शूल अभी भी उनकी पीठ से निकल रहा था।
लोहे का वो भाला, जो राजा के सिपाहियों ने उन्हें अपराधी समझकर धँसाया था, अब भी वहीं था — शरीर के आर-पार। वैद्यों ने निकालने की कोशिश की, नहीं निकला। तो मांडव्य मुनि उसे वहीं छोड़ दिया — शूल सहित। और जीते रहे।
कई दिन बीते। कई रातें।
फिर एक सुबह वो उठे, ध्यान में बैठे, और उस शरीर को — जिसमें अभी भी लोहा घुसा था — उस अवस्था में ही यमलोक की ओर चल दिए।
यम की सभा में उस दिन कोई सामान्य आत्मा नहीं आई थी।
जो आया, वो एक ऋषि था। जीवित। क्रोधित। और पीठ में एक शूल लेकर।
यम ने देखा। चित्रगुप्त ने देखा। दरबार के सारे प्राणी स्थिर हो गए।
मांडव्य ने सिंहासन के सामने खड़े होकर कहा — “मुझे बताओ।”
बस इतना। दो शब्द।
यम समझ गए।
“तुमने बचपन में पक्षियों और भ्रमरों को सताया था,” यम ने कहा। आवाज़ में वो भार था जो न्यायाधीशों की आवाज़ में होता है — भारी, निर्विकार, अटल। “उसी कर्म का फल था।”
मांडव्य रुके नहीं।
“कितनी उम्र थी मेरी?”
“छोटी।”
“कितनी छोटी?”
यम चुप रहे।
“बोलो,” मांडव्य ने कहा। “तुम धर्म हो। तुम सत्य हो। तो बोलो — कितनी उम्र?”
“बारह वर्ष से कम।”
“तो,” मांडव्य ने कहा, “एक बच्चे ने — जिसे यह भी नहीं पता था कि भ्रमर को कष्ट होता है — एक पत्थर से उसे उठाकर देखा। जैसे सारे बच्चे करते हैं। जैसे तुम्हारे दरबार में आने वाली हर आत्मा ने किसी न किसी दिन किया होगा।”
यम ने कहा — “कर्म का लेखा होता है—”
“किसका लेखा?” मांडव्य ने बीच में काटा। “बच्चे का? जिसे अभी यह भी नहीं पता था कि उसके हाथ में क्या है? या उस बच्चे का जो बाद में तपस्वी बना, जिसने दशकों जंगल में मौन रहकर साधना की — उसका?”
सभा में कोई नहीं बोला।
“मैंने चोरी नहीं की। मैंने किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया। मैं ध्यान में था जब डाकू मेरे आश्रम में घुसे। मैंने उन्हें न बुलाया, न छुपाया। और तुमने — धर्म ने — यह सुनिश्चित किया कि राजा के सिपाही मुझे अपराधी समझें। कि शूल धँसे। कि लोहा शरीर के पार जाए।”
मांडव्य ने एक पल रुककर पूछा — “यह किस बच्चे का फल था? मेरे उस बच्चे का, जो अभी हिसाब समझना सीख भी नहीं रहा था? या किसी और का?”
यम के पास उत्तर था। उत्तर तो था।
पर वो उत्तर — जो तराजू और लेखे और नियम की भाषा में था — उस दिन किसी काम का नहीं था।
क्योंकि मांडव्य ने वो सवाल नहीं पूछा था जो आत्माएँ पूछती हैं।
उन्होंने वो सवाल पूछा था जो व्यवस्था खुद से कभी नहीं पूछती।
क्या कोई नियम — अगर वो एक बच्चे की अनजान भूल को एक ऋषि के जीवन की त्रासदी में बदल दे — तब भी धर्म कहलाने का अधिकार रखता है?
यम चुप रहे।
और उस चुप्पी में — जो सभा के हर कोने में फैल गई — मांडव्य ने अपना शाप उच्चारित किया।
“तुम जो हो — धर्म, नियम, व्यवस्था — उसे अब मनुष्य की देह में उतरना होगा।”
“उस देह में जो समाज में सबसे नीची मानी जाती है। दासी-पुत्र। जिसके पास न सिंहासन होगा, न राज्य। जो सब जानेगा, सब देखेगा, सब कहेगा — और जिसकी कोई नहीं सुनेगा।”
“तब तुम्हें पता चलेगा कि जब नियम और मनुष्य का सामना होता है — और नियम के पास कोई उत्तर नहीं होता — तो उस क्षण में क्या होता है।”
यम ने वो शाप स्वीकार किया।
इसीलिए महाभारत में विदुर का जन्म हुआ — दासी के पुत्र के रूप में। धृतराष्ट्र और पांडु के भाई, पर बिना अधिकार के। जो हर सत्य जानता था, पर जिसकी बात कोई नहीं मानता था।
धर्म ने मनुष्य की देह में यही सीखा — कि नियम और न्याय एक नहीं होते।
पर यह कहानी विदुर की नहीं है।
यह उस प्रश्न की है जो मांडव्य ने पूछा था।
और जो आज भी, हज़ारों साल बाद, बिना उत्तर के हवा में लटका है —
क्या एक बच्चे को उसके बचपन की गलतियों का हिसाब जीवनभर देना पड़ता है?
और अगर हाँ — तो क्या वो धर्म है? या सिर्फ व्यवस्था का दूसरा नाम?
मांडव्य ने शूल सहित यमलोक की यात्रा की थी। अपनी पीठ में लोहा लेकर।
शायद इसीलिए उनका प्रश्न इतना तीखा था।
यह कहानी महाभारत के आदिपर्व पर आधारित है, जिसमें मांडव्य मुनि और धर्मराज यम का यह संवाद वर्णित है।