नदी के घाट पर हर साल एक दीया जलता था जिसे कोई नहीं बुझाता था। यमुना उसे खुद जलाती, खुद बचाती, और रातभर देखती रहती कि हवा उसे छू न ले। यह यम और यमुना की रक्षाबंधन की कहानी उसी दीये से शुरू होती है — एक बहन के इंतज़ार से, जो हर साल एक जैसा था, और एक भाई की चुप्पी से, जो हर साल थोड़ी और गहरी होती गई।
यम को कोई नहीं बुलाता। यह उनकी नियति का हिस्सा था, श्राप नहीं — जिस दरवाज़े पर वे पहुँचते, वहाँ रोना शुरू हो जाता। कोई दीया नहीं जलाता उनके लिए, कोई थाली नहीं सजाता। सदियों में उन्हें यह भी भूल गया था कि किसी की आँखों में उनके आने पर चमक भी आ सकती है।
बारह साल का इंतज़ार
यमुना नदी बनकर बहती थी, पर हर वर्ष एक ही समय पर वह घाट के पास ठहर जाती — जैसे बहता पानी भी याद रखना जानता हो। बारह वर्ष बीत गए थे। न कोई संदेश आया, न कोई परछाई घाट की सीढ़ियों पर पड़ी। यमुना जानती थी कि उसका भाई व्यस्त है — मृत्यु कभी छुट्टी नहीं लेती — पर व्यस्तता और भूल जाने में एक महीन रेखा होती है, और वह रेखा हर साल थोड़ी धुंधली होती जा रही थी।
एक शाम, जब दीया जलाते हुए उसका हाथ काँपा, यमुना ने खुद से पूछा — क्या यम को भी कभी अकेलापन लगता होगा? क्या उन्हें भी याद आता होगा कि उनकी एक बहन है, जो उनके लिए मीठा बनाती है, जबकि बाकी संसार उनके नाम से काँपता है?
गंगा के पास यमुना की गुहार
उस रात यमुना गंगा के पास गई। उसने कुछ माँगा नहीं, बस इतना कहा — “मुझे अपने भाई से मिलना है।” गंगा ने उसकी आँखों में देखा और समझ गईं कि यह शिकायत नहीं, थकान है। एक बहन की, जो हर साल दीया जलाकर भी यह मान चुकी थी कि शायद इस बार भी कोई नहीं आएगा।
गंगा यम के पास गईं। उन्होंने कुछ आदेश नहीं दिया — देवी गंगा किसी को आदेश नहीं देतीं — उन्होंने बस याद दिलाया। “तुम्हारी एक बहन है। वह अब भी दीया जलाती है।” यम, जो युगों से केवल फैसले सुनाते आए थे, इस एक वाक्य के आगे चुप हो गए। पहली बार उन्हें लगा कि यह एक ऐसा दरवाज़ा है जहाँ उनकी आमद खबर नहीं, बल्कि उपहार होगी।
यम यमुना की रक्षाबंधन की कहानी का वह मोड़
जिस दिन यम घाट पर पहुँचे, हवा में कुछ अलग था। यमुना ने उन्हें दूर से पहचान लिया — न किसी भय से, न किसी संकोच से, बल्कि उस राहत से जो बरसों बाद किसी अपने को देखकर होती है। उसने भोजन परोसा, मिठाई रखी, और फिर अपनी कलाई पर बंधा वह धागा निकाला जिसे उसने न जाने कितनी बार बाँधने की कल्पना की थी।
यम की कलाई पर जब धागा बंधा, तो उन्होंने वह महसूस किया जो उन्होंने सृष्टि के आरंभ से महसूस नहीं किया था — किसी का स्पर्श, जिसमें डर नहीं था। हर जगह उनका आना अंत की सूचना होता था। यहाँ, यह एक शुरुआत जैसा लगा।
अमरता का वचन
यम ने उस पल कुछ ऐसा दिया जो उन्होंने कभी किसी को नहीं दिया था — अमरता का वचन, अपनी बहन को। और साथ ही एक और वचन, जो आज तक हर बहन-भाई के बीच जीवित है — कि जो भाई अपनी बहन से यह धागा बंधवाएगा, अकाल मृत्यु का भय उससे दूर रहेगा।
पर उस दिन घाट पर जो असली चीज़ बदली, वह वरदान नहीं था। वह यह था कि मृत्यु के देवता ने पहली बार जाना कि प्रेम पाने के लिए डरावना होना ज़रूरी नहीं। दीया जलता रहा, हवा उसे छू नहीं पाई, और यमुना ने उस रात पहली बार दीया बुझने से पहले खुद सोने दिया — क्योंकि इस बार इंतज़ार खत्म हो चुका था।
इस कथा से जुड़े सवाल
यम और यमुना की कहानी में रक्षाबंधन का क्या महत्व है?
यह कथा रक्षाबंधन की सबसे पुरानी मान्यताओं में गिनी जाती है — यह भाई-बहन के रिश्ते को कर्तव्य नहीं, बल्कि चुने हुए प्रेम के रूप में दिखाती है, भले ही एक पक्ष मृत्यु का देवता ही क्यों न हो।
यम ने यमुना को क्या वरदान दिया था?
यमुना को अमरता का वरदान मिला, और साथ ही यम ने घोषणा की कि जो भाई बहन से राखी बंधवाएगा, उसे दीर्घायु और अकाल मृत्यु से सुरक्षा प्राप्त होगी — यही परंपरा आज भी रक्षाबंधन में निभाई जाती है।