जंगल की वो पगडंडी इतनी संकरी थी कि दो आदमी कंधे से कंधा मिलाकर नहीं चल सकते थे — और उस दिन उस पर एक बूढ़ा वानर आड़ा लेटा हुआ था, ठीक बीच में, जैसे उसे किसी बात की जल्दी ही न हो।
भीम रुके। सुगंधित पुष्प की तलाश में निकले थे, द्रौपदी के लिए, और अब रास्ते में यह बूढ़ा बंदर पड़ा था — कमज़ोर, झुर्रीदार, आँखें बंद किए, मानो सदियों से वहीं पड़ा हो।
“पूँछ हटा दो, वानर!” — भीम की पहली गलती
“हे वानर,” भीम की आवाज़ में वो गूंज थी जो हज़ार हाथियों को डरा देती थी, “अपनी पूँछ हटा लो, मुझे आगे जाना है।”
बूढ़े वानर ने आँखें खोले बिना कहा, “मैं बूढ़ा हूँ, बेटा। बुढ़ापे ने पैरों में जान नहीं छोड़ी। तुम खुद ही हटा दो न, ज़रा सी तो पूँछ है।”
भीम मुस्कुराए। एक हल्की सी मुस्कान, जो किसी को हल्का समझने पर आती है। उन्होंने गदा नीचे रखी, झुके, और बिना ज़्यादा सोचे उस पूँछ पर हाथ रख दिया — वैसे ही, जैसे कोई रास्ते से एक सूखी टहनी हटाता है।
पूँछ नहीं हिली।
जब हाथ काँपने लगे
भीम ने दोबारा कोशिश की। इस बार दोनों हाथों से। उनकी बाँहों की नसें उभर आईं, वही बाँहें जिन्होंने बकासुर को चीर डाला था, जिन्होंने हिडिंब को पल भर में ज़मीन पर पटक दिया था।
पूँछ टस से मस नहीं हुई।
पसीना भीम के माथे से टपकने लगा। उन्होंने चारों ओर देखा — कोई देख तो नहीं रहा? फिर पूरी ताकत लगाई, वो ताकत जो उन्होंने कभी किसी युद्ध में भी पूरी नहीं लगाई थी। पैर ज़मीन में धँस गए, दाँत भिंच गए।
पूँछ वहीं की वहीं रही, हल्की सी भी नहीं हिली, जैसे वह किसी पहाड़ की जड़ से जुड़ी हो।
भीम रुक गए। साँसें भारी। और पहली बार, उनके भीतर एक अनजाना डर उठा — यह वानर है कौन?
हनुमान और भीम की कहानी का वो मोड़ जो कोई नहीं जानता
भीम घुटनों के बल बैठ गए। गर्व वहीं ज़मीन पर बिखर गया था, उस पूँछ के पास ही। उन्होंने धीरे से पूछा, “आप कौन हैं, हे वानरराज? मुझसे भूल हुई।”
बूढ़े वानर ने आँखें खोलीं — और वे आँखें अब बूढ़ी नहीं लगीं। उनमें एक आग थी, हज़ार सूर्यों जितनी शांत और गहरी।
“मैं हनुमान हूँ,” उसने कहा, “पवनपुत्र। तुम भी तो पवन के ही पुत्र हो, भीम — फिर यह घमंड किस बात का, कि एक बूढ़े वानर की पूँछ भी तुम्हें भारी लगे?”
भीम की आँखें फैल गईं। वो नाम जो हर बालक ने सुना था, रामायण की हर कथा में जिसकी शक्ति की चर्चा होती थी — वो नाम अब उनके सामने, इस टूटी हुई पगडंडी पर, साक्षात बैठा था।
घमंड टूटा, भाई मिला
हनुमान अपने असली रूप में उठे — पर्वत जैसा कद, आकाश छूती पूँछ, और चेहरे पर वही मुस्कान जो एक बड़ा भाई छोटे को माफ़ करते समय देता है।
“तुम्हारी ताकत सच्ची है, भीम,” उन्होंने कहा, “पर हर ताकत के आगे एक और ताकत होती है। इसे याद रखना — युद्धभूमि में भी, और शांति में भी।”
भीम ने सिर झुकाया। दो युग वहाँ एक पल के लिए मिल गए थे — त्रेता का वानर और द्वापर का पांडव, एक ही पिता की संतान, एक ही हवा से जन्मे। और जो घमंड भीम अपने साथ लेकर आए थे, वो उसी पगडंडी पर छूट गया, उस पूँछ के पास, जो कभी हिली ही नहीं थी।
लौटते समय भीम का कदम पहले से हल्का था। गदा वही थी, ताकत वही थी — पर अब उसके साथ एक बात और चल रही थी, जो पहले कभी नहीं थी।
