Mythology

हनुमान और रावण की पहली मुलाकात की कहानी

Rajhussain · 06-October-2026 5 मिनट में पढ़ें
हनुमान और रावण की पहली मुलाकात की कहानी

सभा में सैकड़ों आसन थे, पर उस एक वानर के लिए एक भी नहीं।

हनुमान जी को रस्सियों से बाँधकर रावण के दरबार में लाया गया था। अशोक वाटिका उजड़ चुकी थी, अक्षय कुमार मारा जा चुका था, और इंद्रजित का ब्रह्मास्त्र उन्हें बाँध चुका था। ब्रह्मा जी के उस वरदान का मान रखने के लिए वे चुपचाप बँध गए थे। रस्सियाँ कसी हुई थीं, पर चाल में हार नहीं थी।

दरबार में कदम रखते ही सबसे पहले उनकी नज़र ऊपर गई। रत्नों से जड़ा एक ऊँचा सिंहासन था, और उस पर दस सिर, बीस भुजाएँ। रावण ऐसे बैठा था जैसे उसने पूरी सृष्टि को अपने पैरों तले बिठा रखा हो।

जब किसी ने बैठने को नहीं कहा

रावण ने हनुमान जी को ऊपर से नीचे तक देखा। फिर वह हँसा। सभासद भी हँस पड़े।

किसी ने नहीं कहा कि बैठिए। दूत से बात की जाए तो उसे आसन दिया जाता है, यह नियम हर राजसभा जानती थी। पर रावण ने जान-बूझकर वह नियम तोड़ा। बिना कहे उसने जता दिया कि यह वानर उसकी नज़र में दूत नहीं, एक जानवर है।

हनुमान जी ने चारों ओर देखा। खड़े रहना उनके लिए कठिन नहीं था। पर खड़े रहने का मतलब था रावण के सामने सिर उठाकर, फिर भी नीचे रहना। और यह वे रामदूत होकर स्वीकार नहीं कर सकते थे।

वे मुस्कुराए।

पूँछ का सिंहासन

धीरे-धीरे उन्होंने अपनी पूँछ को सरकाना शुरू किया। एक घेरा, फिर दूसरा, फिर तीसरा। पूँछ कुंडली बनती गई और ऊपर उठती गई। जब तक सभासदों की हँसी थमती, तब तक हनुमान जी उसी कुंडली पर बैठे थे, और वह कुंडली रावण के सिंहासन से ऊँची थी।

दरबार में सन्नाटा छा गया।

अब रावण को सिर उठाकर ऊपर देखना पड़ रहा था। जिस आदमी ने पूरी सभा में यह तय कर रखा था कि कौन ऊँचा बैठेगा और कौन नीचे, उसी के आगे किसी ने बिना माँगे अपना आसन बना लिया।

रावण की मुस्कान पहली बार टेढ़ी हुई।

दूत जो डरा नहीं

“तू कौन है?” रावण ने गरजकर पूछा। “किसके बल पर लंका में घुसा? मेरे पुत्र को मारा, मेरी वाटिका उजाड़ी। क्या तुझे मृत्यु का भय नहीं?”

हनुमान जी ने कोई जल्दी नहीं की। उनकी आवाज़ ऊँची नहीं थी, पर पूरी सभा में गई।

“मैं श्रीराम का दूत हूँ। जिन्होंने खर और दूषण को मारा, जिन्होंने बालि का वध किया, मैं उन्हीं का सेवक हूँ। और मैं यहाँ आपके भले के लिए आया हूँ। सीता माता को सम्मान के साथ लौटा दीजिए।”

फिर उन्होंने वह बात कही जो इस दरबार में किसी ने रावण से कभी नहीं कही थी।

“आप तप से पाया हुआ बल, ब्रह्मा का दिया वरदान, सारी तपस्या एक पराई स्त्री के कारण दाँव पर लगा रहे हैं। जिस राज्य के राजा को धर्म की बात बुरी लगने लगे, उसकी नींव उसी दिन हिलने लगती है। मेरी बात मान लीजिए। राम से बैर करके देवता, दानव, गंधर्व, कोई भी नहीं बचा है।”

रावण का चेहरा तमतमा उठा। उसने आदेश दिया कि इस वानर को मार डालो।

विभीषण का एक वाक्य

तभी सभा के एक कोने से एक आवाज़ उठी। विभीषण खड़े हुए।

“महाराज, दूत का वध नहीं होता। यह हर देश, हर नीति का नियम है। दूत को दंड देना हो तो अंग-भंग कर दीजिए, कोई और सज़ा दीजिए, पर प्राण मत लीजिए।”

रावण ने कुछ देर विभीषण को देखा। फिर उसकी आँखों में एक क्रूर चमक आई।

“वानरों को अपनी पूँछ बहुत प्यारी होती है,” उसने कहा। “इसकी पूँछ में आग लगा दो। इसी को जलती हुई पूँछ के साथ गली-गली घुमाओ।”

सभा खिलखिलाई।

पूँछ के सिंहासन पर बैठे हनुमान जी ने भी एक बार आँखें बंद कीं, और जब खोलीं तो उनकी आँखों में डर नहीं था। जिन्हें मालूम हो कि सज़ा देने वाला खुद अपनी मौत का सामान जुटा रहा है, उनकी आँखों में डर कैसे आए?

आग से पहले की आख़िरी बात

उस दिन के बाद क्या हुआ, यह सबको मालूम है। जलती पूँछ, जलती लंका। पर वह एक अलग कहानी है, और उसकी चर्चा यहाँ नहीं।

यहाँ बस इतना याद रखना है कि लंका की सबसे बड़ी हार उस दिन आग में नहीं हुई थी। वह हार तब हुई जब हनुमान जी की पूँछ रावण के सिंहासन से ऊँची उठी थी, और दस सिरों वाले राजा को पहली बार अपनी ही सभा में सिर उठाकर बात करनी पड़ी थी।

इस कथा से जुड़े सवाल

क्या हनुमान जी की पूँछ का सिंहासन वाल्मीकि रामायण में है?
वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड में रावण की सभा, हनुमान जी का उपदेश और विभीषण का दूत-अवध्यता वाला तर्क मिलता है। पूँछ को कुंडली बनाकर ऊँचा आसन बनाने का प्रसंग लोक-परंपरा और बाद की रामकथाओं में अधिक प्रचलित है।

रावण ने हनुमान जी को मारा क्यों नहीं?
विभीषण ने नीति याद दिलाई कि दूत का वध नहीं किया जाता। इसी कारण रावण ने प्राणदंड की जगह पूँछ जलाने का आदेश दिया।

हनुमान जी रावण की सभा में बँधकर क्यों गए?
इंद्रजित ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था। हनुमान जी ने ब्रह्मा जी के वरदान का मान रखा और स्वयं को बँधने दिया, ताकि वे रावण से सीधे मिल सकें।

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