अयोध्या के राजदरबार में उस दिन हँसी रुक नहीं रही थी। चंद्रहास नाम का एक युवा दरबारी सबसे आगे बैठा था, और उसकी हँसी सबसे ऊँची थी। सामने खड़े थे हनुमान जी — सिर से पाँव तक गाढ़े नारंगी सिंदूर में डूबे हुए, जैसे किसी ने उन्हें आग के रंग में रंग दिया हो। यही हनुमान जी सिंदूर की कहानी है, जो श्रीराम के राज्याभिषेक की सुबह शुरू होती है और एक दरबारी की शर्म पर जाकर ठहरती है।
सुबह जब हनुमान जी माता सीता के कक्ष के बाहर से गुज़रे थे, तो उन्होंने देखा — माँ अपनी माँग में हल्का-सा सिंदूर लगा रही थीं। उत्सुकता हनुमान जी का स्वभाव थी। उन्होंने पूछा, “माँ, यह लाल रंग आप क्यों लगाती हैं?”
सीता जी मुस्कुराईं। “यह मेरे सुहाग का चिह्न है, हनुमान। जब तक यह मेरी माँग में है, प्रभु राम की आयु लंबी रहेगी, उनका स्वास्थ्य अच्छा रहेगा।”
हनुमान जी वहीं खड़े रह गए। उनके मन में एक ही विचार घूमता रहा — अगर चुटकी भर सिंदूर से प्रभु को इतना लाभ होता है, तो पूरे शरीर पर लगाने से उनकी आयु न जाने कितनी बढ़ जाएगी। यह गणित किसी शास्त्र से नहीं, एक भक्त के मन से निकला था।
जब पूरा शरीर सिंदूर में डूब गया
हनुमान जी सीधे भंडार गृह गए। वहाँ रखा सारा सिंदूर उन्होंने उठाया — मुट्ठियों में भरकर, पूरे शरीर पर मलना शुरू कर दिया। हाथ, पाँव, चेहरा, पूँछ — कुछ भी नहीं बचा। जब वे बाहर निकले, तो उनका रूप देखकर रास्ते में खड़े सेवक ठिठक गए। किसी ने हँसी दबाई, किसी ने आँखें फेर लीं। हनुमान जी को इसकी परवाह नहीं थी। वे सीधे राजसभा की ओर चल पड़े, जहाँ थोड़ी देर में श्रीराम का राज्याभिषेक होना था।
राज्याभिषेक की सभा में उठी हँसी
सभा भरी हुई थी। मंत्री, ऋषि, नगरवासी — सब अपने स्थान पर बैठे प्रतीक्षा कर रहे थे। तभी द्वार से हनुमान जी अंदर आए, और सभा में सन्नाटा टूटकर हँसी में बदल गया।
चंद्रहास सबसे पहले हँसा। वह नया-नया दरबार में आया था, अभी भक्ति और भक्त के फ़र्क को पूरी तरह समझा नहीं था। उसे लगा — यह कैसा वानरराज है, जो अपने शरीर को इस तरह रंग बैठा है, मानो कोई उत्सव का मसखरा हो। उसने बगल बैठे मंत्री की कोहनी छुई और फुसफुसाया, “देखिए तो, कैसा दिखते हैं।” मंत्री ने भी मुस्कान दबाई नहीं।
हँसी फैलती गई। कोई खुलकर हँसा, कोई मुँह पर हाथ रखकर। हनुमान जी सभा के बीचोंबीच खड़े थे, सिंदूर से लथपथ, और चारों ओर से हँसी की लहरें उठ रही थीं। उनके चेहरे पर न शर्म थी, न क्रोध — सिर्फ वही शांत भाव, जो एक भक्त के चेहरे पर तब होता है जब वह किसी और चीज़ के बारे में सोच रहा होता है।
श्रीराम ने अपने आसन से यह देखा। उन्होंने हाथ उठाकर सभा को शांत किया और पूछा, “हनुमान, यह क्या रूप है तुम्हारा?”
