Inspirational

वो आदमी जो आख़िरी बार अपने नाम से लड़ा

Rajhussain · 17-May-2026 6 मिनट में पढ़ें
वो आदमी जो आख़िरी बार अपने नाम से लड़ा

हाफरुदा के जंगल में सुबह देर से उतरती है।

देवदार इतने घने हैं कि सूरज को नीचे तक पहुँचने में वक़्त लगता है। बर्फ़ अभी पूरी पिघली नहीं थी — 21 मार्च 2009, कुपवाड़ा का वो हिस्सा जहाँ ज़मीन अभी ठंडी थी और हवा में एक तरह की चुप्पी थी जो सिर्फ़ कश्मीर के ऊँचे जंगलों में मिलती है।

मेजर मोहित शर्मा अपनी ब्रावो असॉल्ट टीम के साथ उस जंगल में दाख़िल हो रहे थे। उनकी उम्र इकत्तीस साल थी। 1 पैरा (स्पेशल फ़ोर्सेज़) के अफ़सर। चार आदमी पीछे, चार आगे, बीच में वो ख़ुद।

और शायद पहली बार बहुत सालों में — वो सिर्फ़ मेजर मोहित शर्मा थे।


पाँच साल पहले, 2004 में, इसी कश्मीर के एक हिस्से में — शोपियाँ के पास — एक नौजवान कश्मीरी रहता था। लम्बे बाल, घनी दाढ़ी, फेरन पहने हुए। नाम बताता था — इफ़्तिख़ार भट्ट। कहता था कि उसके भाई को फ़ौज ने मार डाला है, और अब वो बदला लेना चाहता है।

हिज़्बुल मुजाहिदीन के दो बड़े आतंकवादी — अबू तोरारा और अबू सबज़र — उस पर भरोसा कर बैठे। उसे अपने ठिकाने तक ले गए। उसके साथ हमले की योजना बनाई।

वो इफ़्तिख़ार भट्ट कोई कश्मीरी लड़का नहीं था। वो रोहतक का मोहित शर्मा था। फ़ौज में जिसे दोस्त “माइक” कहते थे, घर में माँ “चिंटू” कहती थी।

महीनों उसने उनकी ज़बान बोली। उनके साथ खाना खाया। उनकी नमाज़ की आवाज़ें सुनीं। उनके चेहरों को याद किया। उनकी आँखों में देखकर मुस्कुराया।

और फिर एक रोज़, जब उन्होंने उस पर शक करना शुरू किया, मोहित ने पिस्तौल निकाली और दोनों को वहीं ख़त्म कर दिया।

उसी ऑपरेशन के लिए उन्हें सेना मेडल मिला था। पर सेना मेडल किसी को ये नहीं बताता कि महीनों किसी और का नाम पहनकर जीना कैसा होता है। कि जब आप एक चेहरा बनकर रहते हैं इतने लम्बे वक़्त, तो अपना असली चेहरा भी कभी-कभी अजनबी लगने लगता है।


बीच के साल आम साल थे — जैसे फ़ौजी अफ़सरों के होते हैं। बेलगाम में दो साल कमांडोज़ को ट्रेनिंग दी। शादी हुई — रिशिमा सरीन से, जो ख़ुद आर्मी सर्विस कोर में अफ़सर थीं। 2008 में फिर कश्मीर। फिर 1 पैरा (एसएफ़)। फिर वही जंगल, वही पहाड़, वही चुप्पी।

मार्च की उस सुबह से एक रात पहले इंटेलिजेंस इनपुट आया था। हाफरुदा फ़ॉरेस्ट के अंदर कुछ आतंकवादी घुस आए हैं। तीन तरफ़ से कवर ले रखा है। प्राकृतिक गुफ़ाओं में छुपे हैं।

मोहित ने नक़्शा देखा। टीम चुनी। वक़्त तय किया। उन्होंने ख़ुद आगे चलने का फ़ैसला किया।

उनके साथ हवलदार संजय सिंह थे। हवलदार अनिल कुमार। पैराट्रूपर शबीर अहमद मलिक। पैराट्रूपर नटर सिंह। और कुछ और।

जंगल में दाख़िल होने से पहले मोहित ने अपनी टीम से कुछ कहा था। कुछ बहुत छोटा। कुछ बहुत सादा।

बाद में जो लड़के बच गए, वो याद करते हैं — उन्होंने कहा था कि कोई पीछे नहीं रहेगा। न ज़िंदा, न मरा हुआ। हम सब साथ निकलेंगे।

