जंगल की मिट्टी नम थी, और बारह साल की मीरा के कंधे पर लकड़ी का गट्ठर उसके अपने वज़न से भारी लग रहा था। सोलह साल का भाई सनातोम्बा आगे-आगे था, हांफता हुआ, गट्ठर बार-बार कंधे से फिसल रहा था। मीरा ने कुछ नहीं कहा। उसने बस झुककर गट्ठर उठाया, कमर सीधी की, और चल पड़ी — जैसे यह उसके लिए कोई मेहनत ही न हो।
घर पहुंचकर किसी ने इसे कोई बड़ी बात नहीं समझा। मणिपुर के नोंगपोक काकचिंग गांव में हर बच्चा जंगल से लकड़ी लाता था। लेकिन उस दिन एक बात बदल गई थी — परिवार ने पहली बार देखा कि इस लड़की के भीतर कुछ ऐसा है जो बाकियों में नहीं।
जंगल की लड़की और एक अधूरा तीर
मीरा तीरंदाज़ बनना चाहती थी। साफ़-सुथरा खेल, बिना धूल-मिट्टी के — यही उसे पसंद था। एक दिन वो इम्फाल के खुमान लम्पक स्टेडियम गई, तीरंदाज़ी सीखने। उस दिन कोई तीरंदाज़ी सत्र नहीं था। पास के हॉल में कुछ लड़कियां बारबेल उठा रही थीं। मीरा दरवाज़े पर खड़ी होकर देखती रही। किसी ने उसे अंदर बुलाया नहीं, किसी ने कुछ कहा नहीं — बस वो लोहे की आवाज़, वो सांस रोककर उठाने का तरीका, कुछ था जो उसे बांध गया।
अगले दिन वो फिर वहीं थी।
रोज़ इम्फाल पहुंचने के लिए चालीस किलोमीटर का सफर था। कभी बस, कभी ट्रक पर लिफ्ट। घर में पैसे नहीं थे तो शुरुआत बांस के डंडों से हुई — असली बारबेल छह महीने बाद नसीब हुई। कोच अनीता चानू ने उसे सिखाया, फिर विजय शर्मा ने। हर दिन वही रास्ता, वही थकान, वही उठक-बैठक। कोई तालियां नहीं बज रही थीं तब।
टोक्यो की वो चांदी जो सोने से भारी लगी
2016 में रियो गई तो एक भी क्लीन-एंड-जर्क पूरी नहीं कर पाई। खाली हाथ लौटी, और कुछ महीनों तक लगा कि यहीं खत्म हो गया सफर। कुछ रातें ऐसी थीं जब उसने खुद से पूछा — क्या यह लायक है, यह लोहा, यह दर्द?
पांच साल बाद, टोक्यो में, वही सवाल फिर सामने था। 49 किलो वर्ग का मंच, और उसके हाथ कांप नहीं रहे थे। स्नैच, फिर क्लीन-एंड-जर्क — बारबेल ऊपर गई, रुकी, और नीचे आई। स्कोरबोर्ड पर चांदी का रंग चमका।
रजत पदक। कर्णम मल्लेश्वरी के बाद भारत की दूसरी ओलंपिक पदक विजेता वेटलिफ्टर। लेकिन जिस पल मेडल उसके गले में पड़ा, मीरा की आंखों में जो नमी थी, वो सिर्फ जीत की नहीं थी — वो उस बारह साल की लड़की के लिए भी थी, जिसने जंगल से गट्ठर उठाया था और किसी को पता नहीं चला था कि यह कहां तक ले जाएगा।
मीराबाई चानू की कहानी का वो अधूरा पन्ना
तीन साल बाद, हांगझोऊ में एशियन गेम्स हुए। मीरा वहां थी, पूरी तैयारी के साथ। लेकिन बारबेल ने उस दिन साथ नहीं दिया — वो चौथे स्थान पर रह गई। कूल्हे की चोट, और पदकों की उस दीवार में एक खाली जगह जो अब भी वैसी ही थी।
ओलंपिक, कॉमनवेल्थ, वर्ल्ड चैंपियनशिप — हर जगह उसका नाम पदकों की सूची में था। सिवाय एशियन गेम्स के। यह अकेला मेडल था जो उसके पूरे करियर में गायब था, और जितना समय बीतता गया, यह खालीपन उतना ही बड़ा होता गया — जैसे कोई किताब जिसका आख़िरी अध्याय हमेशा के लिए अधूरा रह गया हो।
2026 में उसे वज़न श्रेणी फिर बदलनी पड़ी। ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए 48 किलो में उतरी और तीसरा लगातार गोल्ड जीता — इतिहास रचते हुए। लेकिन जश्न लंबा नहीं चला। दो महीने के भीतर उसे 49 किलो में वापस लौटना था, नागोया के लिए।
जापान की तैयारी में एक वादा
“जब तक एशियन गेम्स में मेडल नहीं जीत लेती, घर नहीं जाऊंगी,” उसने कहा था — मणिपुर के उस्ही गांव के बारे में, जहां से यह सफर शुरू हुआ था।
अब हर गुरुवार वो अपने अमेरिकी कोच से वीडियो कॉल पर बात करती है। हर मांसपेशी, हर रिकवरी, हर अगला कदम — सब कुछ बारीकी से परखा जाता है। बत्तीस साल की उम्र में, जब बाकी एथलीट सोचने लगते हैं कि अब बहुत हो गया, मीरा खुद से एक और सवाल पूछती है — क्या अभी और बाकी है?
सितंबर में जब वो टोकाई सिटीज़न्स जिम्नेज़ियम के मंच पर खड़ी होगी, तो सामने वही बारबेल होगी जो हमेशा से थी। लेकिन उसके भीतर अब भी वही लड़की है, जिसने जंगल में एक गट्ठर उठाया था जो उसके भाई से भी नहीं उठा — और चुपचाप चलती चली गई, बिना यह जाने कि यह उसे कितनी दूर ले जाएगा।
इस कहानी से जुड़े सवाल
मीराबाई चानू ने ओलंपिक में कौन सा पदक जीता है?
मीराबाई चानू ने टोक्यो 2020 ओलंपिक में महिलाओं की 49 किलो वेटलिफ्टिंग स्पर्धा में रजत पदक जीता था। यह कर्णम मल्लेश्वरी के बाद भारत की किसी महिला वेटलिफ्टर का दूसरा ओलंपिक पदक था।
मीराबाई चानू एशियन गेम्स में कब खेलेंगी?
मीराबाई चानू एशियन गेम्स 2026 (आइची-नागोया, जापान) में महिलाओं की 49 किलो श्रेणी में हिस्सा लेंगी। वेटलिफ्टिंग स्पर्धा 22 से 28 सितंबर के बीच होगी। यह उनके करियर का एकमात्र बड़ा पदक है जो अभी तक उनके पास नहीं है।
मीराबाई चानू का बचपन कैसा था?
मीराबाई चानू का जन्म मणिपुर के नोंगपोक काकचिंग गांव में हुआ था। बारह साल की उम्र में जंगल से लकड़ी का भारी गट्ठर उठाकर घर लाने की घटना ने पहली बार उनकी असाधारण शारीरिक ताकत को सामने लाया, जिसके बाद उन्होंने वेटलिफ्टिंग की दुनिया में कदम रखा।
