उस सुबह जब कृष्ण मेरे पास आए, आकाश में अभी भी तारे थे।
वो एक ब्राह्मण के वेश में थे। सफेद धोती, माथे पर विभूति, हाथ में कमंडल। पर उनकी आँखें — वो आँखें किसी ब्राह्मण की नहीं थीं। उनमें वो सब था जो मैंने कभी देखा नहीं था। जैसे किसी ने ब्रह्मांड को समेटकर दो पुतलियों में रख दिया हो।
“तुम युद्ध में जाना चाहते हो?” उन्होंने पूछा।
मैंने कहा — हाँ।
“किसकी तरफ से?”
“जो कमज़ोर होगा, उसकी तरफ से। यही मेरी माँ का वचन है।”
वो मुस्कुराए। पर उस मुस्कुराहट में कुछ था — एक दरवाज़ा जो खुल रहा था और बंद भी हो रहा था एक साथ।
“तो सुनो,” उन्होंने कहा। “अगर तुम पाण्डवों की तरफ लड़े, कौरव कमज़ोर हो जाएँगे। फिर तुम कौरवों की तरफ जाओगे। पाण्डव कमज़ोर होंगे। फिर वापस। फिर वापस। इस तरह अंत में सिर्फ तुम बचोगे — दोनों सेनाओं के टुकड़े तुम्हारे पैरों के नीचे।”
मैं चुप रहा।
“तुम्हारे तीन बाण पूरे युद्ध को एक पल में समाप्त कर सकते हैं। पर धर्म का युद्ध किसी एक पल में नहीं होता। वो अठारह दिन में होता है। हर दिन अपना अर्थ लेकर आता है।”
फिर उन्होंने जो माँगा — वो इतना सीधा था कि मैं समझ ही नहीं पाया पहले।
मेरा सिर।
गुरुदक्षिणा में।
मैं बर्बरीक हूँ। भीम का पोता। घटोत्कच का बेटा। वो योद्धा जो कभी नहीं लड़ा।
और यही मेरी कहानी है।
जब सिर धड़ से अलग होता है, तो एक अजीब बात होती है।
दर्द एक पल के लिए होता है — जैसे बिजली कड़की और गई। उसके बाद एक शांति है जिसका कोई नाम नहीं। शरीर जो है, वो अचानक बोझ नहीं रहा। जो माँसपेशियाँ थीं, जो तनाव था, जो भूख-प्यास-थकान की पर्त थी — सब एक साथ उतर गई।
पर मैं था।
मैं देख सकता था। सुन सकता था। सोच सकता था।
कृष्ण ने मुझे उस पहाड़ी की चोटी पर रखा जहाँ से पूरा कुरुक्षेत्र दिखता था। उन्होंने मुझसे वादा किया था — युद्ध देखने का। और उन्होंने वादा निभाया।
अठारह दिन। मैंने सब देखा।
पहले दिन सुबह जब दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हुईं, मैंने सोचा था — इसमें क्या है जो मैं अपने शरीर से नहीं देख सकता था?
पर फिर मुझे समझ आया।
शरीर के साथ देखने का मतलब होता है — किसी एक की आँखें। एक दिशा। एक सेना के पीछे खड़े होकर दूसरी सेना को दुश्मन की तरह देखना।
मेरे पास अब कोई दिशा नहीं थी।
मैं पहाड़ी से देख रहा था — पूरब भी, पश्चिम भी। पाण्डव भी, कौरव भी। और जो मैंने देखा, वो किसी ने नहीं देखा।
अर्जुन को गांधीव उठाने से पहले जो काँपना था — वो मुझे दिखा।
कर्ण को कवच दान करते वक्त जो दर्द था — वो भी।
द्रोणाचार्य जब रात को शिविर में बैठकर अपने हाथ देखते थे और सोचते थे कि इन्हीं हाथों से कल किसे मारूँगा — वो भी मुझे दिखा।
युद्धभूमि पर जो खून था, वो दोनों तरफ एक जैसा रंग का था।
पर जो मैं देख रहा था, वो खून नहीं था।
मैं देख रहा था — क्षण। वो क्षण जब एक इंसान तय करता है कि वो मारेगा। वो क्षण जब एक इंसान तय करता है कि वो मरेगा। और वो क्षण जब दोनों एक साथ होते हैं और इंसान खुद नहीं जानता कि वो क्या कर रहा है।
दसवें दिन भीष्म गिरे।
मेरे परदादा के पिता। शांतनु का पुत्र।
जब वो शर-शय्या पर लेटे और उन्होंने आकाश की तरफ देखा, मुझे लगा वो मेरी तरफ देख रहे हैं।
शायद देख रहे थे।
एक बूढ़े आदमी की आँखें जिसने युगों तक जिया, और अब बाणों की शय्या पर सूर्य के उत्तरायण का इंतज़ार कर रहा था — उन आँखों में जो भाव था, वो युद्ध का नहीं था।
वो थकान का भाव था।
उस थकान का, जो तब होती है जब तुम बहुत देर तक सही रहने की कोशिश करते हो।
तेरहवें दिन अभिमन्यु चक्रव्यूह में घुसा।