ये कोई बड़ा भाषण नहीं था। न कोई फ़िल्मी डायलॉग। बस एक वादा जो एक कमांडर अपनी टीम से करता है, और जिसका मतलब वही समझता है जो वो वादा निभाने जा रहा है।


जंगल के अंदर दूर तक खामोशी थी।

फिर अचानक तीन तरफ़ से गोलियाँ चलीं।

मोहित ने इसी पल के लिए महीनों तैयारी की थी। पर इस पल में कोई तैयारी काम नहीं आती। चार कमांडो पहले ही बर्स्ट में ज़ख़्मी हो गए। दो ज़मीन पर पड़े थे, खुले में, गोलियों की ज़द में।

मोहित ने कवर लिया। एक पल रुके।

और फिर वो रेंगते हुए आगे बढ़े।

खुली ज़मीन पर, गोलियों के बीच, अपने एक साथी तक पहुँचे। उसे खींचकर पीछे लाए। फिर वापस गए। दूसरे को भी।

ये वो आदमी था जिसने पाँच साल पहले अपनी पहचान छुपाकर दो आतंकवादियों को मारा था। जिसने महीनों दूसरे का नाम पहनकर जीवन जिया था। आज वो किसी की बहन का भाई नहीं था, किसी का बदला लेने वाला नौजवान नहीं था। आज वो सिर्फ़ मेजर मोहित शर्मा थे, इंडियन आर्मी, 1 पैरा (एसएफ़) — और उनके सामने उनके आदमी थे जो ज़मीन पर पड़े थे।

उन्होंने ग्रेनेड फेंके। दो आतंकवादी ख़त्म हुए।

फिर एक गोली उनके सीने में लगी।


सेना के रिकॉर्ड बताते हैं कि इसके बाद भी उन्होंने पीछे हटने से मना किया।

ज़ख़्मी हालत में उन्होंने अपनी टीम को निर्देश देना जारी रखा। आवाज़ धीमी हो रही थी पर निकल रही थी। फिर कुछ ऐसा हुआ कि उन्हें लगा बाक़ी आदमियों पर ख़तरा है — और वो आगे बढ़े।

क्लोज़-क्वार्टर कॉम्बैट में, हाथापाई की दूरी पर, उन्होंने दो और आतंकवादियों को मारा।

और फिर वो ज़मीन पर बैठ गए।

उसी जंगल में, उसी सुबह, उनके साथ संजय सिंह, अनिल कुमार, शबीर अहमद मलिक और नटर सिंह भी शहीद हुए। पाँच आदमी।

मोहित अपना वादा निभा गए — कोई पीछे नहीं छूटा। दोनों ज़ख़्मी साथी ज़िंदा निकाले गए।


26 जनवरी 2010 को राष्ट्रपति भवन के सामने वो जगह सजी थी जहाँ हर साल पदक दिए जाते हैं।

राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने नाम पुकारा — मेजर मोहित शर्मा, अशोक चक्र (मरणोपरांत)।

सामने एक औरत खड़ी हुई। वर्दी में। आर्मी सर्विस कोर की अफ़सर। रिशिमा शर्मा।

उन्होंने आगे बढ़कर पदक लिया।

अशोक चक्र — भारत का सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार। 15 अगस्त 2009 की गज़ट ऑफ़ इंडिया अधिसूचना में इसकी घोषणा हो चुकी थी। प्रशस्ति-पत्र में सेना ने लिखा था — “असाधारण वीरता, प्रेरक नेतृत्व, और कर्तव्य की पुकार से कहीं आगे का साहस।”

रिशिमा ने पदक लिया। पदक हल्का था। पर उसमें एक आदमी की पूरी ज़िंदगी थी।

वो आदमी जो रोहतक में चिंटू था। एनडीए में माइक था। शोपियाँ की किसी गुफ़ा में इफ़्तिख़ार भट्ट था।

और हाफरुदा के जंगल में, एक सुबह, आख़िरी बार — सिर्फ़ मोहित था।


भारतीय सेना के रिकॉर्ड के अनुसार, मेजर मोहित शर्मा को 15 अगस्त 2009 की गज़ट ऑफ़ इंडिया अधिसूचना द्वारा अशोक चक्र (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया, और यह पदक 26 जनवरी 2010 को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल द्वारा उनकी पत्नी मेजर रिशिमा शर्मा को प्रदान किया गया।

शेयर करें:
WhatsApp Facebook Twitter Telegram