दिल्ली के मुखर्जी नगर का एक PG कमरा। फरवरी 2019। रात के ग्यारह बज रहे थे।
हिमांशु ने अलमारी से एक कमीज़ निकाली और बिस्तर पर रख दी। नीली। पुरानी। कॉलर का रंग थोड़ा फीका हो चुका था। बाँहों पर चाय के कुछ निशान थे जो धोने पर भी नहीं गए थे।
ये उसके पापा की कमीज़ थी।
कल सुबह दस बजे यूपीएससी का इंटरव्यू था। धौलपुर हाउस। दूसरा अटेम्प्ट। पिछले साल IRTS मिला था — रेलवे ट्रैफिक सर्विस। अच्छी नौकरी थी। पर वो IAS के लिए आया था।
हिमांशु ने कमीज़ उठाई और हाथ में पकड़ी। कपड़े से अब भी हल्की सी चाय और इलायची की महक आ रही थी। पाँच साल पुरानी कमीज़ थी ये। 2014 में दिल्ली आते वक्त पापा ने ज़बरदस्ती दी थी।
“रख ले बेटा। कभी कमी पड़ेगी तो काम आएगी।”
उसने तब हँसी थी। “पापा, मैं दिल्ली जा रहा हूँ। नई कमीज़ें खरीद लूँगा।”
पापा कुछ नहीं बोले थे। बस कमीज़ बैग में रख दी थी।
खिड़की के बाहर दिल्ली की सड़कें अब भी जाग रही थीं। ऑटो के हॉर्न। कहीं दूर से किसी की हँसी। हिमांशु ने कमीज़ को मोड़ कर बिस्तर के एक कोने में रखा और फाइलें खोलीं।
करंट अफेयर्स। एथिक्स। पर्यावरण विज्ञान का ऑप्शनल। पिछले छह महीनों में जितनी बार पढ़ा था सब फिर से सामने था।
पर पढ़ाई नहीं हो रही थी।
उसकी आँखों के सामने सिरौली की वो दुकान आ रही थी।
सिरौली। बरेली से थोड़ा आगे। एक छोटा सा कस्बा जहाँ बस अड्डे के पास पापा की चाय की गुमटी थी। टीन की छत। तीन बेंच। एक केतली जो लगातार चलती थी।
हिमांशु को सब कुछ याद था। कितनी बार उसने सुबह छह बजे उठकर पापा के साथ दुकान खोली थी। कितनी बार स्कूल जाने से पहले गिलास धोए थे। कितनी बार स्कूल से आकर सीधे दुकान पहुँचा था क्योंकि पापा को कहीं और मज़दूरी के लिए जाना था।
स्कूल पैंतीस किलोमीटर दूर था। आना-जाना सत्तर। हर रोज़।
बस में बैठकर वो किताबें खोलता था। दूसरे बच्चे शोर मचाते थे। वो पढ़ता था। उसे पता था कि अगर वो भी शोर मचाने लगा तो पापा की सत्तर रुपये की दिहाड़ी और चाय के तीस-चालीस गिलास बेकार चले जाएँगे।
ग्यारह बज कर बीस मिनट हो गए थे।
हिमांशु ने फाइलें बंद कर दीं। उसे पता था कि अब पढ़ने का कोई मतलब नहीं था। जो आता था आता था। जो नहीं आता था अब नहीं आएगा।
उसने पापा को फोन लगाया।
दो रिंग पर पापा ने उठाया।
“हाँ बेटा।”
“पापा, सो गए थे?”
“नहीं। बैठा था।”
बैठा था। हिमांशु को मालूम था इसका मतलब। पापा दुकान से लौटकर भी देर रात तक बैठे रहते थे। रेडियो सुनते। या बस यूँ ही दीवार देखते।
“कल इंटरव्यू है पापा।”
“हाँ। पता है।”
कुछ देर चुप्पी रही।
फिर पापा बोले, “घबराना मत।”
“नहीं घबरा रहा।”
“झूठ मत बोल।”
हिमांशु हँसा। एक पल के लिए उसका गला भर आया। फिर उसने हँसी संभाली।
“पापा, अगर इस बार भी IAS नहीं हुआ तो?”
