Inspirational

गोठे की मिट्टी अभी भी गीली थी।

Rajhussain · 19-July-2026 8 मिनट में पढ़ें
गोठे की मिट्टी अभी भी गीली थी।

रात के किसी पहर में बारिश रुकी थी, और अब सिर्फ़ छप्पर से बूँदें टपक रही थीं — एक, फिर थोड़ी देर बाद दूसरी, जैसे कोई गिनकर गिरा रहा हो। गायें अंधेरे में साँस ले रही थीं। उनके शरीर की गर्मी हवा में तैर रही थी, और उसी गर्मी के बीच, गोबर और भूसे की गंध के बीच, सिंधु ज़मीन पर पड़ी हुई थी।

उसकी साड़ी ख़ून से भीगी थी।

कुछ घंटे पहले उसने यहीं, इसी गोठे में, अकेले एक बच्ची को जन्म दिया था। कोई दाई नहीं थी। कोई औरत नहीं थी जो हाथ थाम लेती। नाल काटने के लिए उसने पास पड़ा एक पत्थर उठाया था और उसे सोलह बार रगड़ा था — सोलह बार, क्योंकि पत्थर की धार नहीं थी, और हर बार उसे लगता था कि अब वो होश खो देगी।

पर वो नहीं खोई।

बच्ची अब उसकी छाती से लगी सो रही थी। इतनी छोटी। इतनी हल्की। सिंधु ने उसे देखा और कुछ देर के लिए उसे याद ही नहीं रहा कि वो कौन है, कहाँ है, उसके साथ क्या हुआ है।

फिर सब कुछ लौट आया।


चौबीस साल की उम्र। बारह की उम्र में ब्याह दी गई थी एक ऐसे आदमी से जो उससे बीस साल बड़ा था। उसका नाम था चिंधी — कपड़े का फटा हुआ टुकड़ा। यही नाम दिया था घरवालों ने, क्योंकि वो एक अनचाही बेटी थी, और अनचाही चीज़ों को घर में नाम नहीं, बस एक पहचान दे दी जाती है।

गाँव में उसने एक लड़ाई लड़ी थी। औरतें जंगल से गोबर और लकड़ी इकट्ठा करतीं, और एक रसूख़दार आदमी उन्हें बेचकर पैसा अपनी जेब में रखता, औरतों को कुछ न देता। सिंधु ने आवाज़ उठाई थी। उसने झुकने से इनकार किया था।

इसकी क़ीमत यह तय हुई कि उस आदमी ने पूरे गाँव में अफ़वाह फैला दी — कि सिंधु के पेट में जो बच्चा है, वो उसके पति का नहीं।

और उसके पति ने यक़ीन कर लिया।

नौ महीने की गर्भवती। उसे मारा गया, घसीटा गया, और घर के पीछे के गोठे में फेंक दिया गया — जानवरों के साथ, जैसे वो ख़ुद एक जानवर हो।


अब, इस गोठे में, बच्ची को सीने से लगाए, सिंधु के मन में एक ख़याल आया।

बहुत सीधा ख़याल। इतना सीधा कि डरावना भी नहीं लगा।

मर जाना आसान होगा।

रास्ता पास ही था। उस पर रेल की पटरी थी। सुबह की पहली गाड़ी आने में अभी देर थी, पर देर कितनी? एक पहर। शायद उससे भी कम। वो उठ सकती थी, चल सकती थी, और सब कुछ ख़त्म हो सकता था — ये दर्द, ये शर्म, ये भूख जो अभी से पेट में ऐंठ रही थी।

उसने बच्ची की तरफ़ देखा।

बच्ची ने आँखें नहीं खोलीं। बस उसकी मुट्ठी, बहुत धीरे, सिंधु की उँगली के इर्द-गिर्द कस गई।

और उसी एक हरकत में — उस छोटी-सी, अनजानी पकड़ में — सिंधु के भीतर कुछ टूटा और कुछ बना, दोनों एक साथ।

वो रोई नहीं। रोने के लिए जितना पानी चाहिए था, उतना उसके शरीर में बचा नहीं था। उसने बस इतना सोचा, बहुत शांत होकर, जैसे किसी और के बारे में सोच रही हो:

अगर मैं मर गई, तो ये भी मर जाएगी।

और जो मुझे मारकर फेंक गए, वो जीतेंगे।

सूरज निकलने से पहले उसने तय कर लिया था।

वो जिएगी। और सिर्फ़ इसलिए नहीं कि उसे जीना है — बल्कि इसलिए कि किसी ने उसे ज़िंदा रहने लायक़ नहीं समझा। यही उसका जवाब होगा।


अगले पंद्रह साल किसी कहानी की तरह नहीं बीते। कहानियों में मोड़ होते हैं, चमत्कार होते हैं। यहाँ कुछ नहीं था — सिर्फ़ अगला दिन, और उसके बाद वाला दिन।

वो माँ के घर गई थी, उसी रात, बच्ची को गोद में लेकर, कई किलोमीटर पैदल चलकर। माँ ने दरवाज़ा नहीं खोला।

तो वो स्टेशनों पर पहुँची।

रेलवे प्लेटफ़ॉर्म एक अजीब दुनिया है। वहाँ हर वक़्त लोग आते-जाते रहते हैं, पर कोई किसी को नहीं देखता। सिंधु वहाँ गाती थी। उसकी आवाज़ अच्छी थी — माँ ने नहीं, पर भगवान ने यह एक चीज़ उसे दे दी थी। वो गाती, और जो दो-चार पैसे, जो रोटी का टुकड़ा मिल जाता, उससे ख़ुद को और बच्ची को ज़िंदा रखती।