मैंने देखा — एक लड़का, जो मुझसे भी कम उम्र का था, सात महारथियों के घेरे में अकेला था। उसके पास से निकलने का रास्ता नहीं था — सिर्फ आगे जाने का रास्ता था।
वो आगे गया।
उस दिन मुझे पहली बार समझ आया कि वीरता और मृत्यु में कोई अंतर नहीं है। वीरता सिर्फ यह नहीं है कि तुम जीते। वीरता यह है कि तुम उस दिशा में चलते रहे जो तुम्हें सही लगी।
अभिमन्यु गिरा।
और उस पहाड़ी पर मेरे पास रोने के लिए आँखें थीं, पर आँसू गिराने के लिए धड़ नहीं था।
सोलहवें दिन कर्ण और अर्जुन आमने-सामने आए।
इस एक क्षण का इंतज़ार पूरी कुरुक्षेत्र कर रही थी।
पर मैं जो देख रहा था — वो इंतज़ार नहीं था।
मैं देख रहा था दो भाइयों को, जो एक-दूसरे को नहीं जानते थे। एक-दूसरे से प्यार करने का मौका जिन्हें कभी नहीं मिला। और अब वो एक-दूसरे को मारने के लिए खड़े थे।
दुनिया में जो सबसे दुखद है, वो यह नहीं है कि दुश्मन मिलते हैं।
दुखद यह है कि भाई एक-दूसरे को पहचान नहीं पाते।
कर्ण का रथ का पहिया धँसा। वो नीचे उतरा।
और अर्जुन का बाण उसके लिए इंतज़ार नहीं करता।
जब वो गिरा, मैंने कुछ देखा — एक पल के लिए, एक क्षण के लिए — उसके चेहरे पर एक ऐसा भाव था जो शिकायत का नहीं था।
वो राहत का भाव था।
अठारहवाँ दिन।
दुर्योधन की जाँघें टूटीं। कौरव-पक्ष का अंत था।
मैंने देखा — विजेता। पाण्डव जीते। धर्म की जीत हुई।
पर पहाड़ी से उस युद्धभूमि को देखो — जो दिखा वो यह था:
खून में लिपटी ज़मीन। टूटे रथ। मरे हुए हाथी जो पहाड़ों जैसे पड़े थे। और उनके बीच में — इंसान। जीवित इंसान, जो जीत के बावजूद किसी से बात नहीं कर रहे थे।
जीत का उत्सव नहीं था।
था तो बस एक गहरी, भारी चुप्पी।
जैसे हर किसी को अचानक पता चल गया हो — कि जो गया, वो वापस नहीं आएगा।
बाद में कृष्ण आए।
“तुमने सब देखा?” उन्होंने पूछा।
“हाँ।”
“तो बताओ — युद्ध किसने जीता?”
मैं उस सवाल पर रुका।
शरीर वाला बर्बरीक शायद कहता — पाण्डवों ने। धर्म ने।
पर मेरे पास अठारह दिन थे। और उन अठारह दिनों में मैंने जो देखा था, उसका एक ही जवाब था।
“कोई नहीं,” मैंने कहा।
कृष्ण मुस्कुराए — पर इस बार उस मुस्कुराहट में वो दरवाज़ा नहीं था। इस बार उसमें कुछ और था।
दुख। एक ऐसा दुख जो सिर्फ उसे होता है जो सब जानता है, सब देखता है, और फिर भी उसे होने देता है। क्योंकि न होने देने का कोई रास्ता नहीं था।
“तुमने वो देखा जो अर्जुन नहीं देख सका,” उन्होंने कहा। “जो भीम नहीं देख सका। जो मैं भी पूरी तरह नहीं देख पाया — क्योंकि मेरे पास भी एक पक्ष था।”
“तुम्हारे पास पक्ष नहीं था। इसीलिए मैंने तुम्हारा सिर माँगा था।”
युद्ध समाप्त हुआ।
पाण्डव हस्तिनापुर गए। कुंती रोई। द्रौपदी चुप रही। युधिष्ठिर राजा बने।
मैं पहाड़ी पर रहा।
पर मुझे कोई शिकायत नहीं थी।
जो योद्धा लड़ा, उसने एक पक्ष की जीत देखी। जिसने जीत देखी, उसने सिर्फ आखिरी पल देखा।
मैंने सब देखा।
और शायद यही थी मेरी लड़ाई — वो लड़ाई जो बिना तलवार के लड़ी जाती है, बिना बाण के। जिसमें आप सिर्फ देखते हैं, और देखते-देखते समझते हैं कि जो दिखता है, वो सच नहीं होता। सच वो होता है जो दिखने के बाद भीतर बैठ जाता है।
आज लोग मुझे खाटू श्याम कहते हैं।
मुझे नहीं पता कि वो सही है या नहीं।
पर जो मुझे पता है वो यह है —
युद्धभूमि में जो जीतता है, वो इतिहास में जाता है।
जो देखता है, वो सत्य में जाता है।
और सत्य के लिए किसी का सिर नहीं जाता।
सिर्फ सिर चाहिए।
बर्बरीक। भीम का पोता। घटोत्कच का पुत्र। वो योद्धा जिसने कुरुक्षेत्र की पूरी कहानी देखी — और जिसे कोई नहीं जानता, पर जो सबसे ज़्यादा जानता था।
