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माँ बनने के बाद की कहानी: वो दोपहर जब रोना भी अपराध लगा

Rajhussain · 13-July-2026 6 मिनट में पढ़ें
माँ बनने के बाद की कहानी: वो दोपहर जब रोना भी अपराध लगा

सुबह साढ़े पाँच बजे नैना की आँख खुली, इससे पहले कि रोहन रोए। यही उसका नया अलार्म था — डर, नींद से भी तेज़।

वो इंदौर के उसी दो कमरे के फ्लैट में लेटी थी, जिसे शादी के बाद उसने खुद सजाया था। खिड़की से हल्की रोशनी अंदर आ रही थी। बगल में पालने में रोहन साँस ले रहा था — छह हफ्ते का, गुलाबी, परफेक्ट। और नैना वहीं लेटी, छत को देखती, ये सोचकर कि आज फिर वो दिन शुरू होने वाला है जिसमें उसे खुश दिखना है।

किसी ने उसे नहीं बताया था कि माँ बनने के बाद की कहानी में ये हिस्सा भी होता है — जहाँ बच्चा साँस ले और माँ को साँस लेना भारी लगे।

जब दूध पिलाना भी थकान से ज़्यादा कुछ लगे

सात बजे सासु माँ चाय लेकर आईं। “कैसी हो?” — रोज़ का सवाल, रोज़ का जवाब: “ठीक हूँ माँजी।”

झूठ इतना आसान हो गया था कि नैना को खुद हैरानी होती।

सच ये था कि जब रोहन भूख से रोता, नैना का शरीर दूध पिलाने के लिए उठ जाता, पर मन कहीं और चला जाता — किसी खाली कमरे में, जहाँ कोई आवाज़ न हो। वो रोहन को गोद में लेती, उसकी छोटी उँगलियाँ उसकी उँगली पकड़तीं, और नैना को उस पल में वो प्यार महसूस नहीं होता जिसकी उम्मीद उसे थी। सिर्फ थकान। और थकान के नीचे, एक शर्म जो शब्दों में नहीं आती — माँ होकर भी खाली महसूस करने की शर्म।

“तुझे तो बस इतना करना है, दूध पिलाना और सुलाना,” पड़ोस की आंटी ने कल ही कहा था, हँसते हुए। नैना मुस्कुराई थी। अंदर कुछ और टूटा था।

हर तस्वीर में मुस्कुराती एक औरत, जो असल में सिर्फ थकी हुई थी

दोपहर को सास ने मोबाइल में एक तस्वीर दिखाई — रोहन के जन्म की, वो अस्पताल के बिस्तर पर, बच्चे को गोद में लिए मुस्कुरा रही थी। तस्वीर व्हाट्सएप स्टेटस पर लगी थी, “नन्हे मेहमान का स्वागत है” लिखकर।

नैना ने अपनी ही तस्वीर देखी और सोचा — वो औरत कौन है? उस दिन वो मुस्कुराई थी क्योंकि सबने कैमरा उठाया था। भीतर वो इतनी डरी हुई थी कि उसे लगा था अस्पताल के गलियारे में भाग जाए।

किसी को ये बात कैसे बताए? कि बच्चा गोद में है और फिर भी अकेलापन इतना गहरा है जितना पहले कभी नहीं था। कि रात को रोहन के सो जाने के बाद वो बाथरूम में जाकर बहुत देर तक बस नल खुला छोड़कर बैठी रहती है, ताकि पानी की आवाज़ में उसका रोना दब जाए।

पति विवेक अच्छे इंसान थे। ऑफिस से थके आते, रोहन को थोड़ी देर खिलाते, फिर पूछते, “आज सब ठीक रहा?” और नैना कहती, “हाँ, ठीक।” क्योंकि “ठीक नहीं” कहने का कोई रास्ता उसे नहीं मिलता था — बिना ये लगे कि वो एक बुरी माँ है।

शाम की चाय पर सहेली की वो एक लाइन

शाम को स्नेहा आई — कॉलेज की पुरानी सहेली, जो पिछले महीने ही शहर लौटी थी। नैना ने कमरा जल्दी-जल्दी समेटा, बाल ठीक किए, वही पुरानी मुस्कान चेहरे पर लगाई।

“रोहन कितना प्यारा है,” स्नेहा ने कहा, उसे उठाते हुए।

बातें होती रहीं — कॉलेज के किस्से, किसी पुरानी टीचर का ज़िक्र, हल्की हँसी। फिर अचानक चुप्पी आई, वैसी चुप्पी जो दो पुरानी सहेलियों के बीच ही आ सकती है। स्नेहा ने नैना की आँखों में देखा और बोली, “तू ठीक है ना, सच में?”

