कैलकुलेटर के ‘7’ वाले बटन ने उस रात तीसरी बार जवाब दे दिया।
सुनीता ने उसे हथेली पर दो बार ठोका — जैसे किसी ज़िद्दी बच्चे की पीठ थपथपाई जाती है — और फिर से जोड़ना शुरू किया। दस किलो आटा। अरहर की दाल। सरसों का तेल। चीनी। महीने भर का दूध। अम्मा जी की दवाइयाँ। बिजली का बिल। अंशु की स्कूल वैन।
नीचे जो संख्या आई, वो पिछले महीने से सात सौ चालीस रुपये ज़्यादा थी। और राकेश की तनख़्वाह? पिछले महीने जितनी ही।
रसोई की मेज़ पर स्टील के गिलास में आधी चाय ठंडी हो चुकी थी। बगल के कमरे में टीवी धीमी आवाज़ में कुछ बोल रहा था — शायद महंगाई की ही कोई ख़बर। सुनीता ने उसे बंद करने की ज़हमत नहीं उठाई। उसे ख़बर सुनने की ज़रूरत नहीं थी। ख़बर उसके सामने काग़ज़ पर लिखी थी, उसकी अपनी लिखावट में।
भोपाल की इस तंग गली के दो कमरों वाले मकान में, और शायद देश के हर मध्यमवर्गीय परिवार की रसोई में, महीने की पहली तारीख़ को यही हिसाब होता है। बस कैलकुलेटर अलग-अलग होते हैं।
सूची पर पहली लकीर
राकेश रात साढ़े दस बजे लौटे। कपड़े की एक थोक फ़र्म में अकाउंटेंट थे — दिन भर दूसरों के बही-खाते मिलाते, और घर आकर अपना हिसाब देखने से कतराते।
“कितना ऊपर गया?” उन्होंने जूते खोलते हुए पूछा, बिना सुनीता की तरफ़ देखे।
“सात सौ चालीस।”
राकेश कुछ देर चुप रहे। फिर कुर्सी खींचकर मेज़ के दूसरी तरफ़ बैठ गए, और दोनों ने वो काम शुरू किया जो पति-पत्नी शादी के मंडप में नहीं सीखते — एक सूची में से अपनी ज़िंदगी के टुकड़े काटना।
पैकेट वाला घी सबसे पहले कटा। “खुला ले आऊँगी, गुप्ता जी के यहाँ से। फ़र्क़ पता नहीं चलेगा।”
दूध ढाई लीटर से दो लीटर हुआ।
“मैं ऑफ़िस पैदल चला जाऊँगा,” राकेश ने कहा। “चालीस मिनट ही तो है। ऑटो के महीने के आठ सौ बचेंगे।”
“और घुटना?”
“घुटना ठीक है।”
घुटना ठीक नहीं था। दोनों जानते थे। सुनीता ने बहस नहीं की। उसने बस पेन उठाया और सूची की दो पंक्तियों के चारों ओर दो-दो गोले बना दिए — अम्मा जी की दवाइयाँ और अंशु का दूध। ये दोनों कभी नहीं कटेंगे। बाक़ी सब पर बात हो सकती थी।
महंगाई की मार, जो किसी बिल में नहीं दिखती
दूसरे हफ़्ते तक घर में कुछ बदलाव ऐसे आ गए थे जो किसी को दिखते नहीं थे — ख़ासकर इसलिए कि कोई उन्हें दिखाना नहीं चाहता था।
सुनीता अब सब्ज़ी लेने शाम साढ़े आठ बजे जाती थी। उस वक़्त रामदीन काका दिन के बचे हुए टमाटर आधे दाम पर दे देते थे — थोड़े दबे हुए, थोड़े थके हुए, पर चटनी के लिए बिल्कुल ठीक।
शाम के ट्यूशन में एक बच्चा और जुड़ गया। अब वो छह बजे से साढ़े आठ तक पढ़ाती, फिर सब्ज़ी, फिर खाना।
राकेश ने दफ़्तर की कैंटीन का समोसा छोड़ दिया। टिफ़िन में दो की जगह तीन रोटियाँ जाने लगीं। उन्होंने सुनीता को नहीं बताया।
और सुनीता ने अपनी चाय में इलायची डालना बंद कर दिया। इलायची अब सिर्फ़ अम्मा जी की चाय में जाती थी, या तब, जब कोई मेहमान आता। अपने आप से उसने कह दिया कि उसे इलायची वैसे भी कुछ ख़ास पसंद नहीं थी। ये झूठ इतना छोटा था कि उसे झूठ कहना भी अजीब लगता।
किसी ने किसी से शिकायत नहीं की। मध्यमवर्ग के घर में महंगाई ऐसे ही आती है — चुपचाप, एक-एक इलायची करके।
फ़्रिज पर हर महीने की तरह किराने की सूची चिपकी थी। और हर महीने की तरह उसके सबसे नीचे, नीली पेंसिल की टेढ़ी-मेढ़ी लिखावट में, कुछ और भी लिखा था:
मैगी (2 पैकेट) रसमलाई क्रिकेट बॉल — लाल वाली
ये अंशु की सूची थी। नौ साल का अंशु हर महीने अपनी फ़रमाइशें वहीं लिख देता था, जैसे वो भी इस घर का बराबर का हिस्सेदार हो।
इस महीने सुनीता ने वो चीज़ें ख़रीदीं नहीं। काटीं भी नहीं। उसने रबर से मिटा दीं — ध्यान से, ताकि काग़ज़ न फटे। कटी हुई लकीर ‘ना’ कहती है। मिटा हुआ शब्द कुछ नहीं कहता। उसे लगा, कुछ न कहना बेहतर है।
अंशु के सवाल
“मम्मी, इस संडे पनीर क्यों नहीं बना?”
