Fictional

बहन के बिना रक्षाबंधन की कहानी

Rajhussain · 14-August-2026 5 मिनट में पढ़ें
बहन के बिना रक्षाबंधन की कहानी

अलमारी के सबसे ऊपर वाले खाने में वीवान को वो डिब्बा मिला, जो पिछले साल भी वहीं रखा था — प्लास्टिक का पुराना डिब्बा, जिस पर “राखी” लिखा हुआ स्टिकर अब आधा उखड़ चुका था। उसने डिब्बा नीचे उतारा, ढक्कन खोला, और भीतर सिर्फ दो साल पुरानी राखियाँ मिलीं — इस साल की अभी आनी बाकी थी।

घड़ी में सुबह के छह बज रहे थे। टोरंटो में अभी रात के साढ़े आठ बजे होंगे, इरा वहाँ अभी जगी होगी, शायद कॉफ़ी बना रही होगी। वीवान ने फ़ोन उठाया, फिर रख दिया। पहले वो नहा लेना चाहता था — जैसे बचपन में माँ कहती थी, “राखी बंधवाने से पहले नहा तो लो।”

वो डिब्बा जो हर साल खुलता था

पिछले सत्ताईस सालों में यह डिब्बा हर रक्षाबंधन पर खुला था। इरा हमेशा सबसे पहले उठती, थाली सजाती, और वीवान को नींद से खींचकर बिठा देती — “आज लेट मत होना, वरना मुहूर्त निकल जाएगा।” वो मुहूर्त कभी नहीं मानता था, फिर भी हर बार समय पर बैठ जाता।

इस बार डिब्बे में सिर्फ पुरानी राखियाँ थीं, जिन्हें उसने कभी फेंका नहीं। एक पीली, धागे से बनी, जो इरा ने कॉलेज के पहले साल में खुद बुनी थी। एक और, सुनहरी, जो पिछले साल मुंबई एयरपोर्ट पर आख़िरी मुलाक़ात में बाँधी गई थी — फ्लाइट के बोर्डिंग से बीस मिनट पहले।

वीवान ने वो पीली राखी उठाई और अपनी हथेली में देर तक पकड़े रखा।

सुबह छह बजे, वीडियो कॉल की घंटी

फ़ोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर इरा की तस्वीर — किचन की रोशनी में, बालों को जल्दी में बाँधे हुए। “हैप्पी राखी,” उसने कहा, पर आवाज़ में वो जल्दबाज़ी नहीं थी जो हर साल होती थी। इस बार आवाज़ धीमी थी, जैसे वो भी जानती हो कि स्क्रीन के इस पार कुछ खाली रह गया है।

“कूरियर आया?” उसने पूछा।

“अभी नहीं। शायद दोपहर तक आएगा।”

एक चुप्पी। फिर इरा हँसी, थोड़ी ज़बरदस्ती वाली हँसी — “याद है, एक बार मैं भूल गई थी, और तूने दो घंटे मुझे जगाया था?”

“याद है।” वीवान ने भी हँसने की कोशिश की, पर उसकी नज़र उस खाली थाली पर टिकी रही, जो टेबल पर बिना चावल-रोली के पड़ी थी।

कॉल आठ मिनट चली। दोनों तरफ़ से कोई नहीं कहना चाहता था कि यह पहली बार है जब राखी उसकी कलाई पर नहीं, डाक के डिब्बे में बंधी आएगी।

जब राखी डाक से आती है

दोपहर तीन बजे कूरियर वाला आया। एक छोटा पैकेट, ऊपर इरा की लिखावट में उसका पता — वही लिखावट जो बचपन में उसकी कॉपियों के कोनों पर उसका नाम लिखती थी।

अंदर एक राखी थी, लाल-सुनहरी, और एक छोटी चिट — “इसे खुद अपने हाथ से बाँध लेना। अगले साल मैं आऊँगी, प्रॉमिस।”

वीवान देर तक उस चिट को पढ़ता रहा। फिर उसने राखी निकाली, आईने के सामने खड़ा हुआ, और अपने ही दाहिने हाथ से बाईं कलाई पर उसे बाँधने की कोशिश की। धागा दो बार फिसला। तीसरी बार उसने दाँतों से एक सिरा पकड़ा और गाँठ बाँध ली — टेढ़ी-मेढ़ी, पर बँधी हुई।

आईने में उसने अपनी कलाई देखी, फिर अपना चेहरा। किसी ने उसे मिठाई नहीं खिलाई थी, किसी ने आरती नहीं उतारी थी — फिर भी यह रक्षाबंधन की कहानी का वही पल था, बस अकेले जिया गया।

इस रक्षाबंधन की कहानी में जो खाली रह गया

शाम को वीवान बालकनी में बैठा, हाथ में चाय का कप लिए। पड़ोस के घर से राखी के गाने की आवाज़ आ रही थी, बच्चे शोर मचा रहे थे। उसने अपनी कलाई की तरफ़ देखा — टेढ़ी गाँठ वाली राखी अब भी वहीं थी।

उसने फ़ोन उठाया और इरा को एक फ़ोटो भेजी — बस कलाई की, राखी की, बिना कैप्शन के।

कुछ ही सेकंड में जवाब आया: एक फ़ोटो, इरा की कलाई की, खाली। नीचे लिखा था — “मैंने अपनी राखी नहीं बाँधी। तेरे हाथ से बंधवाने का इंतज़ार करूँगी, अगले साल तक।”

वीवान मुस्कुराया। उसने चाय का आखिरी घूँट लिया, और डिब्बे को वापस अलमारी में रखने से पहले, उस टेढ़ी राखी को अपनी कलाई पर ही रहने दिया — अगले तीन सौ पैंसठ दिन के लिए।

इस कथा से जुड़े सवाल

रक्षाबंधन का असली महत्व क्या है, सिर्फ राखी बाँधना ही या कुछ और?
रक्षाबंधन का मूल भाव धागे से ज़्यादा उस वादे में है जो भाई-बहन एक-दूसरे से करते हैं — साथ होने का, दूर होने पर भी याद रखने का। धागा सिर्फ उस वादे का प्रतीक है, दूरी उसे कमज़ोर नहीं करती।

क्या भाई-बहन दूर रहकर, डाक से राखी भेजकर भी यह त्योहार मना सकते हैं?
बिल्कुल। आजकल कई परिवार वीडियो कॉल और कूरियर से राखी भेजकर यह दिन मनाते हैं। परंपरा का असली हिस्सा भावना है, न कि यह कि राखी किसके हाथ से बाँधी गई।

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