रात के तीसरे पहर महल की खिड़की के पास एक बूढ़ी औरत बैठी थी।
उसके हाथ काँप रहे थे — पर ठंड से नहीं। सर्दी तो थी, लेकिन शाल मोटी थी। हाथ काँप रहे थे क्योंकि वो ऊपर देख रही थी। आसमान की तरफ। उसी एक तारे की तरफ जो वर्षों से वहीं था, उसी जगह, हिले बिना।
बाकी सब तारे रात भर में अपनी जगह बदल लेते थे। पूरब से उठते, पश्चिम में डूबते। पर वो एक तारा — उत्तर में टँगा हुआ — कभी नहीं हिला था। उसी जगह। ठीक उसी जगह जहाँ उसे पहली बार देखा था।
सुरुचि ने आँखें मूँद लीं।
पचपन साल हो गए थे।
उस दिन की हवा भी ऐसी ही थी। हल्की ठंड। महल के कमरे में अंगीठी जल रही थी। राजा उत्तानपाद सिंहासन पर बैठे थे, और उनकी गोद में एक छोटा सा बच्चा था — पाँच साल का। नीली आँखों वाला। उत्तरा का बेटा। ध्रुव।
सुरुचि उस वक्त जवान थी। बहुत सुंदर। राजा की प्रिय रानी। उसका अपना बेटा उत्तम भी वहीं था, पर वो उसकी गोद में नहीं था — वो खेल रहा था कहीं। और राजा ने उस दूसरे बच्चे को, उत्तरा के बच्चे को, अपनी गोद में बिठा रखा था।
सुरुचि के अंदर कुछ चटका था। बहुत महीन सा। एक आवाज़ जो उसे आज भी याद थी।
उसने आगे बढ़कर उस बच्चे को राजा की गोद से उतार दिया।
बस इतना ही।
पर शब्द? शब्द भी थे।
“तुम्हें राजा की गोद में बैठना है? पहले मेरे पेट से जन्म लो, ध्रुव। तुम सुरुचि का बेटा नहीं हो। तुम उत्तरा के बेटे हो। तुम्हारा यहाँ कोई स्थान नहीं।”
ये शब्द उसने कहे थे।
ये शब्द उसने एक पाँच साल के बच्चे से कहे थे।
बूढ़ी सुरुचि ने आँखें खोलीं। आसमान वैसा ही था। तारा वैसा ही था। पर उसकी आँखों में पानी आ गया था — और ये पहली बार नहीं था। पचपन साल में कितनी बार इन्हीं शब्दों ने उसे रात के बीच में उठाया था, उसे खुद नहीं पता।
बच्चा कुछ बोला नहीं था उस दिन।
सुरुचि को आज भी ये बात सबसे ज़्यादा सताती थी। अगर वो रोता, चिल्लाता, ज़िद करता — तो शायद वो उसे गले लगा लेती। माफी माँग लेती। पर वो कुछ बोला नहीं। बस उसकी नीली आँखों ने सुरुचि को देखा था — एक पल — और फिर वो धीरे से नीचे उतर गया था। चुपचाप।
और चला गया था।
राजा उत्तानपाद ने भी कुछ नहीं कहा था। सुरुचि को रोका नहीं। बच्चे को बुलाया नहीं। राजा अपनी प्रिय रानी की बात नहीं काट पाए — और बाद में, कई सालों तक, सुरुचि ने सोचा था कि शायद उस दिन सबसे बड़ा अपराध राजा का था, उसका नहीं।
पर ये बात उसने खुद से कभी देर तक नहीं कही। क्योंकि अंदर ही अंदर उसे पता था।
हाथ उसका था। शब्द उसके थे।
बच्चा अपनी माँ के पास गया। उत्तरा — वो दूसरी रानी, जिसे सुरुचि ने कभी आँख उठाकर नहीं देखा था। वो भी कुछ नहीं बोली। सुरुचि ने सुना था बस इतना — कि उत्तरा ने बच्चे से कहा था, “जा, उस भगवान के पास जा जो किसी के लिए छोटा-बड़ा नहीं करता।”
और बच्चा चला गया था। जंगल की तरफ।
पाँच साल का।
सुरुचि ने उस रात अपने बेटे उत्तम को सीने से लगाकर सुलाया था। और सोचा था — चलो, अच्छा हुआ। मेरा बेटा सुरक्षित है। उत्तानपाद के बाद राजा यही होगा। उत्तरा का बेटा अब कोई खतरा नहीं।
ये उसका सबसे काला विचार था।
ये विचार उसने पचपन साल अपने अंदर ढोया था।
जंगल से कोई खबर नहीं आई। महीने बीते। राजा ने सिपाही भेजे — कोई नहीं मिला। उत्तरा हर रोज़ सूर्योदय से पहले उठती, मुँह धोती, और जंगल की दिशा में हाथ जोड़कर खड़ी रहती। सुरुचि उसे महल की खिड़की से देखती।
पहले-पहले उसे इस पर हँसी आती थी। फिर एक दिन हँसी आनी बंद हो गई।
एक रात — कोई बारह महीने बाद होगा — सुरुचि अपने कमरे में अकेली बैठी थी। उत्तानपाद कहीं और सो रहे थे। उत्तम पास के कमरे में था। महल चुप था।
उसने खिड़की से बाहर देखा।
और देखा।
उत्तर दिशा में एक नया तारा था। ठीक वहाँ जहाँ पहले कुछ नहीं था। चमकीला। ठहरा हुआ। जैसे किसी ने आसमान पर कील ठोक दी हो।
उस रात महल में एक ऋषि आए थे — नारद। उन्होंने राजा को बताया। और राजा ने सुरुचि को बुलाकर बताया। आवाज़ में न क्रोध था, न शिकायत। बस थकान।
“वो लौटा है, सुरुचि।”
“कौन?”
