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माखन चोर कृष्ण की कहानी: जब यशोदा ने मटकी छत पर टांग दी

Rajhussain · 12-August-2026 4 मिनट में पढ़ें
माखन चोर कृष्ण की कहानी: जब यशोदा ने मटकी छत पर टांग दी

सुबह अभी पूरी तरह खुली भी नहीं थी कि यशोदा मैया ने फैसला कर लिया — आज मटकी ज़मीन पर नहीं रहेगी।

कल रात उन्होंने मटकी को ऊँचे ताखे पर रखा था। सुबह देखा तो मटकी खाली, और फ़र्श पर छोटे-छोटे पैरों के निशान, सीधे कान्हा के पालने तक जाते हुए। न कोई सीढ़ी थी, न कोई कुर्सी। यशोदा मैया ने सिर पकड़ लिया।

तो आज उन्होंने रस्सी मंगवाई, और मटकी को छत की कड़ी से बाँधकर लटका दिया — इतना ऊँचा कि बड़े-बड़े लोग भी बिना कुछ सहारे के हाथ न लगा सकें। उन्होंने मटकी को हिलाकर देखा, संतोष की एक लंबी साँस ली, और आँगन में झाड़ू लगाने चली गईं।

मटकी को छत से लटकाने की तरकीब

जब वो लौटीं तो आँगन में सन्नाटा था। बहुत ज़्यादा सन्नाटा।

कान्हा कहीं नहीं दिख रहे थे। यशोदा मैया का दिल एक पल को रुक गया। फिर उन्होंने ऊपर देखा।

छत के नीचे, एक उलटी रखी मटकी पर एक लकड़ी का पीढ़ा टिका था, पीढ़े पर एक टूटा हुआ मूढ़ा, और मूढ़े पर — पंजों के बल खड़े — नन्हे कान्हा, जिनकी उँगलियाँ मटकी के मुँह तक बस पहुँच ही रही थीं। उनकी जीभ होंठों के बाहर निकली हुई थी, जैसे हर कोशिश में पूरा शरीर लगा हो।

“कन्हैया!” यशोदा की चीख निकली।

मूढ़ा हिला। कान्हा ने एक हाथ से मटकी थामी, दूसरे से हवा में संतुलन बनाया, और बिना नीचे देखे बोले — “मैया, बस थोड़ी सी!”

नन्ही सेना और बिखरा हुआ माखन

यशोदा दौड़ी उसे पकड़ने, पर तभी दरवाज़े पर आहट हुई। सुबाहु, मधुमंगल, और तीन-चार और लड़के — सब हाँफते हुए भीतर घुस आए, जैसे किसी ने उन्हें बुलावा भेजा हो।

पता चला, कान्हा ने सुबह-सुबह ही अपने दोस्तों को इशारा कर दिया था — आज ऊँची मटकी है, अकेले काम नहीं चलेगा।

पल भर में मूढ़े पर मूढ़ा, उस पर एक और लड़का, और सबसे ऊपर कान्हा — पूरा एक जीता-जागता झूलता हुआ मीनार, जो हर साँस के साथ काँप रहा था। यशोदा मैया दरवाज़े पर हाथ रखे बस देखती रह गईं, न हँस पाईं, न डाँट पाईं।

फिर मीनार गिरी। मटकी टूटी। माखन आँगन में बिखर गया, और उसके बीच पाँच बच्चे, ठहाके मारते, एक-दूसरे पर गिरते, हाथों में जितना माखन आया उतना मुँह में ठूँसते।

कान्हा फ़र्श पर बैठे थे, पूरा चेहरा माखन से सना, आँखें यशोदा की तरफ, और होंठों पर वही मुस्कान जो हर बार माफ़ी माँगने से पहले आती थी।

माखन चोर कृष्ण की कहानी का सबसे प्यारा पल

यशोदा मैया लकड़ी लेने गईं थीं — सच में। हाथ में डंडा भी आ गया था।

पर जब वो कान्हा के पास पहुँचीं, घुटनों के बल बैठीं, डंडा नीचे रखा और अपने आँचल से उनका चेहरा पोंछने लगीं। कान्हा ने आँखें बंद कर लीं, जैसे यही तो चाहते थे।

“तूने पूरी मटकी तोड़ दी,” यशोदा बोलीं, आवाज़ में गुस्सा कम, कुछ और ज़्यादा था।

“मैया, अगली बार नीची मटकी रखना,” कान्हा ने आँखें खोले बिना कहा, “छत तक हाथ नहीं पहुँचता मेरा।”

यशोदा हँस पड़ीं। एक हाथ से उन्होंने उसे गोद में खींच लिया, दूसरे से बिखरे माखन में से थोड़ा उठाया और सीधे उसके मुँह में डाल दिया — “ये ले, अब चुराने की ज़रूरत नहीं।”

कान्हा ने माखन खाया, फिर मैया के गले में बाँहें डालकर उनके कंधे पर सिर टिका दिया। आँगन में बाकी बच्चे अब भी हँस रहे थे, टूटी मटकी के टुकड़े धूप में चमक रहे थे, और यशोदा मैया की उँगलियाँ धीरे-धीरे उसके बालों में उलझी रहीं, बहुत देर तक।

इस कथा से जुड़े सवाल

कृष्ण को माखन चोर क्यों कहा जाता है? बचपन में कान्हा को घर का ताज़ा माखन इतना पसंद था कि वो ऊँची से ऊँची मटकी तक पहुँचने के तरीके खोज लेते थे — कभी दोस्तों की मदद से, कभी अकेले। यही शरारत उन्हें “माखन चोर” नाम दे गई।

यशोदा मैया मटकी को कहाँ-कहाँ छुपाती थीं? कभी ताखे पर, कभी रस्सी से छत पर बाँधकर, कभी ऊँची अलमारी में — पर हर बार कान्हा कोई नया रास्ता ढूँढ ही लेते थे, अक्सर अपने दोस्तों को साथ लेकर।

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