Fictional

EMI का जाल — एक जोड़े की कहानी

Rajhussain · 31-August-2026 5 मिनट में पढ़ें
EMI का जाल — एक जोड़े की कहानी

दिल्ली के एक चमकती आवासीय कॉलोनी में, अंकित और प्रिया दोनों अच्छी नौकरियों में थे। अंकित एक टेक कंपनी में सीनियर डेवलपर था, प्रिया एक कॉर्पोरेट ट्रेनर। हर महीने उनके पास काफी पैसा आता था। लेकिन किसी कारण से वे कभी बचत नहीं कर पा रहे थे।

“पैसा कहाँ चला जाता है?” प्रिया हर महीने पूछती थी। अंकित भी सोचता था। लेकिन दोनों की ज़िंदगी बहुत तेज़ थी — ऑफिस, मीटिंग, शहर की दौड़। किसी को गिनती करने का समय नहीं था।

यह सब कब शुरू हुआ

पाँच साल पहले की बात थी। शादी के बाद एक अपना फ़्लैट खरीदना था। ईएमआई का सुझाव हर जगह था।

“30 साल की ईएमआई पर 40 लाख का फ़्लैट? बिल्कुल। कोई बात नहीं,” बैंक अधिकारी ने हँसते हुए कहा था।

फिर एक नई कार चाहिए थी। प्रिया को ऑफिस जाना था। ईएमआई मिल गई।

फिर फर्नीचर। नए सोफ़े के बिना घर अधूरा था, है न? ईएमआई।

फिर फोन, लैपटॉप, एयर कंडीशनर, रसोई के सामान। हर चीज़ का एक भाग तुरंत खरीदो, बाकी महीनों में चुकाओ। हर चीज़ कहती थी: “आप इसके लायक हैं। अभी ले लो।”

जब तक उन्हें होश आया, छत के ऊपर एक पूरा बादल था। उस बादल का नाम था: हर महीने की बकाया।

मार्च की सुबह

एक मार्च की सुबह प्रिया को एक बिल का नोटिफिकेशन मिला। क्रेडिट कार्ड का। 45,000 रुपये। बस एक महीने में।

“यह क्या है?” उसने अंकित को फोन किया।

अंकित ने सोचा — क्रेडिट कार्ड की ईएमआई, किराने की खरीदारी, डाइनिंग आउट… फिर भी 45,000? कुछ गलत लग रहा था।

उस शाम जब अंकित घर आया, प्रिया बैठी थी। सामने एक नोटबुक थी। उस पर सब कुछ लिखा था।

“देखो,” वह बोली। और वह पढ़ने लगा:

घर की ईएमआई: 1,80,000 रुपये
कार की ईएमआई: 45,000 रुपये
फर्नीचर की ईएमआई: 12,000 रुपये
क्रेडिट कार्ड: 35,000 रुपये (जो कि खुद ईएमआई में बदल जाता है)
इंश्योरेंस, टैक्स, पेट्रोल: 18,000 रुपये

कुल: 2,90,000 रुपये।

प्रिया की सैलरी 2,50,000 थी। अंकित की 3,00,000 थी। कुल 5,50,000।

“2,90,000 का मतलब है…” अंकित गिनने लगा। “52 प्रतिशत।”

प्रिया ने सिर हिलाया। “असल में 53। मैंने टैक्स में कटौती के बाद हिसाब किया।”

घर में चुप्पी थी।

अंकित को महसूस हुआ जैसे किसी ने उसके सीने को दबा दिया हो। बाकी 2,60,000 सब कुछ के लिए था — खाना, बिजली, पानी, इंटरनेट, कपड़े, दवा। और बचत। जो बचत थी, वह भी शून्य थी।

साल भर की लड़ाई

पहले दो महीने तो गुस्सा आया। अंकित ने फर्नीचर की ईएमआई बंद करने का सोचा। लेकिन उसमें 40,000 की पेनल्टी थी।

फिर प्रिया का डिप्रेशन शुरू हुआ। उसने अपनी सैलरी का एक हिस्सा प्रधानमंत्री बचत योजना में डाल दिया। ब्याज़ मिलेगा, और कम से कम कुछ बचेगा।

अंकित ने अपना ड्राइविंग लाइसेंस दिखाया — कार को फ्रीएंज़ नहीं करना था, पर कुछ कर सकता था। कार को गहराई से समझ जाने के बाद, उसने सर्विसिंग का खर्च कम किया। स्मार्ट ड्राइविंग करने लगा। पेट्रोल खर्च 18% कम हो गया।

प्रिया ने घर के बजट में मेहनत की। प्लास्टिक का सामान उतारा। सब्जियाँ ऑनलाइन बुलवानी बंद कीं — स्थानीय बाजार से सस्ता था। बाहर खाना सप्ताह में एक बार तक सीमित। दोस्तों के साथ कॉफी की जगह घर पर चाय।

ये छोटे-मोटे बदलाव थे। लेकिन बदलाव थे।

महीनों का सफ़र

तीसरे महीने तक उन्होंने 15,000 बचाए।

छठे महीने में, फर्नीचर की ईएमआई ख़त्म हुई। 12,000 आज़ाद हुए। उसको एक्सट्रा पेमेंट क्रेडिट कार्ड को देने लगे।

नौवें महीने तक क्रेडिट कार्ड क्लियर हो गया। 35,000 और आज़ाद।

साल के आखिर तक, कार की ईएमआई में लगभग 2 लाख का एक्सट्रा पेमेंट कर दिया गया।

आज

इस बार अंकित और प्रिया दोनों को पता था कि पैसा कहाँ जा रहा है। घर की ईएमआई अभी भी थी — वह 24 साल और थी। लेकिन बाकी सब आज़ादी मिल गई थी।

जब कार की आखिरी ईएमआई ख़त्म हुई तो प्रिया रो पड़ी। खुशी से नहीं, राहत से। अंकित को लगा कि उसका वज़न आधा हो गया।

“अब हम क्या करेंगे?” प्रिया ने पूछा।

अंकित मुस्कुराया। “अब हम जीएँगे।”

उन्हें अभी एक और नई कार नहीं लेनी है। एक और फ़्लैट नहीं खरीदना। कुछ भी नहीं। पाँच साल का सबक था: हर महीने जो सचमुच चाहिए, वह खरीदो। बाकी सब इंतिज़ार कर सकता है।

अब वे हर महीने 1,50,000 बचा सकते हैं। छह महीने में 9 लाख। एक साल में 18 लाख।

प्रिया ने एक नई नोटबुक खरीदी। इस पर उसने लिखा: “असली ज़िंदगी यहाँ शुरू होती है।”

शेयर करें:
WhatsApp Facebook Twitter Telegram