Biography

नारायण मूर्ति की कहानी: ₹10,000 से ₹6 लाख करोड़ की Infosys — एक सपने की असली उड़ान

Rajhussain Kanani · 02-April-2026 8 min read
नारायण मूर्ति की कहानी: ₹10,000 से ₹6 लाख करोड़ की Infosys — एक सपने की असली उड़ान

क्या आपने कभी सोचा है कि ₹10,000 उधार लेकर कोई ₹6 लाख करोड़ की कंपनी खड़ी कर सकता है?

और वो भी तब, जब देश में Internet नहीं था, Computer एक विदेशी सपने जैसा था, और हर तरफ यही कहा जाता था — “सरकारी नौकरी मिल जाए तो बस, ज़िंदगी सेट है।”

लेकिन एक शख्स ऐसा था जिसने उस ज़माने में भी यकीन किया — कि भारत की बुद्धि दुनिया को बदल सकती है। उस शख्स का नाम था नागवार रामाराव नारायण मूर्ति। और उनकी कहानी आज भी लाखों युवाओं के दिलों में एक दीया जलाती है।

चलिए, आज की कहानी शुरू करते हैं — उस सफर की, जो ₹10,000 के उधार से शुरू होकर भारत की सबसे बड़ी IT क्रांति बन गई।


एक साधारण घर, असाधारण सपने

सन् 1946। कर्नाटक के शिदलाघट्टा में एक मध्यमवर्गीय परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ। घर में पैसों की कमी थी, लेकिन किताबों की नहीं।

पिता श्री रामाराव एक स्कूल टीचर थे। माँ विमलादेवी — घर की धुरी। आठ भाई-बहनों के बीच नारायण को बचपन से ही पढ़ाई का ऐसा चस्का लगा जो कभी छूटा नहीं।

उन्होंने National Institute of Engineering, Mysore से Electrical Engineering की। फिर IIT Kanpur से Post-Graduation। IIT के दिनों में कुछ ऐसा हुआ जिसने उनकी सोच की दिशा हमेशा के लिए बदल दी।

IIT में उन्होंने पहली बार Computer देखा।

बस — उसी पल उनके मन में कुछ जल उठा।

“यही है वो औज़ार जो भारत को बदल सकता है।”


वो सफर जिसने दिल खोल दिया — Paris से Patna तक

IIT के बाद नारायण मूर्ति Paris के एक software company में काम करने गए। वहाँ उन्होंने दुनिया को करीब से देखा।

लेकिन एक घटना ने उनके दिल पर गहरा असर डाला।

वापसी में वो Bulgaria और Yugoslavia के रास्ते ट्रेन से लौट रहे थे। Yugoslavia के एक छोटे से स्टेशन Nis पर उन्हें एक लड़की मिली — बातें हुईं, दोस्ती हुई। लेकिन वहाँ के एक ने किसी को शक हुआ। Police ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

72 घंटे। एक अँधेरी कोठरी। न खाना, न पानी, न कोई खबर।

उस कोठरी में अकेले बैठकर नारायण मूर्ति ने एक सवाल से मुठभेड़ की — “मैं कौन हूँ? मुझे क्या चाहिए? मेरे देश के लिए मेरी जिम्मेदारी क्या है?”

जब वो छूटे, तो वो बदल चुके थे।

उन्होंने ठान लिया — भारत लौटकर कुछ ऐसा बनाऊँगा जो देश को गर्व दे।


₹10,000, 7 दोस्त और एक बड़ा सपना

सन् 1981

नारायण मूर्ति ने अपनी पत्नी सुधा मूर्ति से ₹10,000 उधार माँगे। सुधा जी ने बिना एक सवाल किए वो पैसे दे दिए।

उस दिन शायद सुधा मूर्ति को भी नहीं पता था कि ये ₹10,000 एक दिन इतिहास बनेंगे।

6 और दोस्त साथ आए — Nandan Nilekani, S. Gopalakrishnan, S.D. Shibulal, K. Dinesh, N.S. Raghunathan, और Ashok Arora।

7 लोग। एक सपना। एक नाम — Infosys.

