रात का तीसरा पहर बीत चुका था, और हनुमान के पास अब बस इतना समय था जितना एक दीया बुझने में लगता है।
लक्ष्मण रणभूमि में मूर्छित पड़े थे। वैद्य सुषेण ने साफ़ कह दिया था कि संजीवनी सूर्योदय से पहले न पहुँची, तो कुछ नहीं बचेगा। इसलिए हनुमान उस रात हवा से भी तेज़ उड़ रहे थे। नीचे अँधेरे जंगल, ऊपर बुझते तारे।
यही वह रात थी जब हनुमान ने अपने जीवन में पहली बार किसी चीज़ के लिए “रुकना” चुना। यही हनुमान और कालनेमि की कहानी का सबसे बड़ा सच है।
लंका में एक सौदा
उधर लंका में रावण को भी वही गणित समझ आ चुका था। अगर सूरज निकलने तक जड़ी न पहुँची, तो राम की सेना की रीढ़ टूट जाएगी।
उसने कालनेमि को बुलाया। मायावी राक्षस, जो रूप बदलने में माहिर था।
“हनुमान को रोक लो,” रावण ने कहा। “बस सुबह तक। मैं तुम्हें आधा राज्य दूँगा।”
कालनेमि चुप रहा। वह जानता था कि इस काम का अंत क्या होगा। जिसने अकेले लंका जला दी, उसे रोकने जाने वाला लौटकर नहीं आता। फिर भी उसने सिर झुका लिया। राक्षस होकर भी उसके मन में एक अजीब-सी बात थी। अगर मरना ही है, तो राम के दूत के हाथों मरना किसी भी राजा के हाथों जीने से बेहतर है।
पर उसने रावण से यह नहीं कहा।
पर्वत की राह में एक आश्रम
हनुमान ने नीचे देखा तो एक छोटा-सा आश्रम दिखा। धूनी जल रही थी, हवा में हवन की सुगंध थी, और बाहर एक तपस्वी शांत बैठा था। जटाएँ, भस्म, माथे पर तिलक। वहाँ कुछ भी राक्षसी नहीं लगता था।
“राम, राम,” तपस्वी ने ऊपर देखकर कहा। “पवनपुत्र, उतर आओ। मैं जानता था कि आज रात तुम इधर से गुज़रोगे।”
हनुमान का मन कहता था कि रुकना ठीक नहीं। पर सामने एक साधु था, और राम-नाम उसके होंठों पर था। हनुमान जिसके मुँह से राम का नाम सुन ले, उसे अनसुना कैसे करता?
वह उतर आया। तपस्वी मुस्कुराया। “मैंने तुम्हारे बारे में बहुत सुना है। थोड़ी देर बैठो। मैं तुम्हें राम की कथा सुनाता हूँ।”
“महाराज, मेरे पास समय नहीं है। लक्ष्मण जी…”
“जानता हूँ,” साधु ने बात काट दी। “पर तुम्हारा गला सूख रहा है, बेटा। थोड़ा जल तो पी लो।”
सच यही था। इतनी लंबी उड़ान के बाद हनुमान का गला सचमुच सूख चुका था। तपस्वी ने पास की झील की तरफ़ इशारा किया। “वहाँ स्नान कर लो, जल पी लो, फिर मैं तुम्हें मंत्र दूँगा। उसे जपते हुए पर्वत पर पहुँचना आसान होगा।”
हनुमान ने झील की तरफ़ पाँव बढ़ाए।
झील का वह मगरमच्छ
पानी काँच जैसा साफ़ था। हनुमान ने जैसे ही घुटनों तक पैर उतारे, किसी ने उनका पाँव पकड़कर नीचे खींच लिया।
पानी में एक विशाल मगरमच्छ था। उसके जबड़े किसी लोहे के फंदे जैसे थे, और वह हनुमान को गहराई की ओर घसीट रहा था।
पर वह भूल गया था कि वह किसे पकड़ रहा है। हनुमान ने दोनों हाथों से उसके जबड़े पकड़े और एक झटके में चीर दिया।
पानी शांत हो गया। और जहाँ मगरमच्छ की देह थी, वहाँ अब एक दिव्य स्त्री खड़ी थी। उसके चेहरे पर आँसू थे, पर वे दुख के नहीं थे।
अप्सरा की आख़िरी बात
“आपने मुझे मुक्त कर दिया, पवनपुत्र,” उसने हाथ जोड़कर कहा। “मैं एक अप्सरा हूँ। एक ऋषि के शाप से मुझे यह रूप मिला था। कहा गया था कि जब कोई रामभक्त मुझे इस रूप में मारेगा, तभी मेरा उद्धार होगा। (कथा की परंपराओं में उसका नाम अलग-अलग मिलता है।)”
फिर उसने हनुमान की आँखों में देखा।
“पर जाने से पहले एक बात सुन लीजिए। जिसे आप साधु समझ रहे हैं, वह साधु नहीं है। वह कालनेमि है, रावण का भेजा हुआ राक्षस। यह झील आपको रोकने का जाल थी। वह आपको सुबह तक यहाँ उलझाए रखना चाहता है।”
हनुमान कुछ पल वहीं खड़े रहे। उन्हें अपने पर क्रोध नहीं आया। बस एक भारी-सी समझ उतरी। बल से कोई उन्हें नहीं रोक पाया था। उन्हें रोका था उनकी अपनी विनम्रता ने।
गुरु-दक्षिणा
वह आश्रम लौटे तो कालनेमि अब भी वहीं बैठा था। वह अब भी मंत्र का ढोंग कर रहा था।
“आइए, पवनपुत्र,” उसने कहा। “आपने स्नान कर लिया। अब मैं आपको दीक्षा दूँ।”
हनुमान ने हाथ जोड़े। “पहले गुरु-दक्षिणा, महाराज।”
और अगले ही क्षण उनकी पूँछ ने कालनेमि को लपेट लिया।
वह राक्षसी रूप में लौट आया। उसने कोई प्रतिरोध नहीं किया। उसकी आँखें हनुमान से मिलीं। और उसके आख़िरी शब्द वही थे जो उसने सुबह से जपे थे। इस बार वे ढोंग नहीं थे।
“राम… राम…”
हनुमान ने उसे पटक दिया। आश्रम की धूनी बुझ गई। पूरब में आकाश अब भी काला था, पर बहुत हल्का सा धुँधलापन उसकी किनारी पर चढ़ने लगा था।
हनुमान ने एक साँस ली और फिर उड़ चले। इस बार बिना रुके।
इस कथा से जुड़े सवाल
कालनेमि कौन था?
कालनेमि रावण का मायावी राक्षस था, जो रूप बदलने में कुशल था। रावण ने उसे संजीवनी की राह में हनुमान को रोकने के लिए भेजा था।
हनुमान ने कालनेमि को कैसे पहचाना?
कथा के अनुसार झील में मगरमच्छ के रूप में फँसी अप्सरा ने मुक्त होकर हनुमान को सच बताया कि वह साधु वास्तव में कालनेमि है।
कालनेमि की यह कथा किस ग्रंथ में मिलती है?
यह प्रसंग तुलसीदास के रामचरितमानस (लंकाकांड) और कुछ अन्य रामकथा परंपराओं में मिलता है। वाल्मीकि रामायण में संजीवनी का प्रसंग तो है, पर कालनेमि का यह प्रसंग नहीं है।
