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बर्नआउट की कहानी — वो मंगलवार जब लैपटॉप नहीं खुला

Rajhussain · 13-July-2026 4 मिनट में पढ़ें
बर्नआउट की कहानी — वो मंगलवार जब लैपटॉप नहीं खुला

लैपटॉप की स्क्रीन नीली चमक रही थी, लेकिन अर्जुन की उंगलियां कीबोर्ड से दस मिनट पहले ही रुक चुकी थीं।

ईमेल खुला हुआ था — “Re: Re: Re: Client Deck — URGENT” — कर्सर एक खाली लाइन पर टिमटिमा रहा था, और अर्जुन बस देख रहा था। न सोच रहा था, न टाइप कर रहा था। सिर्फ देख रहा था, जैसे स्क्रीन किसी और की हो।

यह कोई नाटकीय पल नहीं था। कोई आंसू नहीं, कोई चीख नहीं। बस एक मंगलवार, सुबह 11:20, और उसका शरीर अचानक एक फैसला सुना रहा था जिसे उसके दिमाग ने अभी तक स्वीकार नहीं किया था — अब और नहीं।

उसकी मैनेजर ने बाद में पूछा, “तुम ठीक तो हो?” अर्जुन ने सिर हिलाया, हां में, क्योंकि यही जवाब आठ साल से उसकी जुबान पर छपा हुआ था।

डॉक्टर के कमरे में सन्नाटा

डॉक्टर ने जो शब्द इस्तेमाल किया, वो नया नहीं था — “बर्नआउट” — पर अर्जुन ने पहली बार उसे अपने लिए सुना।

“आपका ब्लड प्रेशर हाई है, नींद का पैटर्न टूटा हुआ है, और सबसे ज़रूरी — आपकी बॉडी ने खुद फैसला ले लिया है,” डॉक्टर ने कहा, “क्योंकि आपके दिमाग ने कब का लेना बंद कर दिया था।”

अर्जुन कुछ बोल नहीं पाया। वो वहां बैठा एक ऐसे आदमी की तरह लगा जिसे अचानक बता दिया गया हो कि जो सड़क वो आठ साल से भाग रहा था, वो कहीं जाती ही नहीं थी।

कमरे से निकलते हुए उसने अपना फोन देखा — 34 अनरीड मैसेज, तीन मिस्ड कॉल, एक कैलेंडर इनवाइट जो अभी भी उसका इंतज़ार कर रहा था।

उसने फोन जेब में रख लिया। नहीं देखा।

आराम करना एक हुनर है, जो वो भूल चुका था

पहला हफ्ता सबसे अजीब था। सुबह 9 बजे उठकर वो बिस्तर पर यूं ही लेटा रहता, दिल तेज़ धड़कता — जैसे शरीर को यकीन ही नहीं हो रहा हो कि कोई मीटिंग नहीं है।

तीसरे दिन उसने घर की बालकनी में एक कुर्सी डाली और वहां बैठा। बस बैठा। दस मिनट में ही उसे लगने लगा कि कुछ “प्रोडक्टिव” करना चाहिए — फोन उठाने का मन हुआ, फिर लैपटॉप का। हाथ खुद-ब-खुद जेब की तरफ बढ़ गया।

उसने खुद से पूछा — आखिरी बार कब वो कुछ किए बिना, सिर्फ बैठा था?

जवाब नहीं आया। शायद कॉलेज के बाद कभी नहीं।

उसकी मां ने एक दिन फोन पर कहा, “तू छुट्टी पर काम नहीं करने को ‘आराम’ नहीं कहते, बेटा। आराम वो है जब तेरा दिमाग भी छुट्टी पर हो।” अर्जुन हंसा, पर बात कहीं गहरे तक चुभ गई।

जब फोन साइलेंट रहा और दुनिया नहीं रुकी

दूसरे महीने में उसने कंपनी का लैपटॉप वापस कर दिया — सिर्फ अस्थायी तौर पर, मेडिकल लीव पर। पहले हफ्ते वो हर घंटे चेक करता कि कहीं कोई “इमरजेंसी” तो नहीं आई। ऐसी कोई इमरजेंसी नहीं आई।

तीसरे हफ्ते उसे पता चला कि जो प्रोजेक्ट वो “अकेला संभाल सकता है” समझता था, वो किसी और ने संभाल लिया। कंपनी बंद नहीं हुई। क्लाइंट नाराज़ नहीं हुआ। दुनिया वैसे ही चलती रही, जैसे उसके बिना भी चल सकती थी।

यह एहसास राहत जितना ही तकलीफदेह था। आठ साल तक उसने खुद को यह बताकर जिंदा रखा था कि वो अपरिहार्य है। सच यह निकला कि कोई भी अपरिहार्य नहीं होता — और शायद यही सबसे आज़ाद कर देने वाली बात थी।

उसने पेंटिंग शुरू की, बुरी पेंटिंग। उसने पड़ोस के पार्क में शाम की सैर शुरू की, बिना ईयरफोन के, बिना पॉडकास्ट सुने। पहले हफ्ते सन्नाटा असहज लगा। दूसरे हफ्ते वो सन्नाटा उसका इंतज़ार करने लगा।

बर्नआउट की कहानी का वो मोड़, जो कोई नहीं देखता

तीन महीने बाद अर्जुन ऑफिस लौटा। लेकिन जो लौटा, वो पहले वाला अर्जुन नहीं था।

पहले दिन, शाम 6 बजे, उसकी मैनेजर ने पूछा कि क्या वो एक “छोटी सी” कॉल के लिए रुक सकता है। पुराना अर्जुन बिना सोचे हां कह देता। इस बार उसने एक सेकंड रुककर कहा, “कल सुबह 9 बजे बात करते हैं।”

उसकी आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं था। कोई सफाई नहीं थी। बस एक वाक्य, जितना ज़रूरी था उतना ही।

घर आकर उसने अपना फोन साइड टेबल पर रखा — स्क्रीन नीचे की तरफ — और बालकनी वाली उसी कुर्सी पर जा बैठा। हवा हल्की ठंडी थी। उसने कुछ नहीं किया। कुछ सोचा भी नहीं।

बस बैठा रहा, जब तक आसमान का रंग बदल नहीं गया।

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