“हम भारत में software बनाएँगे और दुनिया को बेचेंगे।”

लेकिन रास्ता आसान नहीं था।


संघर्ष की वो रातें जो दिन नहीं बनती थीं

शुरुआत Pune के एक छोटे से घर से हुई। नारायण मूर्ति का घर ही Office था। पत्नी Receptionist थीं। वही खाना बनातीं, वही फोन उठातीं।

उस ज़माने में भारत में Software Export के लिए License लेना पड़ता था। एक License के लिए सरकारी दफ्तर के चक्कर लगाते-लगाते डेढ़ साल बीत गए।

एक बार तो ऐसी नौबत आई कि Infosys को बेचने की भी बात उठी। कुछ Partners निराश हो गए थे।

लेकिन नारायण मूर्ति डटे रहे।

उनका एक वाक्य था — “अगर हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा? और अगर अभी नहीं तो कब?”

धीरे-धीरे एक Client आई। फिर दूसरी। फिर America से पहला बड़ा Order।

और Infosys की गाड़ी चल पड़ी।


1993 — वो साल जब सब कुछ बदल गया

1993 में Infosys का IPO आया। पहली बार कंपनी Stock Market में उतरी।

लेकिन नारायण मूर्ति ने कुछ ऐसा किया जो उस वक्त बहुत कम Businessmen करते थे।

उन्होंने अपने Employees को Shares दिए।

उनकी सोच थी — “अगर कंपनी बढ़ती है तो उसमें काम करने वाले हर इंसान को उसका हिस्सा मिलना चाहिए।”

इस एक फैसले ने Infosys के सैकड़ों कर्मचारियों को Crorepati बना दिया।

एक Driver, एक Peon — सभी को Shares मिले थे। और जब Company बड़ी हुई, तो वो सब भी बड़े हुए।

यह था नारायण मूर्ति का असली फलसफा“Wealth creation that is legal, ethical and moral.”


भारत को IT महाशक्ति बनाने की नींव

2000 के दशक तक Infosys का नाम दुनियाभर में गूँजने लगा।

New York, London, Tokyo — हर जगह Infosys के Offices।

Nasdaq पर Listing। Forbes की दुनिया के सबसे सम्मानित Businessmen की लिस्ट में नाम।

लेकिन इससे भी बड़ी बात —

Infosys ने साबित किया कि भारतीय दिमाग दुनिया के सबसे जटिल Software Problems सुलझा सकता है।

और उस एक साबित करने से एक लहर उठी — जिसने Wipro, TCS, HCL, Tech Mahindra सबको उठाया। पूरे Bengaluru को “Silicon Valley of India” बना दिया।

नारायण मूर्ति ने सिर्फ एक कंपनी नहीं बनाई — उन्होंने एक Industry खड़ी की।


सादगी जो दिल छू जाए

दुनिया के उन चंद अरबपतियों में से एक, जो सुबह खुद कपड़े धोते थे।

जब Infosys का Headquarters बन रहा था, तब एक किस्सा मशहूर है — नारायण मूर्ति को किसी ने देखा कि वो Office की बत्तियाँ खुद बुझा रहे थे, जो कर्मचारी जाते वक्त भूल गए थे।

“बिजली का पैसा कंपनी का है। कंपनी का पैसा कर्मचारियों का है।”

उनकी पत्नी सुधा मूर्ति अपनी साड़ी खुद धोती थीं। घर में कोई नाटकीय ठाठ-बाट नहीं।

उनके बच्चों को विरासत में पैसे नहीं मिले — मेहनत और नैतिकता का पाठ मिला।

यही नारायण मूर्ति थे।


नारायण मूर्ति की कहानी से हम क्या सीख सकते हैं?