पापा कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, “तो IRTS तो है ही।”
“वो छोड़ कर आया हूँ पापा।”
“पता है। तेरी माँ रो रही थी जब छोड़ी।”
हिमांशु को ये नहीं पता था। उसकी माँ ने उसे कभी नहीं बताया था।
“पापा…”
“बेटा सुन।” पापा की आवाज़ धीमी थी पर साफ थी। “मैंने तेरे लिए कुछ नहीं किया है। चाय बेची है। दिहाड़ी की है। तेरी पढ़ाई का खर्चा कैसे चला ये भी तुझे ही पता है। तू पढ़ता गया, मैं देखता गया।”
“पापा ऐसा मत बोलिए।”
“सुन तो।” पापा रुके। “कल जो होगा सो होगा। पर तू अंदर जब जाएगा ना, तो याद रखना — तू अकेला नहीं जा रहा। तेरे साथ बहुत लोग हैं जो वहाँ कभी नहीं पहुँच सकते थे।”
हिमांशु ने कुछ नहीं कहा।
“और एक बात। उन लोगों से डरना मत जो वहाँ बैठे होंगे। वो भी आदमी हैं। तू भी आदमी है।”
फोन रख दिया।
हिमांशु काफी देर तक यूँ ही बैठा रहा।
बारह बज गए।
उसने उठकर खिड़की खोली। ठंडी हवा अंदर आई। नीचे सड़क पर एक चायवाला अपनी रेहड़ी समेट रहा था। कोयले की आख़िरी आँच को राख से ढक रहा था ताकि सुबह फिर से जल सके।
हिमांशु काफी देर तक उसे देखता रहा।
उसे याद आया — पापा भी ऐसे ही करते थे। हर रात। आँच को ढकना। ताकि सुबह नई आग न जलानी पड़े।
वो वापस बिस्तर पर आया।
नीली कमीज़ अब भी वहीं रखी थी। उसने उसे उठाया और कुर्सी पर टांग दिया। कल वो ये कमीज़ नहीं पहनेगा। कल वो वो ब्लेज़र पहनेगा जो उसने तीन हज़ार रुपये में खरीदा था।
पर ये कमीज़ कल उसके साथ कमरे में रहेगी।
उसने अलार्म लगाया। पाँच बजे का। फिर सोचा। साढ़े चार कर दिया।
लाइट बंद की।
अँधेरे में लेटे हुए उसने सोचा — कल सुबह जब वो धौलपुर हाउस के अंदर जाएगा, तो लोग कमरे में बैठे होंगे। बड़े लोग। पढ़े-लिखे लोग। ऐसे लोग जिनके पापा कभी चाय नहीं बेचते थे।
वो लोग उससे पूछेंगे — आप यहाँ क्यों आए हैं?
हिमांशु को नहीं पता था वो क्या जवाब देगा।
पर इतना पता था — वो जो भी जवाब देगा, सच होगा।
करवट बदलते हुए उसकी नज़र फिर कुर्सी पर पड़ी।
नीली कमीज़।
बाँहों पर चाय के निशान।
कॉलर का फीका रंग।
कोई और देखता तो शायद कहता — पुरानी है। फेंक दे।
हिमांशु को पता था — ये कमीज़ नहीं फेंकी जाएगी। कभी नहीं।
उसने आँखें बंद कीं।
बाहर दिल्ली अब भी जाग रही थी।
कहीं दूर एक चायवाला अपनी आख़िरी आँच ढक रहा था।
और एक PG के कमरे में, एक लड़का जो कभी सिरौली के बस अड्डे पर गिलास धोता था, सोने की कोशिश कर रहा था।
कल सुबह दस बजे।
धौलपुर हाउस।
बस इतना ही।