राहुल और नीता की शादी को आठ साल हो गए थे। शहर के एक ठीकठाक इलाके में एक दो-कमरे का फ्लैट, सरकारी जॉब, लेखा-जोखा साफ़-सुथरा। दोनों की संयुक्त सैलरी 1,50,000 रुपये महीने की थी, जिसमें किराया, खाना, स्कूल फीस — सब कुछ चल रहा था।
लेकिन चलना और रहना अलग चीज़ें हैं।
2019 में पहली बार नीता ने कहा: “बाकी सब तो नया फ़ोन ले लिए हैं। मेरा तो तीन साल पुराना है। बस 45,000 का EMI, बारह महीने का।” राहुल ने कहा, “ठीक है।”
फिर उसी साल राहुल ने कार देखी — एक छोटी कार, महीने के 22,000 का EMI। दरअसल, वह “छोटी” नहीं थी, लेकिन उसे पहली बार सड़क पर अपनी गाड़ी चलाने का सपना था। EMI पर साइन किया।
2020 में घर में नए सॉफ़ा की दरकार हुई। पुराना वाला पिस गया था। 80,000 का सॉफ़ा, 12,000 महीना का EMI, सात साल का लोन। नीता ने कहा, “यह तो सुंदर है। और हम तो बर्दाश्त कर सकते हैं।”
वे बर्दाश्त कर सकते थे। थे।
2021 में नीता की माँ बीमार पड़ी। राहुल और नीता ने सोचा, एक बार घूमने जाएँ, परिवार के साथ। मालदीव का सपना नहीं — दक्षिण भारत की यात्रा। तीन लाख का खर्च। क्रेडिट कार्ड ने 18% ब्याज पर लोन दे दिया।
नीता ने एक और फ़ोन ले लिया — एक “स्मार्ट” वाला, ऑफ़िस में मीटिंग के लिए। 20,000 का EMI।
2022 में लड़के के लिए लैपटॉप। 60,000 का, 6,000 महीने का।
2023 में वॉशिंग मशीन, माइक्रोवेव, स्टडी टेबल। सब कुछ EMI पर।
अप्रैल 2024 को एक बुधवार की शाम थी जब यह सब देखा गया।
जब राहुल ने कैलकुलेटर निकाला
नीता की बहन ने एक WhatsApp message भेजा: “आजकल सब कुछ EMI पर ही तो ले रहे हो। कुल कितना है तुम्हारा?”
राहुल ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसी रात बैठ गया कैलकुलेटर के साथ। कागज़-कलम। Excel sheet खोली।
| आइटम | EMI रकम | बाकी महीने |
|---|---|---|
| फोन (नीता) | 3,750 | शून्य |
| फोन (राहुल) | 1,666 | तीन महीने |
| कार | 22,000 | 42 महीने (ढाई साल) |
| सोफा | 12,000 | 72 महीने (छः साल) |
| लैपटॉप | 6,000 | 18 महीने |
| क्रेडिट कार्ड | 15,000 | दो साल |
| होम डेकोर, छोटी चीजें | 3,584 | छः महीने |
कुल: 64,000 रुपये प्रति महीना।
उनकी सैलरी थी 1,50,000। तो 64,000 / 150,000 = 42.67%।
लेकिन यह आधा कहानी नहीं थी। 150,000 में से 45,000 किराया निकल जाता था, 20,000 घर का खर्च, 15,000 बच्चे की स्कूल फीस, 8,000 इंश्योरेंस, 5,000 बिजली-पानी।
ये कुल होते थे: 93,000।
तो 150,000 – 93,000 = 57,000 बचता था।
और EMI जा रहे थे 64,000।
वह रात, राहुल ने नीता को यह सब दिखाया। नीता का चेहरा पीला पड़ गया।
“यह तो… यह तो गलत है।” उसका गला भर आया। “हमने तो कभी सोचा नहीं था।”
राहुल ने कुछ नहीं कहा। शायद यह देर से सोचना था — बहुत देर से।
जब सब कुछ रुक गया
अगले सप्ताह की शुरुआत मुश्किल रही। नीता का ऑफिस बंद हो गया — कोविड की एक नई लहर, वर्क फ्रॉम होम, फिर सैलरी में 20% की कट।
अचानक से 150,000 हो गए 120,000।
और EMI तो वही के वही — 64,000।
राहुल ने अपने मैनेजर से बात की। प्रमोशन के लिए। “मेरी सैलरी बढ़ा दो। मुझे काम करना है।” मैनेजर ने कहा, “फ्रीज़ है सब कुछ। साल भर रुको।”
उस रात, वे बैठे रहे — दोनों। कोई बात नहीं की।
फिर अगले दिन, राहुल ने फ़ोन बंद कर दिया। “यह नहीं चलेगा।”
नीता ने अपना फ़ोन की अतिरिक्त EMI भी रोक दी। “यह तो मेरी गलती थी।”
महीना बदलना शुरू हुआ।
जब हर फैसला दोहरा महसूस हुआ
लड़के को स्कूल से एक फील्ड ट्रिप की अनुमति माँगी गई थी — 10,000। राहुल ने पहली बार कहा: “नहीं।”
लड़के का चेहरा टूट गया। “पर सब तो जाएँगे।”
“अभी नहीं,” राहुल ने कहा। और उसका अपना दिल टूट गया।
कार बेचने की बात हुई। सॉफ़ा बेचने की। भगवान, ये सब सोचना कैसा लगा। “यह चीजें हैं,” नीता ने कहा। “लेकिन मन टूट जाता है।”
वे बेचे नहीं। पहले।
पहले उन्होंने जो आ सकता था, काटा।
रविवार को घर पर खाना बनाना, रेस्तरां जाना बंद। बच्चों के लिए नई किताबें नहीं। नीता का जिम का सदस्यपद रद्द। बिजली का बिल कम करने के लिए AC का उपयोग सिर्फ रविवार को।
हर रोज़ सोचना था: “क्या यह जरूरी है? क्या हम यह कर सकते हैं?”
