Mythology

पूतना वध की कहानी — वो रात जब मौत ने वात्सल्य को छुआ

Rajhussain · 17-August-2026 5 मिनट में पढ़ें
पूतना वध की कहानी — वो रात जब मौत ने वात्सल्य को छुआ

आधी रात को गोकुल के फाटक पर एक परछाई रुकी। इतनी सुंदर कि पहरेदार पलक झपकाना भूल गए, इतनी शांत कि किसी कुत्ते ने भौंकना ज़रूरी नहीं समझा। उसके बाल चमेली से गुँथे थे, उसकी चाल में संगीत था। किसी ने नहीं जाना कि यह वही पूतना है, जो मथुरा में कंस के सामने खड़े होकर बोली थी — “एक ही रात में काम तमाम कर दूँगी।”

कंस ने उसे चुना था क्योंकि उसके पास एक हुनर था जो किसी और के पास नहीं था। वह जिस बच्चे को छू ले, वह बच्चा साँस लेना भूल जाता। उसने अपने स्तनों में हलाहल विष भर रखा था — माँ के दूध की जगह मौत।

रात में उतरा एक सुंदर चेहरा

नंद के आँगन में दीये अब भी टिमटिमा रहे थे। यशोदा थककर सो चुकी थीं, बालक कृष्ण पालने में करवटें बदल रहे थे। पूतना भीतर आई — किसी सहेली की तरह, किसी दूर की मौसी की तरह। द्वार पर बैठी दासी ने भी उसे रोकने का मन नहीं किया, मानो उसकी सुंदरता ने हर सवाल को चुप करा दिया हो।

वह पालने के पास झुकी। बालक ने आँखें खोलीं और उसकी ओर देखा — वह देखना, जिसमें न डर था, न पहचान का बोझ। सिर्फ एक शांत, गहरी दृष्टि, जैसे वह जानता हो कि सामने कौन खड़ा है, और फिर भी मुस्कुरा रहा हो।

पूतना ने उसे गोद में उठाया। उसके हाथ काँप रहे थे, पर यह डर नहीं था — यह कुछ और था, जिसे उसने वर्षों से महसूस नहीं किया था। एक बच्चे का वज़न, उसकी साँस की गर्माहट, उसकी उँगलियों का उसके आँचल को पकड़ना। एक राक्षसी के भीतर, एक क्षण के लिए, कुछ माँ जैसा जाग उठा।

जब विष भरे स्तन को कृष्ण ने चूमा

उसने अपना स्तन बालक के मुँह की ओर बढ़ाया। यही वह पल था जिसके लिए वह मथुरा से चली थी। पर बालक ने जो किया, उसकी कल्पना कंस ने भी नहीं की थी।

कृष्ण ने दूध नहीं पिया — उसने पूतना का प्राण खींच लिया। धीरे-धीरे, जैसे कोई थकी हुई नदी अंततः सागर में मिल जाती है। पूतना को दर्द नहीं हुआ। उसने महसूस किया कि जो विष उसने वर्षों तक अपने भीतर ढोया था, वह अब बाहर निकल रहा है — और उसके साथ वह सब कुछ भी, जो उसे राक्षसी बना चुका था।

उसका असली रूप लौट आया — विशाल, भयानक, पर्वत जैसा शरीर, जो आँगन की दीवारें तोड़ते हुए धराशायी हुआ। गाँव वाले चीखते हुए दौड़े, यशोदा बदहवास होकर पालने की ओर भागीं। और वहाँ, उस विशाल मृत शरीर की छाती पर, बालक कृष्ण निश्चिन्त लेटे खेल रहे थे, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

पूतना वध की वो कहानी जो डर नहीं, मुक्ति सिखाती है

यहीं से पूतना वध की कहानी अपना असली अर्थ पाती है। जिसने मारने की नीयत से गोद में उठाया था, उसे भी कृष्ण ने वही दिया जो एक सच्ची माँ को मिलता है — मुक्ति का स्पर्श। शास्त्र कहते हैं, भाव चाहे जैसा भी हो, अगर स्पर्श और क्रिया माँ जैसी हो, तो ईश्वर उसका फल भी वैसा ही देता है।

पूतना ने धोखे से दूध पिलाया था, पर पिलाया तो था। और कृष्ण ने उस एक क्रिया को इतना बड़ा मान दिया कि मृत्यु के बाद उसे वही गति मिली, जो केवल परम भक्तों को मिलती है।

जलती चिता से उठी चंदन की खुशबू

गोकुल के लोगों ने जब पूतना के विशाल शरीर को जलाने के लिए चिता सजाई, तो जो हुआ उसने सबको चुप कर दिया। जलते हुए मांस से जो गंध उठनी चाहिए थी, उसकी जगह चंदन और अगर की सुगंध हवा में फैल गई — जैसे कोई पवित्र यज्ञ हो रहा हो, किसी राक्षसी का दाह संस्कार नहीं।

यशोदा ने बालक को गोद में भींच लिया, आँखों में आँसू और राहत दोनों थे। नंद बाबा ने आकाश की ओर देखा, कुछ न बोले। और गाँव के बूढ़े कहते रह गए कि उन्होंने अपने जीवन में ऐसा कुछ नहीं देखा — मौत की चिता से जीवन जैसी खुशबू।

पूतना उस रात मारने आई थी। वह गई तो मुक्त होकर, उस बच्चे के हाथों जिसे उसने मारना चाहा था।

इस कथा से जुड़े सवाल

पूतना कौन थी?
पूतना कंस की सेना की एक राक्षसी थी, जिसे बाल-हत्या की शक्ति प्राप्त थी। कंस के आदेश पर वह गोकुल में शिशु कृष्ण को मारने आई थी।

पूतना को मोक्ष क्यों मिला?
शास्त्रों के अनुसार, भले ही उसकी नीयत बुरी थी, उसने कृष्ण को माँ की तरह स्तनपान कराने की क्रिया की। इस स्पर्श और क्रिया के कारण उसे वैसा ही मोक्ष मिला जैसा एक सच्ची माँ को मिलता है।

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