“पनीर वाले भैया गाँव गए हैं।”
अंशु ने सिर हिलाया, जैसे बात मान ली हो।
अगले हफ़्ते स्कूल से एक पर्ची आई — साँची के स्तूप की पिकनिक, चार सौ पचास रुपये। अंशु ने पर्ची खाने की मेज़ पर रखी और बहुत सँभलकर पूछा, “जा सकता हूँ?”
“देखेंगे,” सुनीता ने कहा।
अंशु नौ साल का था, पर इतना बड़ा हो चुका था कि जानता था — घर में ‘देखेंगे’ का मतलब अक्सर ‘नहीं’ होता है।
उस रात उसने राकेश से पूछा, “पापा, क्या हम ग़रीब हो गए हैं?”
राकेश ज़ोर से हँस पड़े — ज़रूरत से कुछ ज़्यादा ज़ोर से। “ग़रीब? हम? तेरे पापा अकाउंटेंट हैं, बेटा! पूरी फ़र्म का पैसा गिनते हैं!”
अंशु भी हँसा। और फिर उसने दोबारा कभी वो सवाल नहीं पूछा।
बच्चे सवाल पूछना तब नहीं छोड़ते जब उन्हें जवाब मिल जाता है। वो तब छोड़ते हैं जब देख लेते हैं कि जवाब देने में किसी को तकलीफ़ हो रही है।
पिकनिक के पैसे आख़िर जुट गए। सुनीता की चप्पल का उखड़ा तल्ला एक महीना और सेफ़्टी पिन के भरोसे चल सकता था। अंशु साँची गया, और लौटकर बस इतना बताया कि वहाँ बहुत सारी सीढ़ियाँ थीं और उसने एक गिलहरी देखी। इससे ज़्यादा कुछ नहीं। सुनीता को लगा, शायद उसे मज़ा नहीं आया।
उसे नहीं पता था कि पिकनिक के लिए मिले साठ रुपये अंशु ने वहाँ ख़र्च ही नहीं किए थे।
आख़िरी हफ़्ता, और सूची पर एक नई लिखावट
महीने के आख़िरी मंगलवार को सुनीता ने अगले महीने की सूची बनाकर फ़्रिज पर चिपका दी। पहले से छोटी। दाल आधा किलो कम। तेल की बोतल छोटी वाली।
बुधवार सुबह, चाय चढ़ाते हुए, उसकी नज़र सूची के सबसे नीचे गई।
वहाँ फिर नीली पेंसिल थी।
मैगी (2 पैकेट) — और उस पर एक सीधी लकीर। रसमलाई — उस पर भी लकीर। क्रिकेट बॉल — लाल वाली — लकीर।
इस बार किसी ने उन्हें मिटाया नहीं था। किसी ने उन्हें ख़ुद लिखा था, और ख़ुद काटा था।
और उनके नीचे एक नई पंक्ति थी, उतने साफ़ अक्षरों में जितने साफ़ अंशु लिख सकता था:
इलायची — मम्मी की चाय के लिए। (पैसे मेरे पास हैं)
सूची के बगल में, फ़्रिज के मैग्नेट के नीचे दबे, दस-दस के छह मुड़े हुए नोट थे।
सुनीता देर तक वहीं खड़ी रही। चूल्हे पर चाय उबलकर बर्तन के किनारे तक आ गई। उसने गैस बंद की, और रसोई की उसी मेज़ पर बैठ गई जहाँ महीने की पहली रात बैठी थी। कैलकुलेटर सामने पड़ा था।
उसे लगा था वो अंशु से सब छुपा रही है। मिटाए हुए शब्द, ‘देखेंगे’, पनीर वाले भैया का गाँव। पर नौ साल के उस बच्चे ने पूरे महीने सब देखा था — वो इलायची भी, जो उसकी माँ की चाय से चुपचाप ग़ायब हो गई थी, और जिसके बारे में उसकी माँ ने ख़ुद से भी झूठ बोल दिया था।
राकेश कमरे से निकले, बाल सँवारते हुए। “क्या हुआ? चाय नहीं बनी?”
सुनीता ने कुछ नहीं कहा। बस फ़्रिज की तरफ़ इशारा कर दिया।
राकेश ने सूची पढ़ी। फिर दोबारा पढ़ी। फिर मुड़कर खिड़की की तरफ़ देखने लगे, देर तक, जैसे गली में कुछ बहुत ज़रूरी हो रहा हो।
उस महीने की सूची अब तक की सबसे छोटी सूची थी।
पर उस पर पहली बार एक ऐसी चीज़ लिखी थी जिसे कोई कैलकुलेटर नहीं जोड़ सकता था।
सुनीता ने कैलकुलेटर उठाया, और बिना एक भी बटन दबाए, उसे दराज़ में रख दिया।
हर मध्यमवर्गीय परिवार के फ़्रिज पर ऐसी एक सूची चिपकी होती है। अगर घर का बजट आपको भी रातों को जगाए रखता है, तो आप अकेले नहीं हैं — राष्ट्रीय वित्तीय शिक्षा केंद्र (NCFE) की वेबसाइट ncfe.org.in पर घरेलू बजट और बचत से जुड़ी मुफ़्त सामग्री उपलब्ध है।
