क्या आपने कभी सोचा है कि जब चारों तरफ़ निराशा हो, जब हर दरवाज़ा बंद नज़र आए और भविष्य अंधकारमय लगे, तो उम्मीद की एक किरण कहाँ से आती है?
शायद हम सबने कभी न कभी अपनी ज़िंदगी में ऐसे पल महसूस किए हैं। वो पल, जब लगता है कि अब कुछ भी ठीक नहीं हो सकता। आज मैं आपको एक ऐसी ही रात की कहानी सुनाने वाली हूँ। यह कहानी है मथुरा की एक अँधेरी जेल की, एक अत्याचारी राजा के डर की, और एक असहाय माता-पिता की आँखों में पल रही उम्मीद की।
यह कृष्ण का जन्म की कहानी है। यह सिर्फ़ एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि इस बात का जीवंत प्रमाण है कि जब पाप और अन्याय अपने चरम पर होता है, तो ईश्वर स्वयं किसी न किसी रूप में जन्म लेते हैं। तो चलिए, मेरे साथ चलिए समय के उस पार, द्वापर युग की उस तूफ़ानी रात में, जब इतिहास हमेशा के लिए बदलने वाला था।
मथुरा का क्रूर राजा और एक दिल दहला देने वाली भविष्यवाणी
कहानी शुरू होती है मथुरा के शक्तिशाली राजा कंस से। कंस कोई साधारण राजा नहीं था। वह अपनी ताक़त के नशे में चूर था, इतना कि उसे न तो इंसानों की परवाह थी और न ही देवताओं का डर। उसकी एक छोटी और प्यारी बहन थी, देवकी, जिसे वह अपनी जान से भी ज़्यादा चाहता था।
देवकी के विवाह का दिन था। चारों तरफ़ उत्सव का माहौल था। कंस ने अपनी बहन का विवाह यदुवंशी राजकुमार वासुदेव से बड़ी धूमधाम से करवाया। जब विदाई का समय आया, तो कंस खुद रथ हाँककर अपनी बहन को ससुराल छोड़ने जाने लगा। उसका बहन के प्रति प्रेम देखकर सभी देवता भी फूलों की वर्षा कर रहे थे।
तभी अचानक… आसमान में ज़ोर से बिजली कड़की और एक गूंजती हुई आवाज़ सुनाई दी। वह एक आकाशवाणी थी!
“हे मूर्ख कंस! जिस बहन को तू इतने प्यार से विदा कर रहा है, उसी की आठवीं संतान तेरा काल बनेगी!”
बस, इतना सुनना था कि कंस का सारा प्यार पल भर में गायब हो गया। उसकी आँखों में प्रेम की जगह मौत का ख़ौफ़ उतर आया। जिस हाथ से वह रथ की लगाम पकड़े था, उसी हाथ से उसने तलवार निकाल ली और देवकी के बाल पकड़कर उसे मारने के लिए तैयार हो गया।
वासुदेव ने हाथ जोड़कर विनती की, “राजन! यह आप क्या कर रहे हैं? देवकी तो आपकी बहन है। एक स्त्री को मारने से आपको क्या मिलेगा? आपको तो उसकी संतान से भय है, देवकी से नहीं।”
कंस का क्रोध शांत नहीं हुआ। तब वासुदेव ने उसे एक वचन दिया, “मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि देवकी की हर संतान को जन्म लेते ही मैं तुम्हें सौंप दूँगा। तुम उसे मार देना, पर देवकी को छोड़ दो।”
कंस जानता था कि वासुदेव कभी अपना वचन नहीं तोड़ेंगे। उसने यह बात मान ली, लेकिन एक शर्त पर। उसने देवकी और वासुदेव, दोनों को मथुरा के सबसे सुरक्षित कारागार में डाल दिया।
सोचिए, एक पल पहले जो बहन अपने भाई के प्यार के साए में विदा हो रही थी, अगले ही पल वह अपने पति के साथ मौत की कोठरी में क़ैद थी। क्या ज़िंदगी ऐसे ही नहीं बदलती?
