क्या आपने कभी सोचा है कि एक वनस्पति तेल बेचने वाली छोटी-सी कंपनी, एक दिन दुनिया की सबसे बड़ी IT कंपनियों में गिनी जाएगी?
और वो भी तब, जब उसे संभालने वाला इंसान महज़ 21 साल का हो, पढ़ाई अधूरी छोड़कर आया हो, और उसके सामने हर तरफ से मुश्किलें खड़ी हों?
यह कहानी है अज़ीम हाशिम प्रेमजी की — वो इंसान, जिसने न सिर्फ Wipro को एक साधारण कंपनी से अरबों डॉलर के साम्राज्य में बदला, बल्कि अपनी दौलत का बड़ा हिस्सा देश के बच्चों की शिक्षा के लिए दान कर दिया। एक ऐसा इंसान, जो भारत के सबसे अमीर लोगों में शुमार होने के बावजूद आज भी सादगी से जीता है — पुरानी कार में चलता है, सस्ते होटल में रुकता है, और बचे हुए खाने को फेंकने से मना करता है।
चलिए, आज इस अद्भुत इंसान की कहानी शुरू करते हैं…
एक लड़का, एक खबर, और एक ज़िम्मेदारी
साल था 1966।
स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी, अमेरिका में अज़ीम प्रेमजी इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे। ज़िंदगी अच्छी चल रही थी। सपने थे, आगे बढ़ने की चाहत थी।
तभी एक दिन एक फोन आया।
उनके पिता मोहम्मद हाशिम प्रेमजी का अचानक निधन हो गया था।
घर पर उनकी कंपनी थी — Western India Vegetable Products Limited। यानी वनस्पति तेल, साबुन और बेकरी फैट बनाने का कारोबार। कंपनी चल तो रही थी, लेकिन उसे संभालने वाला कोई नहीं था।
अज़ीम की उम्र थी सिर्फ 21 साल।
बहुत लोगों ने सलाह दी — “पढ़ाई पूरी करो, कंपनी बेच दो, आगे का सोचो।” लेकिन अज़ीम ने कुछ और सोचा। उन्होंने अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ी, भारत लौटे, और उस कंपनी की कमान अपने हाथों में थाम ली।
यह एक फैसला था, जो इतिहास बदलने वाला था।
वो दिन जब वनस्पति तेल से बड़ा सपना जागा
शुरुआत के कुछ साल बेहद मुश्किल थे।
कंपनी छोटी थी। मुकाबला बड़ा था। Hindustan Lever जैसी दिग्गज कंपनियाँ बाज़ार पर राज कर रही थीं। लेकिन अज़ीम ने हार नहीं मानी। उन्होंने कंपनी में नई जान फूँकी — नए प्रोडक्ट लाए, मार्केटिंग बदली, टीम को मज़बूत किया।
धीरे-धीरे कंपनी बढ़ने लगी।
लेकिन अज़ीम की नज़र हमेशा आगे रहती थी। वो सिर्फ तेल और साबुन तक रुकने वाले नहीं थे।
1970 और 80 का दशक भारत में बदलाव का दौर था। दुनिया में एक नई क्रांति आ रही थी — Computer और Technology की क्रांति।
अज़ीम ने देखा कि भारत में IT सेक्टर अभी बिल्कुल नया-नया था। बड़ी विदेशी कंपनियाँ जैसे IBM, भारत छोड़ रही थीं। यह एक बड़ा मौका था।
और उन्होंने वो मौका भुना लिया।
1981 में उन्होंने अपनी कंपनी का नाम बदला — Wipro Limited। और उसे IT की दुनिया में उतार दिया।
Wipro का जन्म — जब तेल की कंपनी बन गई टेक कंपनी
यह कदम उस दौर में बेहद साहसी था।
लोग हँसे। कहा — “तेल बेचने वाले क्या IT जानेंगे?” लेकिन अज़ीम को भरोसा था — इंसान की काबिलियत पर, सही टीम बनाने पर, और मेहनत की ताकत पर।
Wipro ने पहले hardware बनाया, फिर software में कदम रखा। धीरे-धीरे कंपनी ने IT services, consulting और outsourcing में अपनी जगह बनाई।
अज़ीम की सबसे बड़ी खासियत थी — सही लोगों को चुनना और उन पर भरोसा करना।
उन्होंने कभी अकड़ नहीं दिखाई। हमेशा सीखते रहे। अपने कर्मचारियों की बात सुनी। और जब ज़रूरत पड़ी, तो खुद को भी बदला।
1990 के दशक में जब भारत ने आर्थिक उदारीकरण अपनाया, Wipro उड़ान भर चुकी थी। अमेरिकी बाज़ार में उसकी धूम मच गई। दुनिया के बड़े-बड़े ब्रांड्स Wipro की सर्विसेज़ लेने लगे।
वो छोटी-सी वनस्पति तेल कंपनी अब अरबों डॉलर की IT कंपनी बन चुकी थी।
वो आदमी जो अमीर होकर भी ज़मीन पर रहा
यहाँ कहानी एक मोड़ लेती है।
जब Wipro दुनिया की नज़रों में आई, तो अज़ीम प्रेमजी भारत के सबसे अमीर लोगों में गिने जाने लगे। Forbes की लिस्ट में उनका नाम आने लगा। दुनिया उन्हें “भारत का IT किंग” कहने लगी।
लेकिन अज़ीम नहीं बदले।
उनके बारे में मशहूर है कि वो आज भी —
- पुरानी टोयोटा कार में चलते हैं
- होटल में सबसे सस्ता कमरा बुक करते हैं
- खाने की बर्बादी से सख्त नफरत करते हैं
- Business meetings में Economy class में उड़ते हैं
एक बार एक कर्मचारी ने बताया — “सर ने meeting के बाद बचे बिस्कुट खुद उठाए और बोले — इन्हें फेंको मत, इसमें किसी की मेहनत है।”
यही है अज़ीम प्रेमजी की असली पहचान।
वो दान जिसने दुनिया को चौंका दिया
2019 में अज़ीम प्रेमजी ने एक ऐलान किया जिसने पूरी दुनिया को हिला दिया।
उन्होंने अपनी कुल संपत्ति का ⅔ से ज़्यादा हिस्सा — यानी करीब 53,000 करोड़ रुपये — दान करने का फैसला किया।
यह दान था Azim Premji Foundation के लिए — जो भारत के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की शिक्षा के लिए काम करता है।
उन्होंने कहा — “यह पैसा मेरा नहीं था। यह उन लोगों का था जिन्होंने मुझ पर भरोसा किया — मेरे कर्मचारी, मेरे ग्राहक, और यह देश।”
आज Azim Premji Foundation हज़ारों सरकारी स्कूलों में काम करता है। लाखों बच्चों की ज़िंदगी बेहतर हो रही है। शिक्षकों को ट्रेनिंग मिल रही है।
और इस सबके पीछे है — एक 21 साल के लड़के का वो फैसला, जो उसने अपने पिता की मौत के बाद लिया था।
अज़ीम प्रेमजी की कहानी से हम क्या सीख सकते हैं?
