रविवार की दोपहर थी। बाहर पुणे की गर्मी अपने आखिरी दिन गिन रही थी, और बरामदे में पापा अपनी उसी कुर्सी पर बैठे थे जिस पर वो पिछले बारह साल से बैठते आए हैं — रिटायरमेंट के दिन से, जब बैंक वालों ने उन्हें एक घड़ी और एक बुके देकर विदा किया था।
मैं रसोई से निकली। हाथ में दो कप चाय थी।
उन्होंने मुझे देखा। और मुस्कुराए — पर वो मुस्कान वैसी नहीं थी जैसी पापा मुझे देखकर मुस्कुराते हैं।
“आइए, बैठिए,” उन्होंने कहा। आप।
मेरे हाथ में चाय के कप एक पल के लिए काँपे। मैंने कुछ नहीं कहा।
मैं उनकी बेटी हूँ। अड़तीस साल की। मैं वही हूँ जिसकी पीठ पर बैठाकर वो पूरे घर में घोड़ा बने थे, जिसे उन्होंने साइकिल चलाना सिखाया था पीछे से पकड़कर और फिर चुपके से छोड़ देकर। मैं वही हूँ जिसका हाथ पकड़कर वो पहली बार स्कूल छोड़ने गए थे और गेट पर मुझसे ज़्यादा वो रोए थे।
और इस रविवार की दोपहर, पापा ने मुझे एक मेहमान समझा।
डॉक्टर ने आठ महीने पहले बताया था। Early-stage Alzheimer’s. उन्होंने बहुत आराम से समझाया था — जैसे मौसम बता रहे हों। “धीरे-धीरे होगा,” उन्होंने कहा था। “पहले छोटी चीज़ें भूलेंगे। चाबियाँ। तारीख़ें। फिर… बड़ी चीज़ें।”
मैंने पूछा था, “बड़ी चीज़ें मतलब?”
डॉक्टर ने मेरी आँखों में देखा था और कुछ नहीं कहा था। मुझे जवाब मिल गया था।
तब से मैं हर रविवार आती हूँ। और हर रविवार मैं चुपके से उन्हें परखती हूँ — आज उन्हें मम्मी का नाम याद है? आज उन्हें पता है कि आज कौन सा दिन है? आज उन्होंने दवाई ली? यह एक खेल बन गया था जो सिर्फ़ मैं खेलती थी, और जिसमें हारना तय था।
पर आज। आज वो मुझे ही भूल गए।
मेरे अंदर कुछ टूटा। पर मैंने उसे टूटने की आवाज़ नहीं करने दी।
मैंने चाय का एक कप उन्हें पकड़ाया। दूसरा खुद लेकर उनके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई।
मैं उन्हें बता सकती थी। “पापा, मैं हूँ। आपकी बेटी।” शायद वो याद कर लेते। शायद उनकी आँखों में वो रोशनी लौट आती। पर शायद वो घबरा जाते। शायद वो डर जाते — उस डर से जो किसी को तब होता है जब उसे एहसास होता है कि उसका दिमाग़ उसके साथ धोखा कर रहा है।
मैंने उन्हें नहीं बताया।
मैंने सोचा — अगर आज पापा मुझे नहीं जानते, तो आज मैं पापा को जान लूँ। उस तरह जैसे एक अजनबी किसी अजनबी को जानता है। बिना उस बेटी के बोझ के जो सब कुछ पहले से जानती है।
“आपका घर बहुत सुंदर है,” मैंने कहा।
“मेरी पत्नी ने सजाया था,” उन्होंने कहा, और चाय का घूँट लिया। “बहुत सलीक़े वाली औरत थी।”
थी। मम्मी को गुज़रे छह साल हो गए हैं। पापा उसे याद रखते हैं। यह अजीब है — कौन सी याद रहेगी, कौन सी जाएगी, इसका कोई नियम नहीं।
