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बहादुर गौरैया की कहानी

Rajhussain · 19-July-2026 5 मिनट में पढ़ें
बहादुर गौरैया की कहानी

जेठ की दोपहर थी। गाँव के बाहर वाले पुराने बरगद के नीचे एक पत्थर का हौज बना था, और उस साल आसपास के सारे तालाब सूख चुके थे। बहादुर गौरैया की यह कहानी उसी हौज के किनारे से शुरू होती है, जहाँ एक बड़ा काला कौआ बैठा था।

उसका नाम था कालू। और कालू को पानी पीने का बड़ा अजीब तरीका था — वो खुद पीता था, पर किसी और को नहीं पीने देता था।

जब छोटी-छोटी चिड़ियाँ आतीं, वो काँव-काँव करके उड़ा देता। जब बुलबुल आती, वो पंख फैलाकर डरा देता। जब तोता आता, कालू इतनी ज़ोर से चिल्लाता कि पत्ते हिल जाते।

सारी चिड़ियाँ दूर बैठकर देखती रहतीं। प्यास लगी थी सबको। धूप इतनी तेज़ थी कि डालों की छाल भी गरम हो गई थी। पर हौज के पास जाने की हिम्मत किसी में नहीं थी।

प्यासी डालें

उसी पेड़ की एक पतली डाल पर बैठी थी चिनू।

छोटी सी गौरैया। भूरे पंख, छोटी सी चोंच, और आँखें — गोल और काली और हमेशा कुछ सोचती हुई।

उसके पास ही मुनिया के दो नन्हे बच्चे बैठे थे। सुबह से उन्होंने एक बूँद पानी नहीं पिया था। उनकी चोंच खुली थी और साँस तेज़ चल रही थी। मुनिया बार-बार हौज की तरफ देखती, फिर कालू को देखकर सिर झुका लेती।

“कल भी यही हुआ था,” बुलबुल ने धीमे से कहा। “परसों भी। अगर बारिश नहीं आई तो…”

उसने बात पूरी नहीं की। किसी को पूरी करने की ज़रूरत भी नहीं थी।

चिनू ने नीचे देखा। कालू हौज के किनारे छाती फुलाए बैठा था। फिर उसने कालू को ध्यान से देखा — जैसे कोई पहेली देखता है। कालू हर थोड़ी देर में सिर घुमाकर इधर-उधर देखता था। रास्ते में पड़ी कोई चमकीली चीज़ — बोतल का ढक्कन, काँच का टुकड़ा — दिख जाए, तो उसकी गर्दन वहीं अटक जाती थी।

चिनू ने एक बार आसमान देखा। फिर हौज देखा। फिर कालू देखा। फिर मुस्कुराई — जितना एक गौरैया मुस्करा सकती है।

उसके मन में एक बात आई थी।

चिनू की तरकीब

चिनू ने बुलबुल और तोते के कान में कुछ कहा। “मैं जैसे ही पंख हिलाऊँ, सब एक साथ आना। जल्दी पीना, और किसी को धक्का मत देना। बच्चों को पहले।”

तोते ने आँखें सिकोड़ीं। “और अगर कालू ने तुम्हें पकड़ लिया?”

चिनू ने कोई जवाब नहीं दिया। वो उड़ी और सीधे हौज के पास आ गई।

कालू ने देखा। वो उठने ही वाला था — काँव-काँव करने के लिए — कि चिनू बोली,

“कालू भैया, मैं पानी पीने नहीं आई।”

कालू रुक गया। “तो?”

“मैंने दूर से देखा — खेत की मेड़ के उस पार कुछ चमक रहा है। बड़ा सा। सोने जैसा। मैं तो छोटी हूँ, उतनी दूर उड़ते-उड़ते थक जाऊँगी — पर आप तो बड़े हो, आप झट से पहुँच जाओगे।”

कालू की आँखें चमकीं।

सोने जैसा?

वो एकदम उठा और मेड़ की तरफ उड़ चला — जो हौज से काफी दूर थी।

ठंडा पानी, मीठा पानी

और उसी पल चिनू ने पलटकर देखा। पेड़ पर बैठी सारी चिड़ियाँ उसे देख रही थीं। चिनू ने एक बार पंख हिलाए।

और सब आ गईं।

सबसे पहले मुनिया के बच्चे। फिर बुलबुल। फिर तोता। दो-तीन छोटे पक्षी और आए। किसी ने धक्का नहीं दिया, किसी ने छीना नहीं। सबने मिलकर — झटपट — पानी पिया। ठंडा, साफ, मीठा पानी।

चिनू सबसे आख़िर में पी रही थी, तभी उसने ऊपर देखा। कालू लौट रहा था — जल्दी से, ग़ुस्से में पंख फड़फड़ाता हुआ।

बाकी सब उड़ गए। चिनू नहीं उड़ी।

खाली मेड़ और भरा हौज

कालू हौज के किनारे आकर बैठा। “वहाँ कुछ नहीं था। न सोना, न कुछ और। तुमने मुझसे झूठ बोला।”

चिनू का दिल ज़ोर से धड़क रहा था, पर आवाज़ शांत रही। “हाँ, कालू भैया। झूठ बोला। मुनिया के बच्चे सुबह से प्यासे थे। आप उन्हें पानी के पास आने नहीं देते।”

कालू कुछ बोलने ही वाला था कि उसकी नज़र हौज के पानी पर पड़ी। दस चिड़ियों के पीने के बाद भी पानी लगभग उतना ही था। किनारे तक भरा हुआ। उसने कभी ध्यान ही नहीं दिया था कि इतना छोटा सा घूँट किसी चिड़िया को कितना चाहिए होता है — और हौज में कितना बचता है।

वो बहुत देर तक चुप रहा। फिर उसने धीरे से कहा, “सब पी लेते तब भी खत्म नहीं होता।”

“नहीं होता,” चिनू ने कहा।

कालू ने पंख समेटे और हौज के एक कोने में जाकर बैठ गया। उस दिन उसने किसी को नहीं भगाया।

उस शाम की बात

शाम को चिनू वापस अपनी डाल पर बैठी थी।

बुलबुल ने पूछा, “चिनू, तुम्हें डर नहीं लगा? कालू लौटा तब तुम उड़ी क्यों नहीं?”

चिनू ने सोचा।

“डर लगा था,” उसने कहा। “पर प्यास और भी ज़्यादा लगी थी। और अगर मैं भी उड़ जाती, तो कालू भैया को कौन बताता कि हम क्यों आए थे?”

अगली सुबह जब मुनिया अपने बच्चों को लेकर हौज के पास आई, कालू ने सिर उठाकर देखा — और फिर वापस पानी की तरफ देखने लगा। कोई काँव-काँव नहीं हुई।

ऊपर आसमान में एक बादल का टुकड़ा धीरे-धीरे खिसक रहा था। नीचे हौज का पानी शांत था। चमक रहा था। और उसके किनारे, पहली बार, बड़ी और छोटी चिड़ियाँ एक साथ बैठी थीं।


माता-पिता के लिए एक बात: इस कहानी को पढ़ने के बाद बच्चों से पूछिए कि चिनू ने कालू को सच क्यों बताया, जबकि वह चुपचाप उड़ सकती थी। यह सवाल साहस और ईमानदारी, दोनों पर एक अच्छी बातचीत शुरू करता है।

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