हौज के किनारे एक बड़ा काला कौआ बैठा था।
उसका नाम था कालू। और कालू को पानी पीने का बड़ा अजीब तरीका था — वो खुद पीता था, पर किसी और को नहीं पीने देता था।
जब छोटी-छोटी चिड़ियाँ आतीं, वो काँव-काँव करके उड़ा देता। जब बुलबुल आती, वो पंख फैलाकर डरा देता। जब तोता आता, कालू इतनी ज़ोर से चिल्लाता कि पत्ते हिल जाते।
सारी चिड़ियाँ दूर बैठकर देखती रहतीं। प्यास लगी थी सबको। दोपहर की धूप तेज़ थी। पर हौज के पास जाने की हिम्मत किसी में नहीं थी।
उसी पेड़ की एक पतली डाल पर बैठी थी चिनू।
छोटी सी गौरैया। भूरे पंख, छोटी सी चोंच, और आँखें — गोल और काली और हमेशा कुछ सोचती हुई।
चिनू ने नीचे देखा। कालू हौज के किनारे छाती फुलाए बैठा था।
चिनू ने एक बार आसमान देखा। फिर हौज देखा। फिर कालू देखा। फिर मुस्कुराई — जितना एक गौरैया मुस्करा सकती है।
उसके मन में एक बात आई थी।
चिनू उड़ी और सीधे हौज के पास आ गई।
कालू ने देखा। वो उठने ही वाला था — काँव-काँव करने के लिए — कि चिनू बोली,
“कालू भैया, मैं पानी पीने नहीं आई।”
कालू रुक गया। “तो?”
“मैंने दूर से देखा — हौज के उस कोने में कुछ चमक रहा है। बड़ा सा। सोने जैसा। मुझे तो उड़ना नहीं आता वहाँ तक — पर आप तो बड़े हो, आप जा सकते हो।”
कालू की आँखें चमकीं।
सोने जैसा?
वो एकदम उठा और हौज के उस कोने की तरफ उड़ चला — जो हौज से काफी दूर था।
और उसी पल —
चिनू ने पलटकर देखा।
पेड़ पर बैठी सारी चिड़ियाँ उसे देख रही थीं।
चिनू ने एक बार पंख हिलाए।
और सब आ गईं।
बुलबुल आई। तोता आया। मुनिया आई। दो-तीन छोटे पक्षी और आए। सबने मिलकर — झटपट — पानी पिया। ठंडा, साफ, मीठा पानी।
कालू जब वापस आया, तो कोना खाली था। न सोना था, न कुछ और।
उसने पलटकर देखा। हौज के पास कोई नहीं था। सब जा चुके थे।
कालू बहुत देर तक उस खाली कोने को देखता रहा।
शाम को चिनू वापस अपनी डाल पर बैठी थी।
बुलबुल ने पूछा, “चिनू, तुम्हें डर नहीं लगा?”
चिनू ने सोचा।
“लगा था,” उसने कहा। “पर प्यास और भी ज़्यादा लगी थी।”
और फिर वो चुप हो गई।
ऊपर आसमान में एक बादल का टुकड़ा धीरे-धीरे खिसक रहा था। नीचे हौज का पानी शांत था। चमक रहा था।
जैसे कुछ हुआ ही न हो।