“आप क्या करते थे?” मैंने पूछा। “मतलब, काम।”
और तब पापा बोलने लगे।
“बैंक में था मैं। मैनेजर। पैंतीस साल।” उन्होंने हाथ से बरामदे की रेलिंग की तरफ़ इशारा किया, जैसे बैंक वहीं कहीं हो। “शिवाजीनगर वाली ब्रांच में सबसे ज़्यादा। उस इलाक़े के आधे लोग मुझे नाम से जानते थे।”
मैं चुप रही। मुझे यह सब पता था। पर आज मैं पहली बार सुन रही थी।
“एक बार,” वो हँसे, “एक बूढ़ी अम्मा आई। उसका पेंशन का पैसा नहीं आ रहा था तीन महीने से। सरकारी काग़ज़ों में कुछ गड़बड़ थी। बाक़ी सब लोग उसे टाल रहे थे — फ़ॉर्म भरो, वहाँ जाओ, यहाँ आओ।” उन्होंने सिर हिलाया। “मैंने उसका सारा काम खुद किया। तीन हफ़्ते लगे। पर मैंने किया।”
“क्यों?” मैंने पूछा।
पापा रुके। बाहर एक कौआ बोला।
“क्योंकि उसकी उम्र मेरी माँ जितनी थी,” उन्होंने धीरे से कहा। “और मेरी माँ के पास कोई नहीं था जो उसका काम करता।”
मेरी आँखों में पानी आ गया। मैंने चेहरा घुमाकर चाय की तरफ़ देखा। यह बात मैंने पैंतीस साल में कभी नहीं सुनी थी। पापा ने कभी अपनी माँ के बारे में बात नहीं की। और आज, मुझे न पहचानते हुए, उन्होंने मुझे वो बता दिया जो वो अपनी बेटी को कभी नहीं बता पाए।
“आपके बच्चे हैं?” मैंने पूछा। मेरी आवाज़ काँपी।
पापा का चेहरा खिल गया। पूरा खिल गया।
“एक बेटी है,” उन्होंने कहा। “बहुत होशियार। बचपन में इतने सवाल पूछती थी कि मैं थक जाता था। ‘आसमान नीला क्यों है, पापा? चींटियाँ लाइन में क्यों चलती हैं? आप रात को बैंक का काम घर क्यों लाते हैं?'” वो हँसे, और उनकी आँखें कहीं दूर चली गईं। “मैं उसके सब सवालों के जवाब नहीं दे पाता था। पर वो मानती थी कि मैं सब जानता हूँ। बाप के लिए इससे बड़ा कुछ नहीं होता — कि बच्चा समझे आप सब जानते हैं।”
मैं अब अपने आँसू नहीं रोक पा रही थी। मैंने उन्हें बहने दिया, चुपचाप, बिना आवाज़ के।
“अभी कहाँ है वो?” मैंने पूछा।
“बस… यहीं है आसपास,” उन्होंने कहा। और फिर एक पल के लिए उनका चेहरा भ्रमित हुआ, जैसे कोई धागा हाथ से छूट रहा हो। “हर रविवार आती है। चाय बनाती है। मेरी जैसी ही — कम चीनी।”
मैंने अपने कप की तरफ़ देखा। कम चीनी।
पापा मुझे नहीं जानते थे। पर पापा मुझे जानते थे। बस वो दोनों बातें एक साथ नहीं रख पा रहे थे।
हम काफ़ी देर बैठे रहे। शाम उतरने लगी। पापा ने मुझे और भी कहानियाँ सुनाईं — उस क्लर्क की जो हर दिवाली पर रोता था क्योंकि उसे घर भेजने को पैसे नहीं होते थे, और पापा चुपचाप उसकी जेब में डाल देते थे। उस दिन की जब बैंक में डकैती हुई थी और पापा ने सबको पीछे के कमरे में बंद कर दिया था और खुद आगे खड़े रहे थे। मम्मी से पहली मुलाक़ात की — एक शादी में, जहाँ पापा को लड्डू पसंद नहीं थे पर उन्होंने तीन खाए सिर्फ़ इसलिए कि वो उस लड़की के पास खड़े रह सकें जो लड्डू बाँट रही थी।
