Mythology

हनुमान लंका दहन की कहानी — जब रावण की हँसी ही उसके महल की चिता बन गई

Rajhussain · 26-August-2026 5 मिनट में पढ़ें
हनुमान लंका दहन की कहानी — जब रावण की हँसी ही उसके महल की चिता बन गई

रावण की सभा में उस दिन ठहाके गूँज रहे थे।

एक वानर — सिर्फ एक वानर — उसके सिंहासन के सामने बंधा खड़ा था, और रावण हँस रहा था। इतनी ज़ोर से कि सोने के खंभों से टकराकर उसकी हँसी सभा में दोहरी होकर लौट आती थी। “इसे मारना नहीं,” उसने मंत्रियों से कहा, “एक वानर को मारने से कोई कीर्ति नहीं मिलती। इसकी पूँछ में आग लगाओ, और इसे पूरी लंका में घुमाओ — ताकि हर घर देखे कि राम का दूत कैसा दिखता है जब वो जलता है।”

यह हनुमान लंका दहन की कहानी की शुरुआत है — लेकिन शुरुआत हनुमान से नहीं, रावण के इस एक भ्रम से होती है: उसे लगा वो अपमान कर रहा है। उसे पता नहीं था कि वो आग को निमंत्रण दे रहा है।

जब मंत्री कपड़ा और तेल लपेट रहे थे

राक्षस हँसते हुए हनुमान की पूँछ में पुराने कपड़े लपेट रहे थे। परत दर परत — जैसे किसी उत्सव की तैयारी हो। घी और तेल डाला गया। हनुमान चुप खड़े रहे। उन्होंने न विरोध किया, न कोई शक्ति दिखाई। उनकी आँखें सभा में घूम रही थीं — सोने के खंभे, रत्नजड़ित छत, रेशम के पर्दे। हर कोने में दौलत इतनी थी कि आँखें चौंधिया जाएँ।

एक बूढ़ा मंत्री, जो कोने में चुपचाप यह सब देख रहा था, बुदबुदाया — “इतना बड़ा राजा, और डर एक वानर की पूँछ से है।” किसी ने उसकी बात नहीं सुनी। सुननी चाहिए थी।

पूँछ में आग लगाई गई। सभा तालियों से गूँज उठी। रावण अपने सिंहासन से आगे झुका, यह देखने के लिए कि वानर दर्द से कैसे तड़पता है।

हनुमान ने अपनी पूँछ की तरफ देखा। और मुस्कुरा दिए।

लंका दहन की कहानी का वो मोड़ जो कोई नहीं देख पाया

रावण ने जो मुस्कुराहट देखी, उसे उसने अपनी जीत समझा। असल में वो कुछ और था — एक फैसला।

बंधन खुद-ब-खुद ढीले पड़ने लगे। हनुमान उछले, महल की मुंडेर पर जा बैठे, और वहाँ से देखा — पूरी लंका, सोने की छतें, रत्नों से जड़ी हवेलियाँ, एक के बाद एक, क्षितिज तक फैली हुई। रावण अब भी हँस रहा था, अपने सैनिकों को इशारा कर रहा था कि वानर को छत से नीचे गिराया जाए।

हनुमान ने एक छलांग लगाई। जलती हुई पूँछ पहली छत को छू गई।

आग ने वैसे ही जवाब दिया जैसे तेल-भीगा कपड़ा हमेशा देता है — फैलकर।

जब सोने की लंका ने पहली बार अपना असली रंग दिखाया

एक छत से दूसरी, दूसरी से तीसरी। हनुमान छलाँगें लगाते गए, और हर छलाँग के साथ रावण की हँसी थोड़ी और फीकी पड़ती गई।

नीचे सभा में अब सन्नाटा था। वही बूढ़ा मंत्री खिड़की के पास खड़ा था, अपनी ही भविष्यवाणी को सच होते देख रहा था। रावण उठ खड़ा हुआ, उसकी मुट्ठियाँ भिंच गईं, पर अब आदेश देने को कुछ बचा नहीं था — आग किसी सेनापति की नहीं सुनती।

लंका जल रही थी, और जो चीज़ सबसे तेज़ जल रही थी, वो रावण का यह विश्वास था कि वो अजेय है।

रात भर आसमान नारंगी रहा। समुद्र की लहरें भी उस रोशनी में चमकती दिखीं, जैसे पूरा संसार यह देखने आया हो कि घमंड की चमक और आग की चमक में फ़र्क़ कितना कम होता है।

पूँछ बुझी, पर एक सच जल कर हमेशा के लिए रह गया

सुबह जब पूँछ की आग खुद बुझ गई, हनुमान समुद्र किनारे खड़े थे। पीछे लंका से धुआँ उठ रहा था — काला, धीमा, थका हुआ धुआँ, जैसे रात भर की गर्जना के बाद शहर खुद हांफ रहा हो।

उन्होंने न कोई घोषणा की, न पीछे मुड़कर देखा। समुद्र लांघकर वापस लौटना था — सीता माता को यह खबर देनी थी कि राम आ रहे हैं।

रावण उस दिन सभा में फिर बैठा, पर उसकी सोने की दीवारों पर अब कालिख थी। किसी ने उसे याद दिलाने की हिम्मत नहीं की, पर हर कोई जानता था — जो हँसी उसने एक बंधे हुए वानर पर उड़ाई थी, वही हँसी लौटकर उसके ही महल को जला गई।

यही हनुमान लंका दहन की कहानी का सच है — आग किसी और के लिए जलाई गई थी, पर जल वही गया जिसने उसे जलाने का आदेश दिया।

इस कथा से जुड़े सवाल

हनुमान जी की पूँछ में आग किसने और क्यों लगाई थी?
रावण के आदेश पर मेघनाद और राक्षसों ने हनुमान जी को बंदी बनाकर उनकी पूँछ में कपड़ा-तेल लपेटकर आग लगाई थी, ताकि उन्हें पूरी लंका में घुमाकर अपमानित किया जा सके।

क्या हनुमान जी की पूँछ की आग से उन्हें कोई कष्ट हुआ था?
सुंदरकांड के अनुसार हनुमान जी को स्वयं भगवान अग्नि और वायु देव का आशीर्वाद प्राप्त था, इसलिए आग ने उन्हें कोई हानि नहीं पहुँचाई — बल्कि वो आग खुद उनके संकल्प का हथियार बन गई।

लंका दहन के बाद हनुमान जी ने क्या किया?
आग बुझाने के लिए समुद्र में डुबकी लगाने के बाद हनुमान जी वापस माता सीता से मिले, उन्हें आशीर्वाद लिया, और फिर समुद्र लांघकर श्रीराम के पास लौट गए यह संदेश देने कि माता सीता सकुशल हैं।

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