12 मई, 1767 की दोपहर थी। महेश्वर के राजमहल के पीछे, नर्मदा के किनारे, एक चिता तैयार हो रही थी।
लकड़ियाँ सूखी थीं। चंदन का तेल पास रखा था। पुरोहित मंत्र दोहरा रहे थे जैसे कोई उन्हें सुन ही नहीं रहा।
और महल के भीतर, एक कमरे में, अहिल्याबाई होलकर अपने बेटे मालेराव की लाश के पास बैठी थीं।
बेटा बीस साल का था। नौ महीने पहले राजा बना था। आज सुबह मर गया।
उससे पहले — बारह साल पहले — पति खंडेराव कुम्भेर के युद्ध में मारा गया था। तब अहिल्या उनतीस की थीं। तब भी चिता पर चढ़ने के लिए तैयार थीं। पर ससुर मल्हारराव होलकर ने मना किया था।
“तू नहीं जाएगी,” बूढ़े सूबेदार ने कहा था। “तेरे बिना होलकर राज्य खत्म हो जाएगा।”
ससुर की बात मान ली थी।
फिर ससुर भी मर गए। 1766 में। एक साल पहले।
और अब बेटा।
तीनों पुरुष चले गए। एक के बाद एक। जैसे विधाता ने कोई फेहरिस्त बनाई हो और उसे एक-एक करके काटता जा रहा हो।
कमरे में अब कोई बचा नहीं था जो उन्हें रोक सके।
बाहर पुरोहित प्रतीक्षा कर रहे थे।
दासी सुदामा ने दरवाज़े पर खटखटाया। फिर भीतर आई।
“सरकार… समय हो रहा है।”
अहिल्या ने सिर नहीं उठाया।
“पुरोहित कह रहे हैं — सूर्यास्त से पहले…”
“बैठ।”
सुदामा बैठ गई। उसने अपनी मालकिन को बचपन से देखा था। चौंडी गाँव की एक लड़की, जिसे मल्हारराव होलकर ने पुणे के रास्ते में एक मंदिर के बाहर देखा था और कहा था — यह लड़की मेरी बहू बनेगी।
बारह साल की उम्र में महल आ गई थी। पढ़ाई की थी। फ़ारसी सीखी थी। तलवार चलाई थी। और अब, बयालीस साल की उम्र में, सब कुछ खत्म होने के कगार पर थी।
“सुदामा।” अहिल्या ने पूछा। “तू क्या सोचती है?”
सुदामा ने मुँह नीचे कर लिया।
“मैं क्या कहूँ सरकार। आप जो ठीक समझें।”
“नहीं। तू बता। तू औरत है। मेरे जैसी।”
सुदामा कुछ देर चुप रही।
“सरकार… अगर आप जाएँगी, तो लोग कहेंगे — कैसी पतिव्रता थी। पर अगर नहीं जाएँगी…”
“तो?”
“तो लोग बहुत कुछ कहेंगे।”
अहिल्या ने पहली बार सिर उठाया। आँखें लाल थीं पर सूखी।
“लोग तो कहेंगे ही। उससे क्या होता है।”
रात आ गई। चिता वैसी ही पड़ी रही। पुरोहित बार-बार पूछने आते रहे। हर बार अहिल्या ने कहा — “रुको।”
दीवान गंगाधर यशवंत चंद्रचूड़ रात ग्यारह बजे आए।
“सरकार, राज्य की चिंता मुझे सता रही है। पेशवा माधवराव को ख़बर भेज दी है। पर इंदौर की गद्दी पर अब कौन बैठेगा?”
अहिल्या ने उन्हें देखा। यह आदमी ससुर का सबसे विश्वस्त था। उसकी आँखों में अब एक और सवाल था — जो वह पूछ नहीं रहा था।
“दीवान जी, आप मुझसे क्या चाहते हैं?”
“सरकार… सच पूछो तो… आप अगर राज्य संभाल लें…”
“मैं?”
“आप ही। मल्हारराव साहब ने आपको हर बात सिखाई थी। उन्हें पता था। आप सबसे योग्य हैं।”
अहिल्या हँसी। बिना खुशी की हँसी।
“दीवान जी, मैं औरत हूँ। कल मैं चिता पर चढ़ी होती तो आप सब बहुत खुश होते। आज आप मुझसे राज्य संभालने को कह रहे हैं।”
दीवान चुप रहे।
“जाइए। मुझे सोचने दीजिए।”
वह रात अहिल्या ने अकेले बिताई।
खिड़की से नर्मदा दिखती थी। चाँदनी में पानी सफ़ेद चमक रहा था। दूर कहीं चिता की लकड़ियाँ अभी भी पड़ी थीं, बिना जली, बिना उठाई।
उन्होंने अपने मन में तीन आवाज़ें सुनीं उस रात।
पहली आवाज़ — परंपरा की। जा। पति के पीछे जा। यही धर्म है। यही स्त्री का गौरव है। लोग सदियों तक तेरा नाम लेंगे।
दूसरी आवाज़ — दुःख की। क्या रखा है जीने में? पति गया। बेटा गया। ससुर गया। बेटी मुक्ताबाई की भी शादी हो चुकी है, वो अपने घर है। तू अब किसके लिए जिएगी?