दो महीने बाद, राहुल को एक extra project मिला — 15,000 महीना। उसने हाँ कह दिया। घर आकर ढह गया, थकान से। नीता ने उसके लिए चाय बनाई और चुप रहे दोनों।
जब एक बीज बदलाव का उगा
अगले तीन महीने में पहली कार का EMI खत्म हुआ। 22,000 महीना बच गए।
कागज़ पर लिखा शब्द — “मुक्ति” — का मतलब नीता को अब समझ आ गया।
“राहुल, क्या हम यह पैसा किसी एक EMI को जल्दी खत्म करने में लगा दें?”
उन्होंने सोफे को चुना। वह भविष्य की EMI की जगह, लंबी अवधि का था। सॉफ़े के EMI में 22,000 का अतिरिक्त रकम लगा दिया।
महीने बदलते गए। क्रेडिट कार्ड का कर्ज खत्म हुआ। फिर छोटी चीजों की EMI। फिर बच्चे का लैपटॉप का ब्याज काट गया।
यह एक साल की यात्रा थी — न उदास, न खुशी से भरपूर, बस… ठीक। जैसे एक लंबा रास्ता चलना हो।
नीता के ऑफिस को फिर से खोल दिया गया, लेकिन उसकी सैलरी वही रही। कोई फर्क नहीं पड़ा।
लड़के की स्कूल की अगली त्रिप की योजना बनाई गई — पर यह बार नकद रखा। कोई EMI नहीं।
आज का दिन
जनवरी 2025।
नीता की बहन फिर से पूछती है: “अब कितना EMI है?”
“तीन EMI बाकी हैं,” राहुल कहते हैं। “सॉफ़ा का, 18 महीने का। और एक पुरानी micro-credit से 3,000 महीना।”
नीता मुस्कुराती है। “12 महीने पहले 64,000 जा रहे थे। अब 15,000।”
“और फिर?”
“फिर हम सोचेंगे कि क्या चाहिए। लेकिन पहले यह सब खत्म करेंगे। बगैर EMI के।”
राहुल कहता है — न गर्व से, न दुःख से, बस तथ्य की तरह: “यह साल हमें सिखा गया कि अगर तुमने पूछा नहीं, तो ये चीजें तुम्हें निगल जाएँगी। एक-एक करके। जब तक तुम खुद को EMI के सिवा कुछ और न पाओ।”
इस कथा से जुड़े सवाल
प्रश्न: 60% सैलरी का EMI क्यों खतरनाक होता है? जब आपकी सैलरी का आधे से ज़्यादा EMI में जा रहे हो, तो आपके पास असली आपातकालीन स्थिति के लिए कोई बचाव नहीं बचता। एक नौकरी खोना, एक बीमारी, या एक अनपेक्षित खर्च — और पूरी संरचना ढह जाती है। राहुल और नीता भाग्यवान थे कि नीता की सैलरी काट गई, लेकिन ऑफिस बंद नहीं हुआ।
प्रश्न: EMI के जाल से निकलने के लिए क्या करें? सबसे पहले, अपने सभी EMI को एक जगह लिखें। फिर उन्हें अवधि के आधार पर क्रमबद्ध करें — सबसे छोटी अवधि वाली पहले खत्म करें। जैसे-जैसे एक EMI खत्म होता है, उस रकम को अगली EMI में लगाएँ। यह “स्नोबॉल” विधि है, और यह काम करती है।