- मुश्किल वक्त में भागो नहीं, सामना करो: अज़ीम ने 21 साल में अपनी पढ़ाई छोड़कर कंपनी संभाली। मुश्किल को मौके में बदला।
- बदलाव से डरो नहीं, उसे गले लगाओ: तेल कंपनी को IT में बदलना पागलपन लग सकता था, लेकिन वो दूरदर्शिता थी। सही समय पर सही बदलाव ज़िंदगी पलट देता है।
- सादगी सबसे बड़ी ताकत है: अरबों की दौलत होने के बावजूद सादा जीवन जीना — यही उनकी असली पहचान है। दिखावा नहीं, काम बोलता है।
- सही टीम ही असली दौलत है: अज़ीम ने हमेशा लोगों पर भरोसा किया, उन्हें मौके दिए। Wipro की तरक्की अकेले उनकी नहीं — उनकी पूरी टीम की है।
- दौलत तब सार्थक होती है जब वो वापस समाज को मिले: उनका दान सिर्फ पैसा नहीं — एक सोच है। एक ज़िम्मेदारी है जो हर सफल इंसान को निभानी चाहिए।
अज़ीम प्रेमजी की यह कहानी सिर्फ एक बिज़नेसमैन की सफलता की कहानी नहीं है। यह एक इंसान की कहानी है — जिसने मुश्किल में हार नहीं मानी, बदलाव से डरा नहीं, दौलत में इंसानियत नहीं भूला।
अगर कभी ज़िंदगी भारी लगे, रास्ता न दिखे, या लगे कि “मेरे पास इतने resources नहीं हैं” — तो याद करना उस 21 साल के लड़के को, जिसके पास सिर्फ एक अधूरी पढ़ाई और एक छोटी-सी तेल कंपनी थी।
और उसने दुनिया बदल दी।
क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा मोड़ आया है जब आपको सब छोड़कर एक बड़ा फैसला लेना पड़ा? नीचे कमेंट में ज़रूर बताइए — आपकी कहानी भी किसी की प्रेरणा बन सकती है।
अज़ीम प्रेमजी से जुड़े कुछ सवाल
Q: अज़ीम प्रेमजी कौन हैं और उन्होंने Wipro कैसे बनाई?
अज़ीम प्रेमजी Wipro के संस्थापक-अध्यक्ष हैं। 1966 में अपने पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने मात्र 21 साल की उम्र में कंपनी की बागडोर संभाली और धीरे-धीरे इसे वनस्पति तेल से IT सेवाओं की दिग्गज कंपनी में बदल दिया।
Q: Wipro का पुराना नाम क्या था और वो IT कंपनी कैसे बनी?
Wipro का पुराना नाम था Western India Vegetable Products Limited। 1981 में अज़ीम प्रेमजी ने कंपनी का नाम बदलकर Wipro रखा और इसे IT व software की दुनिया में उतारा, जो उस समय भारत में नया क्षेत्र था।
Q: अज़ीम प्रेमजी ने कितना दान दिया है?
अज़ीम प्रेमजी ने अपनी संपत्ति का दो-तिहाई से अधिक हिस्सा — करीब 53,000 करोड़ रुपये — Azim Premji Foundation को दान किया है। यह भारत के इतिहास का सबसे बड़े व्यक्तिगत दानों में से एक है।
Q: अज़ीम प्रेमजी इतने सादा जीवन क्यों जीते हैं?
अज़ीम प्रेमजी का मानना है कि दौलत दिखावे के लिए नहीं, काम के लिए होती है। वो हमेशा पुरानी कार में चलते हैं, Economy class में उड़ते हैं और खाने की बर्बादी से सख्त परहेज़ करते हैं — क्योंकि उनके लिए सादगी ही असली अमीरी है।
Q: अज़ीम प्रेमजी Foundation क्या काम करती है?
Azim Premji Foundation भारत के सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए काम करती है। यह हज़ारों सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को प्रशिक्षण देती है और लाखों बच्चों की ज़िंदगी बेहतर बनाने में जुटी है।