यमुना का वह जहरीला पानी
कालिया नाग को याद नहीं कब आखिरी बार उसने खुला आसमान देखा था। रत्नाकर की गहराइयों में जब गरुड़ का साया पड़ता, तो उसके सैकड़ों फन एक साथ काँप उठते थे। एक दिन वह डर इतना बड़ा हो गया कि उसने अपने पूरे कुनबे — पत्नियों, बच्चों, हज़ारों नागों — को लेकर समुद्र छोड़ दिया। यमुना का एक शांत, गहरा कुंड मिला उसे, जहाँ पानी इतना गर्म और विषैला था कि कोई पक्षी उस पर से उड़ता भी नहीं था। गरुड़ यहाँ नहीं आ सकता था। कालिया ने सोचा था — यही मेरी आख़िरी शरण है।
पर उस कुंड के किनारे वृंदावन बसा था। गायें उसी यमुना का पानी पीने जातीं, बच्चे उसी किनारे खेलते। जिस दिन कालिया के विष से तीन गायें और चार ग्वाल-बाल बिना साँस लिए गिर पड़े, उसी दिन नंद बाबा के आँगन में एक हल्ला मच गया — किसी ने देखा कि कान्हा उसी कुंड की ओर दौड़ पड़ा है।
जब कान्हा पानी में कूद पड़े
यशोदा की चीख अब भी हवा में थी जब कृष्ण कदंब की सबसे ऊँची डाल से यमुना में कूद गए। पानी ने ऐसा उबाल मारा जैसे किसी ने आग में घी डाल दिया हो। कालिया को पहले लगा कोई और साँप उसकी सीमा में घुस आया है — फिर उसने देखा, यह तो एक बच्चा है। नंगे पैर, बिना किसी हथियार के।
एक साँप के लिए यह अपमान से बढ़कर कुछ नहीं था। कालिया ने अपने विशाल शरीर से कृष्ण को जकड़ लिया, फन ऊँचे किए, विष उगलने को तैयार। किनारे पर खड़े ग्वाल-बाल और गोपियाँ चीखने लगीं, नंद बाबा मूर्छित होकर गिर पड़े। पर कुंड के भीतर कृष्ण मुस्कुरा रहे थे — वह मुस्कान जो कालिया ने अपने हज़ारों बरसों में कभी किसी आँख में नहीं देखी थी।
कालिया नाग की कहानी का सबसे मार्मिक मोड़
कृष्ण उसके सबसे बड़े फन पर चढ़ गए और नाचने लगे। हर कदम पर कालिया का फन झुकता, हर थाप पर उसका ज़हर उसी के भीतर लौट आता। बाँसुरी की जगह अब सिर्फ पैरों की थाप थी — और वह थाप कालिया के लिए किसी भी विष से ज़्यादा असहनीय थी, क्योंकि उसमें क्रोध नहीं, एक अजीब सी करुणा थी। कालिया के मुँह से खून बहने लगा, उसकी आँखों की चमक बुझने लगी। यही वह क्षण था जब हज़ारों बरस के अभिमान और डर की परतें एक साथ टूटीं — कालिया समझ गया कि जिसे वह घुसपैठिया समझ रहा था, वह कोई साधारण शत्रु नहीं था।
नागपत्नियों की गुहार
कुंड के भीतर से नागपत्नियाँ ऊपर आईं, हाथ जोड़े, आँखों में आँसू। “हे प्रभु,” उनमें से एक बोली, आवाज़ काँप रही थी, “हम जानती हैं आप कौन हैं। हमारे स्वामी का अपराध क्षमा करें — यह डर से यहाँ आया था, द्वेष से नहीं।” कृष्ण का पैर एक क्षण के लिए कालिया के फन पर थमा। उन्होंने नीचे झुककर उस साँप की आँखों में देखा, जिसकी सारी शक्ति अब बह चुकी थी।
“तुम्हारा विष इस पानी में रहा, इसलिए यह ज़हर बना,” कृष्ण ने कहा, “पर तुम्हारे भीतर अब भी वह विष नहीं, थकान है। जाओ, समुद्र में वापस मत जाना — गरुड़ तुम्हें वहाँ ढूँढ लेगा। रामणक द्वीप जाओ। जब तक तुम्हारे फन पर मेरे पैरों का यह चिह्न है, कोई गरुड़ तुम्हें छुएगा नहीं।”
रामणक द्वीप की ओर
कालिया धीरे-धीरे पानी की सतह से नीचे उतरा — इस बार डर से नहीं, आभार से। उसके पीछे-पीछे उसका पूरा कुनबा चल पड़ा, हमेशा के लिए यमुना छोड़कर। पीछे रह गया सिर्फ साफ, ठंडा पानी, जिसमें गायें फिर से उतरने लगीं, बच्चे फिर हँसने लगे। किनारे खड़े नंद बाबा ने आँखें खोलीं तो देखा — उनका बेटा यमुना से बाहर निकल रहा था, माथे पर पानी की बूँदें, चेहरे पर वही शांत मुस्कान, जैसे अभी-अभी किसी को मार नहीं, बचाया हो।
इस कथा से जुड़े सवाल
कालिया नाग यमुना में कहाँ से आया था?
पौराणिक कथा के अनुसार कालिया समुद्र में रहता था, पर गरुड़ के भय से अपने कुनबे सहित यमुना के एक कुंड में आ बसा था।
क्या कृष्ण ने कालिया नाग को मार डाला था?
नहीं — कृष्ण ने उसे हराया ज़रूर, पर उसकी पत्नियों की प्रार्थना पर उसे क्षमा कर रामणक द्वीप भेज दिया, यही इस कहानी का सबसे भावुक मोड़ है।
