मद्रास से उड़ान भरते वक़्त उसे लगा था कि अमेरिका गरम होगा। फ़िल्मों में तो हमेशा धूप रहती थी। किसी ने उसे नहीं बताया था कि कनेक्टिकट में अक्टूबर का मतलब है हड्डियों तक उतरती हवा, और हवा का मतलब है एक ऐसा कोट जो उसके पास नहीं था।
उसकी जेब में पचास डॉलर थे। पूरे पचास। उससे ज़्यादा एक भी नहीं।
येल का कैंपस उसने ब्रोशर में देखा था — पत्थर की पुरानी इमारतें, लोहे के फाटक, वो हरियाली जो किसी अंग्रेज़ी उपन्यास से निकली लगती थी। पर ब्रोशर ने ये नहीं बताया था कि वहाँ खड़ा होकर एक इक्कीस साल की मद्रासी लड़की को कैसा लगेगा — जैसे वो किसी दूसरे ग्रह पर उतर आई हो, जहाँ की भाषा वो बोल तो लेती थी पर समझ नहीं पाती थी।
पहली रात वो हॉस्टल के कमरे में बैठी रही। बाहर बर्फ़ नहीं थी, अभी नहीं, पर हवा ऐसी थी कि लगता था बर्फ़ कहीं पास ही इंतज़ार कर रही है। उसने अपने सूटकेस से एक स्वेटर निकाला — माँ ने मद्रास में रखवाया था, “वहाँ ठंड लगेगी बेटा” — और उसे ओढ़कर बैठ गई।
घर पर अभी सुबह होगी। माँ रसोई में होगी, कॉफ़ी की महक होगी, पिताजी अख़बार पढ़ रहे होंगे। और यहाँ — यहाँ सिर्फ़ एक अजनबी कमरे की दीवारें थीं और एक लड़की जो सोच रही थी कि उसने सब छोड़कर आकर ग़लती तो नहीं कर दी।
मद्रास की वो डिग्री, जिस पर वो कभी गर्व करती थी, यहाँ किसी को मतलब नहीं रखती थी। “मद्रास?” लोग पूछते। “वो… इंडिया में है ना?” जैसे वो किसी ऐसी जगह से आई हो जिसका नाम भी मुश्किल से किसी ने सुना हो।
स्कॉलरशिप मिली थी, सही बात है। पर स्कॉलरशिप किताबें ख़रीद देती थी, फ़ीस का बड़ा हिस्सा भर देती थी — रोटी का इंतज़ाम नहीं करती थी। और इंदिरा को रोटी भी चाहिए थी, और किराया भी, और कभी-कभी एक कप कॉफ़ी भी जो उसे रात-रात भर पढ़ते रहने में मदद करती।
तो उसने रात की नौकरी पकड़ ली।
रिसेप्शनिस्ट की। रात की पाली। आधी रात से सुबह तक एक डेस्क के पीछे बैठकर फ़ोन उठाना, रजिस्टर भरना, उन घंटों में जब बाक़ी दुनिया सो रही होती थी।
उन रातों में दफ़्तर ख़ाली रहता था। बस वो थी, एक टेबल लैंप की पीली रोशनी, और किताबों का ढेर जो उसने डेस्क पर रख छोड़ा था। फ़ोन कम ही बजता। तो वो पढ़ती रहती — अकाउंटिंग, स्ट्रैटेजी, मार्केटिंग — आँखें जलने लगतीं तो थोड़ी देर के लिए माथा टेबल पर टिका लेती।
कभी-कभी सफ़ाई करने वाले लोग आते। उनसे वो हल्की-सी मुस्कान बाँट लेती। वो भी रात में काम करते थे, वो भी कहीं और से आए थे, वो भी इस नींद-भरी दुनिया में जागे हुए लोग थे। एक तरह का चुपचाप भाईचारा था उनके बीच — बिना ज़्यादा बात किए।