कारागार का अँधेरा और सात मासूमों की हत्या
अब देवकी और वासुदेव का जीवन उस जेल की अँधेरी दीवारों में सिमट गया था। समय बीतता गया। जैसे ही देवकी ने अपनी पहली संतान को जन्म दिया, वासुदेव अपना वचन निभाने के लिए उस नन्हे से शिशु को लेकर कंस के पास पहुँचे।
कंस ने उस मासूम बच्चे को देखा और हँसने लगा। उसने कहा, “मुझे तो आठवें से ख़तरा है, पहले से नहीं।” लेकिन तभी नारद मुनि वहाँ प्रकट हुए और उन्होंने कंस को समझाया कि देवताओं की माया कोई नहीं जानता, हो सकता है आठवाँ पहला हो या पहला आठवाँ।
डर से काँपते हुए कंस ने उस नवजात शिशु को वासुदेव के हाथों से छीना और उसे पत्थर पर पटककर मार डाला।
यह दृश्य देखकर देवकी और वासुदेव का दिल फट गया। कल्पना कीजिए, उस माता-पिता पर क्या बीत रही होगी, जिनकी आँखों के सामने उनकी अपनी संतान की हत्या कर दी गई?
यह सिलसिला रुका नहीं। एक-एक करके देवकी की सात संतानें हुईं और कंस ने उन सभी को बेरहमी से मार डाला। सातवीं संतान के समय, भगवान की माया से देवकी का गर्भ रोहिणी (वासुदेव की दूसरी पत्नी) के गर्भ में स्थानांतरित हो गया, जिनसे बलराम का जन्म हुआ। लेकिन कंस को यही लगा कि सातवाँ गर्भ नष्ट हो गया है।
कारागार में निराशा और दुःख का ऐसा घना अँधेरा छा गया था, जिसकी कोई सुबह नज़र नहीं आ रही थी। देवकी और वासुदेव हर दिन रोते और भगवान से पूछते, “हे प्रभु! यह कैसा न्याय है? हमारे बच्चे जन्म लेते ही काल का ग्रास बन जाते हैं।”
वो चमत्कारी रात: जब प्रकृति भी उत्सव मना रही थी
अब समय आ गया था देवकी की आठवीं संतान का। भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि। आधी रात का समय था और रोहिणी नक्षत्र चमक रहा था।
उस रात मथुरा में कुछ अजीब हो रहा था। आसमान में काले बादल छाए हुए थे, ज़ोर-ज़ोर से बिजलियाँ कड़क रही थीं और मूसलाधार बारिश हो रही थी, मानो प्रकृति कंस के पापों पर अपना क्रोध प्रकट कर रही हो।
लेकिन जेल के अंदर का माहौल बिल्कुल अलग था। उस अँधेरी कोठरी में अचानक एक दिव्य प्रकाश फैल गया। देवकी और वासुदेव की आँखें उस तेज से चौंधिया गईं। उन्होंने देखा कि उनके सामने स्वयं भगवान विष्णु अपने चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए हैं, जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म थे।
भगवान ने मुस्कुराते हुए कहा, “हे माता देवकी, हे पिता वासुदेव! मैं आपका पुत्र बनकर आया हूँ। अब आपके दुःखों का अंत करने का समय आ गया है।”
यह देखकर दोनों के आँसू बह निकले। वे समझ गए कि यह कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं जगत के पालनहार हैं।
भगवान ने आगे निर्देश दिया, “पिताश्री, आप मुझे अभी इसी समय गोकुल में नंद बाबा और यशोदा मैया के पास ले चलिए। वहाँ यशोदा मैया ने एक कन्या को जन्म दिया है। आप मुझे वहाँ रखकर उस कन्या को यहाँ ले आइए।“
वासुदेव हैरान थे! जेल के दरवाज़े बंद थे, चारों तरफ़ पहरेदार थे, और बाहर उफनती हुई यमुना नदी थी। यह कैसे संभव था?
यमुना का उफान और शेषनाग की छाया: एक पिता की परीक्षा
जैसे ही वासुदेव ने उस दिव्य बालक को एक टोकरी में रखा, चमत्कार होने लगे।
- उनके हाथों और पैरों में बंधी लोहे की बेड़ियाँ अपने आप टूटकर गिर गईं।
- जेल के भारी-भरकम दरवाज़े अपने आप खुलते चले गए।
- सभी पहरेदार गहरी नींद में सो गए, जैसे किसी ने उन पर कोई माया कर दी हो।
वासुदेव बिना किसी रोक-टोक के जेल से बाहर निकल आए। कृष्ण जन्म की रात का रहस्य अब धीरे-धीरे खुल रहा था।
लेकिन सबसे बड़ी चुनौती अभी बाकी थी। सामने उफनती हुई यमुना नदी थी। बारिश के कारण नदी का बहाव बहुत तेज़ था और लहरें आसमान छूने को बेताब थीं। वासुदेव एक पल के लिए घबरा गए।
क्या यह सिर्फ़ एक चमत्कार था या उनके विश्वास की असली परीक्षा?