रातें सबसे मुश्किल थीं।

एक रात उसे डर लगा कि सोते में कोई उस पर हमला न कर दे। तो वो श्मशान में जाकर सो गई — वहाँ कोई जीवित आदमी नहीं आता था। उसने एक चिता की बची हुई आग पर आटा गूँथकर रोटी सेंकी और खाई। बाद में, जब लोग पूछते कि उसे डर नहीं लगा, तो वो हँसकर कहती कि मुर्दे जिंदों से कम ख़तरनाक होते हैं।

इन्हीं स्टेशनों पर, इन्हीं प्लेटफ़ॉर्मों पर, उसने उन्हें देखना शुरू किया।

बच्चे।

अकेले बच्चे। जिनके माँ-बाप मर चुके थे या छोड़ चुके थे। जो कोने में दुबके रहते, भूखे, गंदे, किसी की नज़र से बचते हुए। एक दिन एक लड़का उसके पास आया — शायद छह-सात साल का — और बिना कुछ कहे उसके पास बैठ गया। जैसे उसे पता हो कि यहाँ ख़तरा नहीं है।

सिंधु ने अपनी रोटी का आधा हिस्सा उसे दे दिया।

उस दिन उसे समझ आया कि वो अकेली नहीं है। उसके जैसे और भी हैं — फेंके हुए लोग, अनचाहे लोग। और शायद, उसने सोचा, फेंके हुए लोग ही फेंके हुए लोगों को पहचान सकते हैं।

उसने एक बच्चे को रखा। फिर दूसरे को। फिर तीसरे को।

भीख और कठिन हो गई — अब उसे कई पेट भरने थे। पर वो ज़्यादा माँगने लगी, ज़्यादा गाने लगी, ज़्यादा चलने लगी। उसने एक नियम बना लिया, बिना किसी से कहे: जो भी अनाथ उसके सामने आएगा, वो उसकी माँ बन जाएगी। कोई शर्त नहीं। कोई हिसाब नहीं।

एक दिन — उसे ठीक से याद नहीं कि कौन-सा दिन था — एक बच्चे ने उसे “माई” कहकर पुकारा।

माई। माँ।

सिंधु ठहर गई। किसी ने उसे ज़िंदगी में पहली बार माँ कहा था। उसने इस शब्द को अपने भीतर इतनी देर तक रखा कि वो शब्द उसका नाम बन गया।

चिंधी मर चुकी थी। अब वहाँ सिर्फ़ माई थी।


उसने अपनी एक चीज़ की क़ुर्बानी दी, जो शायद सबसे कठिन थी।

उसकी अपनी बेटी, ममता — वही जो उस गोठे में पैदा हुई थी — बड़ी हो रही थी। और सिंधु को डर था कि कहीं वो अनजाने में अपनी बेटी और बाक़ी बच्चों में फ़र्क़ न करने लगे। कहीं उसका दिल चुपके से अपनी ही औलाद की तरफ़ न झुक जाए।

तो उसने ममता को एक ट्रस्ट को सौंप दिया, पढ़ने-लिखने के लिए, ताकि बाक़ी सैकड़ों बच्चों के लिए उसके मन में कोई भेद न रहे।

यह त्याग किसी किताब में अच्छा लगता है। पर एक माँ के लिए, जिसने अपनी बेटी को एक पत्थर से नाल काटकर इस दुनिया में लाया था, यह कैसा रहा होगा — इसका हिसाब किसी आँकड़े में नहीं है।


साल बीतते गए। दस बच्चे सौ हो गए। सौ हज़ार की तरफ़ बढ़ने लगे। माई के पास अब छत थी, फिर कई छतें। आश्रम बने। बच्चे पढ़े, बड़े हुए, डॉक्टर बने, वकील बने, शिक्षक बने। कुछ ने ख़ुद आश्रम चलाने शुरू कर दिए।

पर माई वही रही — खुरदरी आवाज़ वाली, साधारण साड़ी में, जो मंच पर खड़े होकर वही बात कहती जो उसने श्मशान की रात सीखी थी: कि इंसान को इंसान से डरना नहीं चाहिए, और कि फेंका हुआ कुछ भी बेकार नहीं होता।


अपने जीवन में उसने चौदह सौ से ज़्यादा अनाथ बच्चों को पाला। वो “माई” बनी — हज़ारों की माँ। और जब वो गुज़रीं, तब तक उनका परिवार इतना बड़ा हो चुका था कि उसमें सैकड़ों दामाद और बहुएँ थीं, उनके अपने बच्चे थे — माई के नाती-पोते, एक ऐसी वंशावली जो ख़ून से नहीं, सिर्फ़ करुणा से बनी थी।

एक बार, किसी जन्मदिन पर, उनके सैकड़ों बच्चे — अब बड़े हो चुके, अपने-अपने जीवन में बसे हुए — उनके आसपास इकट्ठा हुए। वही बच्चे जिन्हें कभी किसी ने प्लेटफ़ॉर्म के कोने में छोड़ दिया था। वही बच्चे जिन्हें माई ने अपनी आधी रोटी देकर पाला था।

वो उनके बीच खड़ी थीं — वही औरत जो एक रात गोठे की गीली मिट्टी पर पड़ी थी और रेल की पटरी के बारे में सोच रही थी।

अगर उस रात वो उठकर चल पड़ी होतीं — पटरी की तरफ़, गाड़ी की तरफ़ — तो ये सैकड़ों चेहरे कभी न होते। ये पूरी दुनिया, जो अब उन्हें घेरे खड़ी थी, कभी जन्म ही न लेती।

एक छोटी-सी मुट्ठी ने एक उँगली पकड़ी थी।

और उसी पकड़ ने हज़ारों ज़िंदगियाँ थाम लीं।

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