सुबह जब वो डेस्क छोड़ती, तो आँखें भारी होतीं और कमर अकड़ी हुई होती। फिर सीधा क्लास। प्रोफ़ेसर बोलते रहते और इंदिरा अपनी पलकों को खुला रखने की लड़ाई लड़ती रहती। पर वो हार नहीं मानती। वो हार मान ही नहीं सकती थी। पीछे लौटने का कोई रास्ता उसने अपने लिए छोड़ा ही नहीं था।
दो साल ऐसे ही बीते।
दो साल जिसमें उसने सीखा कि अकेलापन कैसा होता है, ठंड कैसी होती है, और वो भूख कैसी होती है जो पेट की नहीं, अपनेपन की होती है। उसने सीखा कि “साबित करना” एक पूरा-वक़्त का काम है — हर क्लास में, हर बातचीत में, हर बार जब कोई उसके लहजे पर एक पल को रुकता।
और फिर आख़िरी साल आया। और उसके साथ आईं वो चीज़ें जिनका इंतज़ार हर मैनेजमेंट स्टूडेंट करता है — कैंपस इंटरव्यू। बड़ी-बड़ी कंपनियाँ आतीं, बड़े-बड़े नाम।
इंदिरा को एक इंटरव्यू मिला। एक कंसल्टिंग फ़र्म में।
और उसे एक समस्या थी जो उसके किसी अमेरिकी सहपाठी को कभी समझ नहीं आती — उसके पास पहनने को कुछ नहीं था।
अमेरिका में नौकरी के इंटरव्यू का एक उसूल था जो किसी ने उसे किताब में नहीं पढ़ाया, पर सबको पता था : सूट पहनो। एक ढंग का, पेशेवर सूट। ऐसा सूट जो कहे — “मैं इस दुनिया से हूँ, मुझे यहाँ का तौर-तरीक़ा आता है।”
इंदिरा के पास ऐसा सूट नहीं था। और उसके पास उतने पैसे भी नहीं थे कि वो ढंग का सूट ख़रीद सके।
उसने अपनी बचत गिनी। पचास डॉलर। वही पचास डॉलर जो शायद उसी रकम के आसपास घूमते रहे थे जब से वो यहाँ आई थी — जैसे वो संख्या उसका पीछा कर रही हो।
वो एक दुकान में गई। पचास डॉलर में जो सबसे अच्छा मिल सकता था, उसने ख़रीदा — गहरे नीले रंग का एक पॉलिएस्टर सूट, दो बटन वाला जैकेट, और उसके साथ की पैंट। एक फ़िरोज़ी रंग की ब्लाउज़ भी, जिस पर हल्की धारियाँ थीं।
दुकान में ट्रायल रूम था। पर इंदिरा ने कभी ट्रायल रूम इस्तेमाल नहीं किया था — मद्रास में साड़ी या सलवार के लिए ट्रायल रूम की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी। उसे झिझक हुई। उसने सोचा, घर जाकर पहन लूँगी, ठीक ही होगा।
ठीक नहीं था।
इंटरव्यू के दिन उसने वो सूट पहना और आईने में ख़ुद को देखा।
ब्लाउज़ तो ठीक थी। पर पैंट — पैंट उसकी सोच से कहीं ज़्यादा छोटी निकली, टख़नों से ऊपर रुकती हुई। और जैकेट — जैकेट उसके कंधों पर अटका हुआ-सा लटक रहा था, जैसे किसी और के लिए बना हो और ग़लती से उस तक पहुँच गया हो।
वो जानती थी कि ये ग़लत लग रहा है। वो जानती थी।
पर अब वक़्त नहीं था। इंटरव्यू था। वो गई।
और जब वो उस कमरे में दाख़िल हुई, तो उसने वो देखा जिसका उसे डर था। नज़रें। एक पल की ख़ामोशी। कुछ चेहरों पर वो हल्की-सी हरकत जो लोग तब करते हैं जब वो हँसना नहीं चाहते पर हँसी रोक भी नहीं पाते।