तीसरी आवाज़ — कुछ और थी।
यह आवाज़ धीमी थी। शुरू में सुनाई भी नहीं दी। फिर बढ़ती गई।
तू क्यों जाए?
क्या परंपरा इसलिए है कि औरत को मिटा दे? या इसलिए कि औरत को बचाए?
अगर तू चली गई, तो मालवा का क्या होगा? वो पच्चीस लाख रुपये जो राज्य पर खर्च होने थे — स्कूलों पर, कुओं पर, धर्मशालाओं पर — वो किसके हाथ में जाएँगे?
तेरा ससुर तुझे क्यों बचाता था बारह साल पहले? इसलिए कि तू मरने के लिए नहीं बनी थी। तू कुछ बनाने के लिए बनी थी।
और जो कुछ तूने अब तक नहीं बनाया — क्या वो तेरे मर जाने से बन जाएगा?
अहिल्या रात भर खिड़की के पास बैठी रहीं।
सुबह से पहले उन्होंने सुदामा को बुलाया।
“पुरोहितों से कह दे। चिता की लकड़ियाँ हटा दें।”
सुदामा ने काँपते हुए पूछा — “और… और लोग क्या कहेंगे सरकार?”
“लोग कुछ भी कहें। मैं अब काम करूँगी।”
बाद में इतिहासकारों ने लिखा कि अहिल्याबाई होलकर ने सती होने से मना किया था। पर किसी ने यह नहीं लिखा कि उस रात उनके भीतर क्या हुआ था।
जो हुआ, वो अगले अट्ठाईस साल में दिखाई दिया।
उन्होंने सबसे पहले इंदौर की गद्दी संभाली। दीवान चंद्रचूड़ को सेना का प्रमुख बनाया। पेशवा से अनुमति ली। और महेश्वर को अपनी राजधानी बनाया — क्योंकि वहाँ नर्मदा थी, और नर्मदा उन्हें शांत करती थी।
फिर उन्होंने काम शुरू किया जो बारह सौ किलोमीटर तक फैला।
काशी विश्वनाथ मंदिर — जो औरंगज़ेब के समय में टूट गया था — उन्होंने 1780 में फिर से बनवाया। अपने पैसे से। राज्य के खज़ाने से नहीं — अपनी निजी संपत्ति से। क्योंकि उन्हें लगता था कि राज्य का पैसा प्रजा के लिए है, मंदिरों के लिए उनका अपना पैसा है।
सोमनाथ का जीर्णोद्धार करवाया। केदारनाथ की मरम्मत। बद्रीनाथ में धर्मशाला। उज्जैन के महाकालेश्वर में सेवा। द्वारका, पुष्कर, गया, अयोध्या, हरिद्वार, पंढरपुर — हर जगह कुछ न कुछ बनवाया।
रामेश्वरम तक पहुँचीं। वहाँ भी मंदिर के लिए धन दिया।
पर मंदिर सिर्फ़ शुरुआत थे।
उन्होंने सड़कों के किनारे पेड़ लगवाए — हज़ारों किलोमीटर में। यात्रियों के लिए कुएँ बनवाए। धर्मशालाएँ खड़ी कीं। विधवाओं के लिए पेंशन शुरू की — उन्हीं विधवाओं के लिए, जिनसे समाज कहता था कि चिता पर चढ़ जाओ।
उन्होंने अदालत खुद चलाई। हर मुक़दमा खुद सुना। कहा जाता है कि एक बार उनके अपने दामाद यशवंतराव फणसे पर किसी ने आरोप लगाया कि उनके रथ ने एक बछड़े को कुचल दिया था। अहिल्या ने अपने ही दामाद को सज़ा सुनाई।
मालवा में कोई भूखा नहीं सोता था — यह उस ज़माने के अंग्रेज़ अधिकारी जॉन माल्कम ने भी लिखा है।
1795 में, तेरह अगस्त की रात, अहिल्याबाई होलकर का देहांत हुआ। सत्तर साल की उम्र में।
उन्होंने अट्ठाईस साल राज्य चलाया था।
उस रात के बाद, जब उन्होंने चिता की लकड़ियाँ हटवाई थीं, उन्होंने कभी फिर सती के बारे में बात नहीं की। न समर्थन में, न विरोध में।
बस काम करती रहीं।
शायद उन्हें पता था कि कोई एक भाषण किसी परंपरा को नहीं बदलता। बदलता है तो एक ज़िंदगी — जो साबित कर दे कि एक औरत अगर ज़िंदा रह जाए, तो वो क्या-क्या कर सकती है।
काशी का मंदिर आज भी खड़ा है। उनकी बनवाई धर्मशालाओं में आज भी यात्री रुकते हैं। नर्मदा का पानी आज भी महेश्वर के घाटों से बहता है — उन्हीं घाटों से जो उन्होंने बनवाए थे।
और कहीं किसी पुराने पुरोहित की डायरी में अगर खोजा जाए, तो शायद वो शब्द भी मिल जाएँ जो उन्होंने उस रात नहीं कहे थे — पर सोचे ज़रूर थे।
मैं चिता पर नहीं चढ़ूँगी। मैं ज़मीन पर रहूँगी। और इस ज़मीन को थोड़ा बेहतर बनाकर जाऊँगी।