“ध्रुव। तपस्या से। भगवान विष्णु ने उसे वरदान दिया है — वो अब ध्रुव तारा है। अटल। कभी नहीं हिलेगा।”
सुरुचि के हाथ से दिया गिर गया था उस रात। और जला नहीं।
बूढ़ी सुरुचि ने अपनी शाल कसकर खींची।
बाकी सब तो वो जानती थी — हर बच्चा जानता है। ध्रुव की तपस्या। भगवान विष्णु का प्रकट होना। आसमान में अमर स्थान। ये कथा अब हर घर में सुनाई जाती थी। बच्चे रात को छत पर लेटकर उँगली से उत्तर दिशा में इशारा करते — “वो रहा ध्रुव तारा।”
पर एक बात कोई नहीं सुनाता था। कोई कथा नहीं कहती थी।
कि उस बच्चे को जंगल भेजने वाली औरत कैसे जीती है।
पचपन साल।
उत्तानपाद चले गए। उत्तम — उसका अपना बेटा — राजा बना। फिर उत्तम भी एक युद्ध में मारा गया। उसका कोई पुत्र नहीं था। राज्य ध्रुव के वंश को दिया गया — क्योंकि ध्रुव के बेटे थे, उत्सर्ग और भव्य। ध्रुव खुद तो आसमान में था, पर उसका वंश पृथ्वी पर रह गया था।
सुरुचि ने राज्याभिषेक देखा था। दूर से। एक खिड़की से।
उसे कोई नहीं बुलाता था अब। न मंत्री, न पुरोहित, न सेवक। वो महल के एक कोने में रहती थी — बूढ़ी, अकेली, चुप। दासियाँ रोटी रख जातीं। पानी रख जातीं। कोई बात नहीं करता था।
और हर रात — हर एक रात, पचपन साल से — वो उस खिड़की पर बैठती थी।
और उत्तर दिशा देखती थी।
कभी-कभी उसे लगता था कि तारा उसे देख रहा है।
ये पागलपन था। उसे पता था। तारा एक तारा है। चमकता है, चुप है, स्थिर है। पर जब इंसान बहुत अकेला हो, और बहुत दोषी हो, तो आसमान भी जवाब देने लगता है।
कभी रात को वो धीरे से बोलती — “मुझे माफ कर दो।”
तारा चुप रहता।
कभी कहती — “मैं तब बहुत जवान थी। मुझे पता नहीं था।”
तारा चुप रहता।
कभी कहती — “तुम पाँच साल के थे।”
तारा चुप रहता।
सबसे मुश्किल बात ये थी — ध्रुव कभी नहीं हिला था। वो तारा वहीं था जहाँ पहली रात देखा था। हर रात सुरुचि उसी जगह उसे देखती। हर रात।
और सुरुचि बूढ़ी होती गई।
उसके बाल सफेद हुए। हाथ काँपने लगे। आँखों में मोतियाबिंद आया। दाँत गिरे। पर वो तारा — वो छोटा सा बच्चा जो अब तारा था — वैसा ही था। वैसा ही चमकीला। वैसा ही अटल।
और इसी में उसका सबसे बड़ा दंड था।
वो बच्चा कभी नहीं बढ़ा।
जिस उम्र में उसने उसे राजा की गोद से उतारा था, उसी उम्र में वो आसमान में रुक गया था। पाँच साल का। हमेशा के लिए पाँच साल का।
सुरुचि कभी नहीं भूल पाई कि उसकी आँखें कैसी थीं उस दिन। कैसे उसने उतरते वक्त एक पल को सुरुचि की तरफ देखा था। कुछ नहीं कहा था। बस देखा था।
वो आँखें अब आसमान में थीं।
आज रात कुछ अलग था।
सुरुचि को पता था। वो बहुत साल जी चुकी थी — अब शरीर थक रहा था। साँस छोटी हो रही थी। सीना भारी था। ये उसकी आखिरी रातों में से एक थी। शायद आखिरी।
उसने खिड़की के पास अपनी कुर्सी और थोड़ी सरकाई।
तारा वहीं था।
उसने अपनी बूढ़ी, सूखी हथेली ऊपर उठाई — जैसे छूना चाहती हो। पचपन साल पहले इसी हथेली ने एक बच्चे को धक्का दिया था। अब वही हथेली काँपती हुई, हवा में, उसी बच्चे की तरफ बढ़ रही थी।
उसकी आँखें भर आईं।
“बेटा,” उसने धीरे से कहा।
ये शब्द उसने पचपन साल में कभी नहीं कहा था। एक बार भी नहीं। न मन में, न ज़ुबान पर। उसने उसे हमेशा “उत्तरा का बेटा” कहा था। “वो बच्चा” कहा था। “ध्रुव” कहा था।
“बेटा” — कभी नहीं।
“बेटा,” उसने फिर कहा। इस बार आवाज़ टूट गई।
तारा चुप था। पर उसकी रोशनी — शायद ये उसका भ्रम था, शायद बूढ़ी आँखों का धोखा — पर उसे लगा रोशनी एक पल को थरथराई।
“ध्रुव।”
उसने उसका नाम लिया।
पचपन साल में पहली बार — बिना घृणा के, बिना तुलना के, बिना उसे “वो” बनाए — सिर्फ उसका नाम।
“ध्रुव।”
खिड़की से ठंडी हवा आई। दिया बुझ गया। सुरुचि की हथेली नीचे गिर गई — गोद में।
वो वहीं बैठी रही। आसमान देखती रही।
तारा वहीं था। हमेशा की तरह।
पर अब, पहली बार, सुरुचि को लगा वो अकेली नहीं थी।