उन्होंने अपनी आँखों में अटूट विश्वास भरा, भगवान का नाम लिया और नदी में अपने क़दम बढ़ा दिए। जैसे ही वे पानी में उतरे, एक और अद्भुत चमत्कार हुआ। जैसे ही टोकरी में लेटे नन्हे कान्हा के पैर का अँगूठा नदी के जल से छुआ, उफनती हुई यमुना शांत होने लगी और दो भागों में बँट गई, जिससे बीच में एक सूखा रास्ता बन गया।
इतना ही नहीं, बारिश से बच्चे की रक्षा के लिए स्वयं शेषनाग ने अपने हज़ार फनों की छतरी बना ली और वासुदेव के पीछे-पीछे चलने लगे। यह दृश्य अद्भुत था। एक पिता अपने पुत्र के जीवन के लिए प्रकृति की हर चुनौती से लड़ रहा था और स्वयं प्रकृति और परमात्मा उसकी मदद कर रहे थे।
गोकुल में आगमन और लीला का आरम्भ
यमुना पार करके वासुदेव गोकुल पहुँचे। वहाँ नंद बाबा के घर में भी सब कुछ शांत था। सभी लोग गहरी नींद में सोए हुए थे। उन्होंने देखा कि माता यशोदा के पास एक नन्ही सी कन्या सो रही है। यह कोई और नहीं, बल्कि स्वयं योगमाया थीं।
वासुदेव ने धीरे से अपने पुत्र को यशोदा के पास लिटा दिया और उस कन्या को उठाकर वापस मथुरा की ओर चल पड़े।
जैसे ही वे जेल में वापस पहुँचे, सब कुछ पहले जैसा हो गया। दरवाज़े अपने आप बंद हो गए, उनकी बेड़ियाँ फिर से लग गईं और वह कन्या ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी।
बच्ची के रोने की आवाज़ सुनकर पहरेदार जाग गए और उन्होंने तुरंत कंस को ख़बर दी। कंस भागता हुआ आया। उसने सोचा, “मेरा काल आ गया!”
उसने बच्ची को देवकी के हाथों से छीन लिया। देवकी रोते हुए गिड़गिड़ाने लगी, “भैया, यह तो एक कन्या है। इससे तुम्हें क्या भय? आकाशवाणी तो पुत्र के लिए हुई थी।”
लेकिन कंस ने एक न सुनी। जैसे ही उसने उस कन्या को पत्थर पर पटकने के लिए उठाया, वह उसके हाथ से छूटकर हवा में उड़ गई और अपने असली देवी रूप में प्रकट हो गई।
देवी ने गरजते हुए कहा, “रे मूर्ख कंस! मुझे मारकर तुझे क्या मिलेगा? तेरा काल तो गोकुल में पहुँच चुका है और जल्द ही वह तेरा अंत करेगा!”
यह कहकर देवी अंतर्धान हो गईं। अब कंस का डर सौ गुना बढ़ गया। उसे समझ आ गया था कि देवकी और वासुदेव के आठवें पुत्र ने जन्म ले लिया है और उसकी मौत निश्चित है।
और इस तरह, भगवान कृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ, लेकिन उनका बचपन गोकुल में बीता, जहाँ उन्होंने अपनी बाल लीलाओं से सभी का मन मोह लिया और आगे चलकर कंस के अत्याचारों का अंत किया।
श्री कृष्ण जन्म कथा से हमें क्या सीखना चाहिए?
