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कन्या पूजन की कहानी: वो सुबह जब पापा ने पहली बार मेरे पैर छुए

Rajhussain · 21-August-2026 5 मिनट में पढ़ें
कन्या पूजन की कहानी: वो सुबह जब पापा ने पहली बार मेरे पैर छुए

पौने छह बजे माँ ने मुझे नींद से हिलाया — “उठ इरा, आज तू देवी है।”

मैं आठ साल की थी, और मुझे “देवी” शब्द का मतलब सिर्फ इतना समझ आता था कि आज स्कूल नहीं जाना, नए कपड़े पहनने हैं, और पूरी-हलवा-चने खाने को मिलेंगे। दादी ने लाल चुनरी मेरे सिर पर डाली, माथे पर टीका लगाया, पैरों में महावर रचाई — जैसे हर साल अष्टमी को रचाती थीं।

फर्क सिर्फ इतना था कि हर साल इस दिन गली की छह-सात लड़कियाँ आती थीं, पूरा आँगन भर जाता था, और मैं उनमें से बस एक होती थी — एक कतार में बैठी, एक थाली में खाती। इस साल बारिश और छुट्टियों की वजह से कोई नहीं आ पाई। दादी ने आँगन में झाँका, फिर मेरी तरफ देखा, फिर रसोई की तरफ आवाज़ लगाई — “बहू, आज इरा ही अकेली कन्या है। पूजा तो होनी है, चाहे एक हो चाहे सात।”

जब पापा ने पहली बार मेरी थाली सजाई

पापा दुकान के लिए तैयार हो चुके थे, जूते पहन ही रहे थे कि दादी ने रोक दिया — “आज तुम पूजा करोगे। सोमेश आज घर पर नहीं, तुम्हारी माँ की तबीयत ठीक नहीं। आज तुम बैठोगे थाली लेकर।”

मुझे याद है, पापा का चेहरा एक पल के लिए अटक गया था। पापा और मैं — हम दोनों के बीच बातचीत ज़्यादातर “होमवर्क हुआ?” और “हाँ पापा” तक सीमित रहती थी। भैया के साथ वो क्रिकेट खेलते, स्कूटर पर बिठाकर मेले ले जाते। मेरे लिए वो हमेशा एक अच्छे इंसान थे, पर थोड़े दूर के — जैसे कोई पड़ोसी जिससे मन तो लगता है, पर घर एक नहीं।

दादी ने मुझे लकड़ी की चौकी पर बिठाया। पापा सामने बैठे, थाली में हल्दी-कुमकुम, चावल, एक कटोरी पानी और एक तौलिया रखा। उनके हाथ थोड़े काँप रहे थे — शायद पहली बार किसी की थाली सजा रहे थे, वो भी अपनी बेटी की।

पैर धोते वक्त जो बात उन्होंने कभी नहीं कही

पापा ने मेरे दोनों पैर अपनी हथेलियों में लिए। पानी हल्का ठंडा था, मैं हँस पड़ी। उन्होंने धीरे-धीरे धोया, तौलिये से पोंछा — जैसे कोई नाज़ुक चीज़ सँभाल रहा हो जिसे तोड़ने का डर हो।

फिर उन्होंने माथे पर टीका लगाया। हाथ रुक गया। मैंने ऊपर देखा — पापा की आँखों में पानी था, वो पानी जो मैंने कभी नहीं देखा था, न दादा की मृत्यु पर, न किसी और मौके पर।

“पापा, क्या हुआ?” मैंने पूछा।

उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस अपना सिर झुकाया, और अपने दोनों हाथों से मेरे पैर छुए — पूरी तरह से, माथा लगभग मेरे घुटनों तक, जैसे कोई सच में देवी के आगे झुकता है, रस्म निभाने के लिए नहीं।

दादी ने बाद में बताया — पापा जब पैदा हुए थे, तब उनके पापा यानी मेरे दादा-परदादा ने तीन बेटियों के बाद बेटा होने पर पूरे गाँव में मिठाई बाँटी थी। और जब मैं पैदा हुई, दूसरी संतान, पहली बेटी — दादी कहती हैं पापा ने एक हफ्ते तक ठीक से मुझे गोद नहीं लिया था। उन्हें बेटा चाहिए था। यह बात कभी शब्दों में नहीं आई, पर घर में एक हवा की तरह तैरती रही, जिसे मैं बड़ी होकर भी ठीक से पकड़ नहीं पाई थी।

आज, उस थाली के सामने बैठे, वो हवा शायद पहली बार टूटी।

एक थाली, एक चुनरी, और वो चुप्पी जो सालों बाद टूटी

पूरी-हलवा खिलाते वक्त पापा की हथेली मेरे हाथ के नीचे थी। उन्होंने न कोई माफ़ी माँगी, न कोई भाषण दिया। बस चुपचाप खिलाते रहे, बीच-बीच में मेरा चेहरा देखते रहे — जैसे कोई पहली बार किसी को ठीक से देख रहा हो।

अंत में उन्होंने एक लाल पर्स दिया, जिसमें दो सौ रुपये और एक चूड़ी थी। मैंने पूछा, “पापा, हर साल तो आप दुकान चले जाते थे।”

उन्होंने बस इतना कहा — “इस साल देखने का मौका मिला।”

अष्टमी के बाद भी जो बदला रह गया

उस दिन के बाद कुछ खास नहीं बदला — स्कूल वैसा ही रहा, भैया अब भी क्रिकेट खेलते, पापा अब भी सुबह जल्दी दुकान जाते। पर एक छोटी बात बदल गई। अब जब मैं स्कूल के लिए निकलती, पापा दरवाज़े तक आकर मेरा माथा छूते, जैसे उस दिन की गूँज हर सुबह लौट आती हो।

पिछले साल, जब मैं सोलह की हो गई और घर में फिर पूरा आँगन कन्याओं से भर गया, पापा ने फिर से थाली उठाई — इस बार दादी के कहने पर नहीं, अपनी मर्ज़ी से। और जब उन्होंने मेरे पैर छुए, उनकी आँखें फिर गीली हुईं, इस बार बिना किसी हिचक के।

इस कथा से जुड़े सवाल

कन्या पूजन क्यों किया जाता है?
नवरात्रि की अष्टमी या नवमी पर छोटी लड़कियों को देवी दुर्गा का रूप मानकर पूजा जाता है, क्योंकि माना जाता है कि कन्या रूप में देवी स्वयं घर आती हैं। इसे कंजक पूजा भी कहा जाता है।

अष्टमी और नवमी में से कौन सा दिन सही है?
यह पूरी तरह पारिवारिक परंपरा और पंचांग पर निर्भर करता है — कुछ परिवार अष्टमी को करते हैं, कुछ नवमी को, कुछ दोनों दिन।

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