सुषेण वैद्य की आवाज़ में कंपन था। लक्ष्मण की साँसें उथली होती जा रही थीं, और उनका चेहरा उस रंग का हो चला था जिसे किसी माँ ने कभी अपने बेटे पर नहीं देखना चाहा।
“सूर्योदय से पहले बूटी चाहिए,” सुषेण ने कहा, “वरना यह प्रतीक्षा ही आखिरी हो जाएगी।”
राम कुछ नहीं बोले। उन्होंने बस हनुमान की ओर देखा। और हनुमान ने उत्तर में कुछ नहीं कहा — वे उठे, और आकाश की ओर उड़ चले।
आकाश में एक पर्वत
रास्ता हिमालय तक था, द्रोणागिरि तक, जहाँ संजीवनी उगती थी। रावण को खबर लगी, और उसने कालनेमी को भेजा — एक ऋषि के भेष में, स्नान और भोजन के प्रलोभन के साथ, ताकि समय बीत जाए और सूर्य निकल आए। हनुमान ने उसे पहचान लिया, उसका छल तोड़ा, और आगे बढ़े।
पर्वत पर पहुँचकर उन्हें एक बात समझ आई — असंख्य बूटियों में वे संजीवनी को अलग से नहीं पहचान सकते थे। समय था नहीं, चुनाव करने का साहस भी नहीं बचा था। तो उन्होंने वह किया जो कोई और नहीं कर सकता था — पूरा पर्वत ही उठा लिया। जड़ों समेत, मिट्टी समेत, रात के अंधेरे समेत।
अब वे लौट रहे थे। भारी। थके। पर लौट रहे थे।
नंदीग्राम के ऊपर एक साया
अयोध्या से कुछ दूर, नंदीग्राम में, भरत चौदह वर्षों से एक तपस्वी का जीवन जी रहे थे — राम के लौटने की प्रतीक्षा में, उन्हीं की खड़ाऊं को सिंहासन पर रखकर राज्य चला रहे थे। उस रात उनकी तपस्या का तेज असाधारण था।
आकाश में उन्होंने एक विशाल आकृति देखी — एक पर्वत ढोता हुआ कोई विराट प्राणी, तेज़ी से नगर की ओर बढ़ता हुआ। भरत के मन में एक ही विचार कौंधा: कोई राक्षस, कोई विनाश, कोई खतरा जो अयोध्या पर मंडरा रहा है।
उन्होंने धनुष उठाया।
राम-राम कहकर गिरना
तीर चला। और जिस क्षण वह हनुमान को लगा, उनके मुख से जो शब्द निकले वे किसी शिकायत के नहीं थे — “राम… राम…” — और वे मूर्छित होकर गिर पड़े। पर्वत सहित।
भरत दौड़े। पास आकर देखा तो चौंक गए — यह कोई राक्षस नहीं था। एक वानर था, मूर्छित, फिर भी उसके होंठों पर वही एक नाम अटका हुआ था जिसके लिए भरत ने अपना पूरा जीवन तप में बिता दिया था। भरत ने उसे जगाने की कोशिश की। हिलाया। पुकारा। हनुमान नहीं उठे।
सूर्योदय पास था। लक्ष्मण की साँसें और उथली हो चुकी होंगी, यह भरत को पता नहीं था — पर उस मूर्छित शरीर को देखकर उन्हें कुछ और समझ आ गया: यह चूक उन्हीं की थी, और इसकी कीमत शायद कोई और चुका रहा है, कहीं दूर।
भरत की भक्ति ने जगाया
तब भरत ने कहा, “यदि राम के प्रति मेरी भक्ति में कोई खोट नहीं, तो यह राम-सेवक अभी उठ बैठे।”
और हनुमान की आँखें खुल गईं।
कोई मंत्र नहीं था इसमें, कोई औषधि नहीं। केवल एक वचन, कहा हुआ सच्चे मन से। हनुमान उठे, भरत को प्रणाम किया, और बिना एक पल गँवाए फिर आकाश में उठ गए — पर्वत सहित, नाम सहित, समय के आखिरी कतरे सहित।
सूर्य की पहली किरण अभी क्षितिज पर ठिठकी ही थी जब वे लंका पहुँचे। सुषेण ने बूटी पहचानी, लक्ष्मण की साँसें गहरी हुईं, और युद्धभूमि में एक सन्नाटा टूटा जो सुबह की सबसे मीठी आवाज़ में बदल गया।
पर उस रात जो सचमुच हुआ था, वह यह था — हनुमान अपने लक्ष्य के सबसे करीब तब पहुँचे, जब वे अपने ही पक्ष के हाथों गिर चुके थे। और उठे तब, जब किसी और के मन में उनके नाम पर भरोसा जागा।
इस कथा से जुड़े सवाल
भरत ने हनुमान पर बाण क्यों चलाया था? भरत ने आकाश में पर्वत उठाए एक विशाल आकृति देखी और उसे राक्षस समझ बैठे। यह पहचान की भूल थी, इरादे की नहीं।
सुषेण वैद्य कौन थे? सुषेण लंका के एक वैद्य थे, जो रावण के पक्ष में होते हुए भी धर्म और चिकित्सा-ज्ञान के कारण लक्ष्मण के इलाज में सहायक बने और उन्होंने ही संजीवनी बूटी की पहचान बताई थी।
संजीवनी बूटी किस पर्वत पर थी? कथाओं के अनुसार यह हिमालय के द्रोणागिरि पर्वत पर स्थित थी, जिसे हनुमान जी समय की कमी के कारण जड़ से पूरा उठा लाए थे।