इंदिरा ने पीठ सीधी रखी। उसने ऐसे बैठने की कोशिश की जैसे उसे कुछ महसूस ही न हो रहा हो। उसने इंटरव्यू दिया — और इंटरव्यू अच्छा गया, उसे पता था कि उसने सवालों के जवाब ढंग से दिए हैं। उसका दिमाग़ कभी धोखा नहीं देता था।
पर जब वो उस कमरे से बाहर निकली, तो उसका दिमाग़ नहीं, उसका दिल था जो टूट रहा था।
वो सीधी अपनी करियर काउंसलर के पास गई। जेन। येल में जो छात्रों को नौकरी ढूँढने में मदद करती थी।
और जेन के सामने पहुँचते ही इंदिरा का वो सारा ज़ब्त बिखर गया जो वो इंटरव्यू भर सँभाले रही थी। वो रो पड़ी।
सारी बात कह दी। पचास डॉलर का सूट। छोटी पैंट। लटकता जैकेट। वो नज़रें। वो दबी हुई हँसी। वो एहसास कि वो उस कमरे में सबसे ज़्यादा बेगानी थी, सबसे ज़्यादा अलग।
जेन ने उसे रोने दिया। फिर उसने एक सवाल पूछा — एक ऐसा सवाल जिसने इंदिरा की पूरी सोच पलट दी।
“अगर तुम इंडिया में होतीं,” जेन ने पूछा, “और तुम्हें इंटरव्यू देने जाना होता — तो तुम क्या पहनतीं?”
इंदिरा ने बिना सोचे जवाब दिया।
“साड़ी।”
जेन थोड़ी देर चुप रही।
फिर बोली : “तो अगली बार साड़ी पहनकर जाओ।”
इंदिरा ने उसे देखा, जैसे उसने ठीक से सुना न हो।
“जो तुम हो, वो बनकर जाओ,” जेन ने कहा। “तुम्हारी असली पहचान के साथ। अगर इसके बाद भी कोई कंपनी तुम्हें नौकरी नहीं देती — तो वो नुक़सान उनका है, तुम्हारा नहीं।”
अगली बार उसके पास एक और इंटरव्यू था। एक और कंसल्टिंग फ़र्म।
और इस बार इंदिरा ने वो पॉलिएस्टर का सूट कहीं अंदर रख दिया।
उसने अपनी सबसे प्यारी साड़ी निकाली — फ़िरोज़ी रंग की रेशमी साड़ी, जिस पर क्रीम रंग के फूल थे। वही साड़ी जिसे पहनकर वो ख़ुद को सबसे ज़्यादा अपने जैसा महसूस करती थी। उसने उसे पहना, आईने में ख़ुद को देखा, और पहली बार कई हफ़्तों में उसे आईने में कोई अजनबी नहीं, बल्कि वो ख़ुद दिखी।
वो साड़ी पहनकर इंटरव्यू देने गई।
मद्रास की एक लड़की, छह गज़ रेशम में लिपटी, अमेरिका के एक दफ़्तर में, एक ऐसी दुनिया में दाख़िल हो रही थी जहाँ उसके जैसा कोई नहीं दिखता था।
और इस बार वो किसी और बनने की कोशिश नहीं कर रही थी।
उस दिन के बाद इंदिरा कृष्णमूर्ति बहुत आगे गई। बहुत, बहुत आगे — इतनी आगे कि उसका नाम दुनिया के सबसे बड़े दफ़्तरों में गूँजने लगा, इतनी आगे कि लोग उसकी कहानी किताबों में लिखने लगे।
पर वो कहानी किसी और दिन की है।
ये कहानी सिर्फ़ उस लड़की की है जिसने पचास डॉलर लेकर एक ऐसी ज़मीन पर क़दम रखा जहाँ कोई उसका इंतज़ार नहीं कर रहा था। जो रातभर एक डेस्क के पीछे जागती रही ताकि दिन में पढ़ सके। जिसने एक छोटी पैंट और एक लटकते जैकेट में अपनी सबसे बड़ी हार झेली — और फिर एक रेशमी साड़ी में अपनी पहचान वापस पाई।
दरवाज़े तक पहुँचना ही पूरी लड़ाई थी।
बाक़ी सब, उस दरवाज़े के पार, बाद की बात है।