर के प्रति आस्था, को शामिल किया गया था। इसका उद्देश्य साम्राज्य में धार्मिक एकता स्थापित करना था।
4. अकबर की मनसबदारी व्यवस्था क्या थी?
यह अकबर की प्रशासनिक प्रणाली का आधार थी, जिसमें अधिकारियों को उनकी योग्यता के अनुसार पद (मनसब) और वेतन दिया जाता था। इसके बदले में, उन्हें बादशाह के लिए एक निश्चित संख्या में सैनिक और घुड़सवार रखने पड़ते थे।
5. अकबर ने भारत पर कितने समय तक शासन किया?
अकबर ने 1556 से लेकर 1605 तक, लगभग 49 वर्षों तक हिंदुस्तान पर शासन किया, जो मुग़ल काल के सबसे लंबे और सबसे सफल शासनकालों में से एक है।