कृष्ण का जन्म सिर्फ़ एक कहानी नहीं है, यह जीवन जीने का एक दर्शन है। इस कथा से हमें कई गहरी बातें सीखने को मिलती हैं:
अंधकार के बाद उजाला निश्चित है
देवकी और वासुदेव ने वर्षों तक जेल के अँधेरे में असहनीय कष्ट सहे, लेकिन उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में चाहे कितना भी घना अँधेरा क्यों न हो, अगर हम धैर्य और विश्वास बनाए रखें, तो उम्मीद का सवेरा ज़रूर होता है।
विश्वास में सबसे बड़ी शक्ति है
उफनती यमुना को पार करना वासुदेव के लिए असंभव था, लेकिन भगवान पर उनके अटूट विश्वास ने उस असंभव को भी संभव बना दिया। यह हमें सिखाता है कि अगर हमारे मन में सच्चा विश्वास हो, तो हम जीवन की सबसे बड़ी मुश्किलों को भी पार कर सकते हैं।
अहंकार का अंत निश्चित है
कंस अपनी ताक़त और सत्ता के अहंकार में अँधा हो गया था। उसे लगता था कि वह किसी को भी मार सकता है और उसे कोई नहीं हरा सकता। लेकिन अंत में उसी अहंकार ने उसका विनाश किया। यह एक शाश्वत सत्य है कि अहंकार का हमेशा पतन होता है।
ईश्वर हमेशा सही समय पर मदद करते हैं
भगवान ने देवकी की आठवीं संतान के रूप में ही जन्म क्यों लिया? क्योंकि वे हमें सिखाना चाहते थे कि जब अन्याय और अधर्म अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है, तब वे धर्म की स्थापना के लिए अवश्य आते हैं। हमें बस उन पर भरोसा रखना होता है।
निष्कर्ष: सिर्फ एक कहानी नहीं, जीवन जीने की प्रेरणा
कृष्ण का जन्म की कथा हमें बताती है कि भगवान महलों में नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में जन्म लेते हैं—एक जेल की कोठरी में। यह इस बात का प्रतीक है कि दिव्यता कहीं भी, किसी भी क्षण प्रकट हो सकती है, खासकर तब जब हमें उसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है।
यह कहानी आशा, विश्वास और प्रेम की कहानी है। यह हमें याद दिलाती है कि हर रात के बाद सुबह होती है और हर तूफ़ान के बाद शांति आती है।
तो अगली बार जब आपकी ज़िंदगी में कोई मुश्किल आए, जब आपको लगे कि आप चारों तरफ़ से घिर गए हैं, तो मथुरा की उस तूफ़ानी रात को याद कर लेना। याद करना कि कैसे एक पिता अपने पुत्र को बचाने के लिए उफनती नदी में उतर गया था। और विश्वास रखना, आपकी रक्षा के लिए भी कोई कान्हा ज़रूर आएगा।
जय श्री कृष्ण!
कृष्ण जन्म से जुड़े कुछ ज़रूरी सवाल (FAQs)
1. श्री कृष्ण का जन्म कब और कहाँ हुआ था? श्री कृष्ण का जन्म द्वापर युग में भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में, मथुरा के कारागार में हुआ था। आज इस दिन को हम जन्माष्टमी के त्योहार के रूप में मनाते हैं।
2. देवकी और वासुदेव के आठवें पुत्र का क्या रहस्य था? आकाशवाणी के अनुसार, देवकी और वासुदेव का आठवाँ पुत्र ही कंस का वध करने वाला था। यह आठवाँ पुत्र कोई और नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु के अवतार थे, जिन्होंने धर्म की पुनर्स्थापना और पृथ्वी को कंस के अत्याचार से मुक्त कराने के लिए जन्म लिया था।
3. कृष्ण जन्म की रात को क्या–क्या चमत्कार हुए थे? उस रात कई चमत्कार हुए, जैसे- जेल के ताले और बेड़ियाँ अपने आप खुल जाना, सभी पहरेदारों का सो जाना, उफनती यमुना नदी का वासुदेव को रास्ता देना, और शेषनाग का कृष्ण को बारिश से बचाने के लिए फन फैलाना।
4. हम जन्माष्टमी का त्योहार क्यों मनाते हैं? हम जन्माष्टमी का त्योहार भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्री कृष्ण के जन्मदिन के उपलक्ष्य में मनाते हैं। यह त्योहार हमें सिखाता है कि बुराई चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंत में जीत हमेशा अच्छाई और धर्म की ही होती है। यह दिन आशा, भक्ति और आनंद का प्रतीक है।
5. कंस ने देवकी के सात बच्चों को क्यों मारा था? एक आकाशवाणी ने कंस को चेतावनी दी थी कि देवकी की आठवीं संतान उसकी मृत्यु का कारण बनेगी। इस डर से, कंस ने देवकी की हर संतान को जन्म लेते ही मारना शुरू कर दिया ताकि उसका काल पैदा ही न हो सके।