ये सब कहानियाँ मेरी थीं। मेरे पापा की। और मैंने इन्हें अड़तीस साल बाद, उस दोपहर, पहली बार सुना — एक अजनबी के मुँह से जो मेरा अपना खून था।
जब अँधेरा हो गया, मैं उठी।
“मुझे चलना चाहिए,” मैंने कहा।
पापा भी उठे। उन्होंने मुझे दरवाज़े तक छोड़ा — ठीक उसी तरह जैसे वो हर मेहमान को छोड़ते थे, क्योंकि बैंक मैनेजर को तमीज़ सिखाई जाती है।
दरवाज़े पर वो रुके। उन्होंने मुझे देखा। और एक पल के लिए — सिर्फ़ एक पल के लिए — उनकी आँखों में कुछ हिला। कोई धुंधली पहचान। कोई दूर की घंटी।
“आप…” उन्होंने शुरू किया, और रुक गए।
मेरी साँस रुक गई।
“आप फिर आइएगा,” उन्होंने आख़िर में कहा। “अच्छा लगा आपसे बात करके। बहुत दिनों बाद किसी ने मेरी पुरानी बातें सुनीं।”
“आऊँगी, पापा,” मैंने कहा।
और जैसे ही ‘पापा’ मेरे मुँह से निकला, मैंने काट लिया। पर वो ध्यान नहीं दे रहे थे। वो शायद सुन भी नहीं पाए।
मैं सीढ़ियाँ उतरी। गली में पहुँची। और वहाँ, अकेली, गाड़ी की चाबी हाथ में लिए, मैं रो पड़ी — उस तरह से जैसे बच्चे रोते हैं, बिना किसी शर्म के, बिना किसी रोक के।
क्योंकि मैं समझ गई थी।
पापा एक-एक करके सब कुछ भूल जाएँगे। मेरा नाम। मेरा चेहरा। वो रविवार। वो चाय। शायद एक दिन मम्मी को भी।
पर आज मुझे एक चीज़ मिली थी जो वो कभी नहीं ले सकती — चाहे वो बीमारी, चाहे वक़्त, चाहे ख़ुदा।
आज मैं अपने पापा से मिली थी। उस आदमी से, जो मेरे पापा बनने से पहले एक पूरा इंसान था। एक बेटा जिसकी माँ अकेली थी। एक मैनेजर जो एक बूढ़ी अम्मा के लिए तीन हफ़्ते लड़ा। एक लड़का जिसने तीन लड्डू खाए एक लड़की के लिए।
मैं उस आदमी से मिली थी जिसे मैं अड़तीस साल से प्यार कर रही थी और कभी पूरी तरह जान नहीं पाई थी।
भूलने की बीमारी ने पापा से उनकी बेटी छीन ली थी।
पर एक दोपहर के लिए — सिर्फ़ एक दोपहर के लिए — उसने उस बेटी को उसके पापा लौटा दिए थे।
अगले रविवार मैं फिर चाय लेकर बरामदे में गई।
पापा ने मुझे देखा।
“अरे, आ गई मेरी गुड़िया,” उन्होंने कहा। “कितनी देर लगा दी आज?”
मैं हँसी। और रोई। दोनों एक साथ।
उस दिन वो मुझे जानते थे।
मैंने उन्हें कभी नहीं बताया कि पिछले रविवार वो मुझे भूल गए थे। और मैंने कभी नहीं बताया कि वो भूलना — वो मेरी ज़िंदगी का सबसे क़ीमती तोहफ़ा बन गया था।
कुछ बातें दिल में रखी जाती हैं।
पापा के पास अब उन्हें रखने की जगह कम होती जा रही थी।
तो मैंने उन्हें अपने दिल में रख लिया। उन सबके लिए।