नैना का गला भर आया। उसने सिर हिलाया, “हाँ,” पर आवाज़ काँप गई।

स्नेहा ने कप नीचे रखा। “मेरे साथ भी हुआ था,” उसने धीरे से कहा। “अदिति के बाद। तीन महीने तक मुझे लगा था मैं ठीक नहीं हूँ, माँ बनने लायक नहीं हूँ। किसी को बता नहीं पाई थी। जब बताया, तो डॉक्टर ने कहा ये आम है — postpartum depression, इसका नाम भी होता है, इलाज भी।”

उस एक लाइन ने कमरे में कुछ बदल दिया। नैना पहली बार, छह हफ्तों में पहली बार, फूट-फूटकर रोई — बिना नल की आवाज़ के, बिना बाथरूम के दरवाज़े के पीछे छुपे।

“मुझे लगा था सिर्फ मेरे साथ हो रहा है,” वो बोली।

“किसी के साथ भी नहीं होना चाहिए अकेले,” स्नेहा ने उसका हाथ थामा। “पर होता सबके साथ है। बस कोई बताता नहीं।”

जो बात नहीं कही गई, वो सबसे ज़रूरी थी

उस रात रोहन फिर रोया, साढ़े तीन बजे। नैना उठी, उसे गोद में लिया। अब भी थकान थी, अब भी वो खालीपन कहीं भीतर मौजूद था। कुछ भी अचानक ठीक नहीं हुआ था।

पर पहली बार, गोद में बच्चे को थामते हुए, उसने खुद से नहीं पूछा कि उसमें क्या कमी है। उसने बस इतना सोचा — कल सुबह वो डॉक्टर को फोन करेगी, जैसा स्नेहा ने कहने को कहा था। और परसों, विवेक को भी वो बात बताएगी जो उसने अब तक भीतर बंद कर रखी थी।

खिड़की के बाहर इंदौर की सड़क पर एक कुत्ता भौंका, फिर चुप हो गया। रोहन की साँसें फिर से नियमित हुईं। नैना ने उसे पालने में लिटाया, और खुद भी लेट गई — इस बार आँखें छत पर नहीं, बंद थीं। नींद नहीं आई, पर पहली बार भार थोड़ा कम था।

इस कथा से जुड़े सवाल

पोस्टपार्टम डिप्रेशन और बेबी ब्लूज़ में क्या फर्क है?
बेबी ब्लूज़ हल्के मूड स्विंग्स होते हैं जो डिलीवरी के कुछ दिनों में शुरू होकर दो हफ्तों में अपने आप ठीक हो जाते हैं। पोस्टपार्टम डिप्रेशन इससे ज़्यादा गहरा और लंबा होता है, और इसमें पेशेवर मदद ज़रूरी होती है।

क्या ये सिर्फ कमज़ोर माँओं के साथ होता है?
बिल्कुल नहीं। भारत में हर पाँच में से लगभग एक नई माँ को यह अनुभव होता है — यह हार्मोनल बदलाव, नींद की कमी और सामाजिक दबाव का मिला-जुला असर है, माँ की क्षमता का सवाल नहीं।


अगर आप या आपकी जानी-पहचानी कोई नई माँ ऐसा महसूस कर रही है, तो अकेले इससे गुज़रने की ज़रूरत नहीं है। iCall (9152987821) और NIMHANS हेल्पलाइन (080-46110007) जैसी सेवाएं गोपनीय सहायता देती हैं, और किसी भी स्त्री रोग विशेषज्ञ या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से इस बारे में खुलकर बात की जा सकती है।

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