  • छोटी शुरुआत से डरो मत: ₹10,000 से ₹6 लाख करोड़ का सफर बताता है कि शुरुआत की रकम नहीं, इरादे की ताकत मायने रखती है।
  • ईमानदारी ही असली Brand है: नारायण मूर्ति ने कभी Shortcut नहीं लिया। उनकी नैतिकता ही Infosys की सबसे बड़ी पहचान बनी।
  • कठिन वक्त में भी डटे रहो: 72 घंटे की कैद हो, या Licenses का डेढ़ साल का इंतज़ार — उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
  • अपने लोगों को ऊपर उठाओ: Employees को Shares देने का फैसला बताता है कि सच्चा Leader वो होता है जो अपनी Success दूसरों के साथ बाँटता है।
  • सादगी सबसे बड़ी ताकत है: अरबपति होने के बावजूद ज़मीन से जुड़े रहना — यही उनकी असली विरासत है।

जब भी आपको लगे कि आपके पास Resources नहीं हैं, Capital नहीं है, Connections नहीं हैं — तो एक बार नारायण मूर्ति की कहानी याद कर लीजिए।

एक इंसान था जिसके पास था — बस एक सपना, एक पत्नी का भरोसा, और अपने देश के लिए कुछ कर गुज़रने की ज़िद।

बाकी सब उसी ज़िद ने बनाया।

क्या आपके मन में भी कोई ऐसा सपना है जो आपने Resources की कमी की वजह से रोक रखा है? नीचे Comment में ज़रूर बताइए — शायद आपकी बात किसी और के लिए प्रेरणा बन जाए।


नारायण मूर्ति और Infosys से जुड़े कुछ सवाल

Q: नारायण मूर्ति ने Infosys कितने पैसों से शुरू की थी?
नारायण मूर्ति ने Infosys की शुरुआत 1981 में अपनी पत्नी सुधा मूर्ति से उधार लिए ₹10,000 से की थी। 6 और दोस्तों के साथ मिलकर उन्होंने यह कंपनी Pune में शुरू की।

Q: Infosys के को-फाउंडर्स कौन-कौन थे?
Infosys के 7 को-फाउंडर्स थे — नारायण मूर्ति, Nandan Nilekani, S. Gopalakrishnan (Kris), S.D. Shibulal, K. Dinesh, N.S. Raghunathan और Ashok Arora। यह टीम भारतीय IT इतिहास की सबसे प्रसिद्ध टीमों में से एक है।

Q: नारायण मूर्ति की पत्नी कौन हैं और उनकी कहानी क्या है?
नारायण मूर्ति की पत्नी सुधा मूर्ति हैं, जो खुद एक प्रसिद्ध लेखिका और समाजसेवी हैं। उन्होंने Infosys की शुरुआत के लिए ₹10,000 दिए थे और कंपनी की पहली Receptionist भी वही थीं। बाद में उन्होंने Infosys Foundation की स्थापना की।

Q: Infosys का IPO कब आया था और उसका क्या असर हुआ?
Infosys का IPO 1993 में आया था। इस IPO में कंपनी ने अपने कर्मचारियों को भी Shares दिए, जिससे सैकड़ों लोग Crorepati बन गए। यह भारत में Employee Stock Option का एक ऐतिहासिक उदाहरण बना।

Q: नारायण मूर्ति को भारत में IT के पिता क्यों कहा जाता है?
नारायण मूर्ति ने साबित किया कि भारतीय Engineers दुनिया के सबसे जटिल Software बना सकते हैं। Infosys की सफलता ने पूरी एक IT Industry को प्रेरित किया, Bengaluru को “Silicon Valley of India” बनाया, और लाखों युवाओं के लिए IT Career का रास्ता खोला। इसीलिए उन्हें “Father of Indian IT Industry” भी कहा जाता है।

Share:
WhatsApp Facebook Twitter Telegram