हनुमान जी ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, “प्रभु, माता सीता ने आज माँग में सिंदूर लगाया, यह कहकर कि इससे आपकी आयु बढ़ेगी। सोचा, मैं पूरे शरीर पर लगा लूँ, तो आपकी आयु और भी लंबी हो जाएगी।”
सभा में फिर हल्की हँसी उठी — इस बार शायद इसलिए कि उत्तर बच्चों जैसा सरल था। चंद्रहास ने बगल वाले से कहा, “देखिए, भक्ति भी है और भोलापन भी।”
जब सीना चीरकर दिखाया गया
तभी सभा में एक आवाज़ गूँजी — किसी ने, शायद वहीं बैठे किसी ऋषि ने, ऊँचे स्वर में पूछ लिया, “पर हनुमान, सिंदूर लगाने से भक्ति सिद्ध नहीं होती। तुम्हारे हृदय में सच में राम-सीता बसते हैं, यह कैसे मानें?”
यह सवाल हवा में तैर ही रहा था कि हनुमान जी ने बिना एक पल गँवाए अपने दोनों हाथ अपनी छाती पर रखे, और नाखूनों से अपना सीना चीर डाला।
सभा की हँसी उसी क्षण जम गई। चंद्रहास की मुस्कान होठों पर रुक गई, मानो किसी ने समय को रोक दिया हो। हनुमान जी के फटे हुए सीने के भीतर, सबकी आँखों के सामने, श्रीराम और माता सीता का प्रतिबिंब चमक रहा था — जैसे कोई दीया भीतर जल रहा हो, और उसकी लौ में दो मुखाकृतियाँ उभर आई हों।
किसी की साँस नहीं चली। चंद्रहास ने अपनी हथेलियाँ, जो अभी-अभी हँसी दबाने के लिए मुँह पर थीं, धीरे से नीचे कर लीं। उसे अपने भीतर कुछ टूटता महसूस हुआ — वह हँसी नहीं थी जो टूटी, वह उसकी समझ थी, जो अब तक भक्ति को एक रस्म से ज़्यादा कुछ नहीं मानती थी।
श्रीराम अपने आसन से उठे और हनुमान जी के पास आए। उन्होंने उनके सिंदूर-रंगे कंधे पर हाथ रखा। कुछ कहा नहीं — कहने की ज़रूरत नहीं थी। सभा में अब सिर्फ़ खामोशी थी, और उस खामोशी में हर किसी ने वह देख लिया था जो सिंदूर के रंग के नीचे हमेशा से मौजूद था।
चंद्रहास उस दिन के बाद कभी हनुमान जी के सामने आँख उठाकर नहीं हँसा। बरसों बाद जब वह खुद अपने पोतों को यह किस्सा सुनाता, तो हर बार एक ही जगह उसकी आवाज़ धीमी पड़ जाती — उस पल पर, जब उसकी अपनी हँसी उसे सबसे छोटा महसूस करा गई थी।
इस कथा से जुड़े सवाल
हनुमान जी पूरे शरीर पर सिंदूर क्यों लगाते हैं? मान्यता है कि माता सीता को माँग में सिंदूर लगाते देख हनुमान जी को लगा कि यह श्रीराम की लंबी आयु के लिए है। इसी सोच से उन्होंने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लिया, और तभी से भक्त उन्हें सिंदूर चढ़ाने लगे।
हनुमान जी ने सीना क्यों चीरा था? जब सभा में उनकी भक्ति पर सवाल उठा, तो हनुमान जी ने अपना सीना चीरकर दिखाया कि उनके हृदय में स्वयं श्रीराम और माता सीता विराजमान हैं — यह उनकी अटूट भक्ति का सबसे जाना-पहचाना प्रतीक बन गया।
क्या यह घटना वाल्मीकि रामायण में है? नहीं। सिंदूर और सीना चीरने वाली यह कथा लोकप्रचलित भक्ति-परंपरा से आई है, जो वाल्मीकि रामायण के बाद की सदियों में विकसित हुई। यह हनुमान भक्ति की गहराई को दर्शाती है, भले ही यह मूल ग्रंथ का हिस्सा न हो।
