सुबह के पौने आठ बजे थे जब हवलदार विक्रम ने डाक की उस थैली से भूरे रंग का एक छोटा पार्सल निकाला। नाम पढ़ते ही उसका हाथ एक पल के लिए रुक गया — “नायक अजय शर्मा, फॉरवर्ड पोस्ट, उत्तरी सीमा।”
अजय अब वहाँ नहीं था। दो दिन पहले सुबह की गश्त पर निकली टुकड़ी लौटी थी, पर पूरी नहीं। यूनिट में अभी तक सिर्फ इतना ही कहा गया था — “नायक अजय शर्मा अब हमारे साथ नहीं हैं।” घर तक ख़बर पहुँचने में अभी वक़्त लगेगा; फ़ौज का अपना तरीका होता है, अपनी रफ़्तार।
विक्रम ने पार्सल को हाथ में तोला। हल्का, मुलायम, जैसे अंदर कपड़े का कोई टुकड़ा हो। यह उस भाई की राखी की कहानी है जो मंज़िल तक तो पहुँची, पर उस हाथ तक नहीं जिसके लिए बुनी गई थी।
जिस सुबह मीरा ने धागा बाँधा
छह दिन पहले, हज़ार किलोमीटर दूर एक छोटे-से क़स्बे में, मीरा अपनी माँ के पुराने संदूक से रेशम की डिबिया निकाल रही थी। इस बार राखी उसने ख़ुद बुनी थी — लाल-पीले धागे, बीच में एक छोटा-सा स्टील का फ़ौजी बैज, जो उसने मेले से ख़ास इसी के लिए खरीदा था।
“इस बार जल्दी भेज दे,” माँ ने कहा था, बर्तन माँजते हुए, बिना नज़र उठाए। “पिछली साल पहुँचते-पहुँचते रक्षाबंधन निकल गया था।”
मीरा ने डिबिया के साथ एक चिट्ठी भी रखी। उसमें कुछ ख़ास नहीं लिखा था — बस यह कि छत पर लगा नीम का पेड़ इस बार बहुत घना हो गया है, और पापा ने साइकिल बेच दी है, अब स्कूटर ले लिया, और यह कि वह उसका इंतज़ार कर रही है, जैसे हर साल करती है।
डाकघर से सरहद तक, एक पार्सल की यात्रा
क़स्बे के डाकघर में रामपाल बाबू ने पार्सल पर मुहर लगाई और उसे बोरी में डाल दिया। वहाँ से बस पर सवार होकर वह ज़िला मुख्यालय पहुँचा, फिर रेल के डिब्बे में, फिर सेना की डाक-छँटाई इकाई में, जहाँ एक क्लर्क ने उसे “फील्ड पोस्ट ऑफ़िस” की मुहर के साथ अलग रख दिया — फ़ौजी डाक हमेशा प्राथमिकता पर चलती है, चाहे रास्ता कितना भी दुर्गम क्यों न हो।
पहाड़ी सड़क के आख़िरी हिस्से में डाक ट्रक नहीं, खच्चर चलते हैं। पार्सल एक जवान की पीठ पर बंधे थैले में झूलता हुआ चढ़ाई चढ़ा, बर्फ़ीली हवा में, उस सीमा चौकी की तरफ़ जहाँ अजय की पोस्टिंग थी — यह सिर्फ़ कागज़ और धागे का सफ़र नहीं था, यह एक भाई की राखी की कहानी थी जो हर मोड़ पर किसी अनजान हाथ से होकर गुज़र रही थी।
घर में गिनती के दिन
इधर मीरा हर शाम कैलेंडर पर एक क्रॉस लगाती। तीसरे दिन उसने माँ से पूछा, “पहुँची होगी न?” माँ ने बस सिर हिला दिया।
पाँचवें दिन शाम को पड़ोस की चाची आईं और बोलीं कि उनके बेटे ने बताया, बॉर्डर पर कहीं कुछ “हलचल” हुई है, टीवी पर आ रहा था। मीरा ने चैनल बदल दिया — उसे यक़ीन था कि अगर कुछ होता, फ़ोन आ जाता। फ़ौज में यही नियम था, हमेशा फ़ोन पहले आता।
फ़ोन नहीं आया। न उस दिन, न अगले दिन।
जिस सुबह पार्सल पहुँचा
छठे दिन सुबह विक्रम पार्सल लेकर पोस्ट कमांडर के पास गया। नियम था कि किसी शहीद जवान की डाक परिवार को लौटाई जाती है, बिना खोले — लेकिन इस बार कमांडर ने कुछ देर सोचा, फिर धीरे से कहा, “खोलो।”
अंदर राखी थी, वह चिट्ठी थी, और नीम के पेड़ की बात थी।
विक्रम ने राखी अपनी हथेली पर रखी। फिर पोस्ट के बाहर लगे उस लकड़ी के खंभे तक गया, जहाँ हर शहीद साथी की तस्वीर एक पल के लिए रखी जाती थी, फूल चढ़ाए जाते थे, इससे पहले कि सामान पैक होकर घर भेजा जाए। उसने अजय की तस्वीर के फ्रेम के कोने में धागा बाँध दिया — न बहुत कसकर, न ढीला, ठीक वैसे जैसे कोई बहन बांधती है।
फिर उसने चिट्ठी के नीचे एक लाइन जोड़ी, अपनी लिखावट में: “नीम का पेड़ यहाँ भी है, मीरा। हम इसकी छाँव में उसे भी याद रखेंगे।”
पार्सल उसी शाम वापसी की डाक में चला गया — इस बार असली मंज़िल की तरफ़, घर की तरफ़, उस हाथ की तरफ़ जिसने इसे बुना था।
