बारिश होने से पहले का वो वक्त होता है ना — जब हवा थोड़ी ठंडी हो जाती है और आसमान का रंग बदलने लगता है — उसी वक्त दादी के पुराने संदूक में से एक छाता निकला।
छाता था भी अजीब। हरे-नीले रंग का, पर उसमें तारे थे — वो तारे जो रात में चमकते नहीं, बल्कि दिन में।
आठ साल की नव्या ने छाता उठाया और खोला।
और उसी पल कुछ हुआ।
छाता बोला — बोला नहीं, गुनगुनाया, जैसे दूर से आती हुई कोई धुन।
“जहाँ जाना चाहो, सोचो। पर मैं सिर्फ वहाँ उड़ूँगा — जहाँ तुम दयालु हो।”
नव्या ने सोचा, ये कैसा छाता है।
उसने सोचा — जंगल। जहाँ बड़े-बड़े पेड़ हों, और उनके बीच से रोशनी आती हो।
छाता हिला।
उठा।
और फिर… रुक गया।
नव्या के घर के सामने एक बूढ़ा आम का पेड़ था। उसी पेड़ की एक डाल पर एक चिड़िया बैठी थी — चोंच में तिनका, पर डाल बहुत पतली, और तिनका गिरता जा रहा था।
छाता वहीं रहा — हवा में, आधा उठा हुआ।
नव्या समझ गई।
वो नीचे गई। पेड़ के पास जाकर उसने एक मोटी डाल की तरफ तिनका धीरे से धकेल दिया।
चिड़िया ने पीछे मुड़कर देखा — जैसे शुक्रिया कह रही हो।
और छाता — अचानक हल्का हो गया।
ऊपर।
जंगल आया। सच में आया।
हरे पत्ते, गीली मिट्टी की खुशबू, और एक झरना जो दूर से संगीत की तरह सुनाई दे रहा था।
नव्या दौड़ी। झरने के पास पहुँची। पानी में हाथ डाला — ठंडा था, बिल्कुल वैसा जैसा दादी के घर वाले कुएँ का पानी।
तभी उसे दिखा — एक छोटा लड़का। उससे भी छोटा। शायद पाँच साल का। झरने के पास खड़ा था, पर रो नहीं रहा था — बस घबराया हुआ था। उसका रास्ता भटक गया था।
नव्या रुकी।
उसके मन में आया — मैं अभी और आगे जाऊँ। नदी देखूँ। बड़ा झरना देखूँ।
पर उस लड़के का चेहरा…
नव्या उसके पास गई।
“कहाँ जाना है तुम्हें?”
“उस पेड़ के पास जहाँ मेरी माँ बैठी हैं।”
“चलो, मैं छोड़ती हूँ।”
जब नव्या वापस आई — छाता पहले से ज़्यादा चमक रहा था। तारे, जो दिन में नहीं दिखते, अब दिख रहे थे।
“अब कहाँ?” — धुन फिर गुनगुनाई।
नव्या ने सोचा — समुद्र।
और इस बार छाता एक पल भी नहीं रुका।
समुद्र नीला था — पर नीला भी अजीब। जैसे किसी ने नीले रंग में थोड़ा हरा और थोड़ा सोना मिला दिया हो।
नव्या नंगे पाँव चली। रेत में पैर धँसते, लहरें आतीं, लौट जातीं।
वहाँ एक बड़ी सीपी पड़ी थी — सुंदर, चमकीली, गुलाबी।
नव्या ने उठाई।
“यह मैं रखूँगी।”
छाता थोड़ा झुका — जैसे आसमान का एक कोना भारी हो गया हो।
नव्या ने सीपी को देखा।
फिर उसे याद आया — छोटी सी मछली जो सीपी के पीछे छुपी थी। जो उसी सीपी में रहती होगी।
नव्या ने सीपी वापस रखी — बिल्कुल वहीं, उसी तरफ जैसे पड़ी थी।
“रहो यहाँ।”
छाता फिर हल्का हो गया।
शाम को नव्या घर पहुँची।
दादी बाहर बैठी थीं। उन्होंने छाता देखा — और कुछ नहीं कहा। बस मुस्कुराईं।
“दादी, यह छाता तो अजीब है।”
“हाँ।”
“यह बताता है कहाँ जाना है?”
“नहीं।” दादी ने कहा। “यह सिर्फ तुम्हें ले जाता है — जब तुम खुद से तैयार होती हो।”
नव्या ने छाता बंद किया।
तारे अब भी दिख रहे थे।
वो रात, जब नव्या सोने गई, उसने आँखें बंद करने से पहले सोचा — कल कहाँ जाऊँगी?
पर उसे पता था — यह सवाल ज़रूरी नहीं था।
ज़रूरी यह था कि जब छाता रुके — वो भी रुके। देखे। समझे।
बाकी सब — छाता जानता था।
रात को, खिड़की के पास रखे उस छाते पर, चाँद की रोशनी पड़ी।
और तारे — जो दिन में चमकते हैं — थोड़ा और चमके।