स्क्रीन पर जैसे ही लिखा आया — “रामप्रसाद जी पर बकाया: ₹4,00,000” — हॉल की तीसरी कतार में किसी ने हँसी दबाई, और कुणाल को समझ आ गया कि उसकी ज़िंदगी के सबसे ज़रूरी सात मिनट खत्म हो चुके हैं।
उसने माइक में साफ़ बोला था, “रामप्रसाद जी, चार सौ, उधार।” उसके पीछे मंच पर एक बड़ा बैनर लगा था: “अगली बड़ी AI स्टार्टअप की कहानी यहीं से शुरू होगी।” और उसी बैनर के नीचे उसका अपना बनाया ऐप, ‘मुनीमजी’, एक बुज़ुर्ग पर चार लाख का कर्ज़ चढ़ा चुका था।
डेमो के सातवें मिनट में
“एक सेकंड,” कुणाल ने कहा। उसकी उंगलियाँ कीबोर्ड पर काँप रही थीं। “हॉल का AC थोड़ा… आवाज़ में शोर आ गया।”
उसने दोबारा बोला। इस बार स्क्रीन पर आया: ₹400। किसी ने शिष्टाचार में ताली बजाई। बाकी लोग अपने फ़ोन देखने लगे।
नीले ब्लेज़र वाले सज्जन, जो पूरे समय चुप बैठे थे, पहली बार आगे झुके।
“गलती तो ठीक हो जाएगी,” उन्होंने नरमी से कहा। “पर एक बात बताइए। अगले महीने कोई बड़ी कंपनी यही चीज़ अपने पेमेंट ऐप में मुफ़्त डाल दे — तब आप क्या करेंगे?”
कुणाल ने वो जवाब शुरू किया जो उसने आईने के सामने चालीस बार बोला था। “हमारा मॉडल हिंदी की बोलियों पर ट्रेन किया गया है, और…”
उसकी आवाज़ बीच में ही पतली हो गई। उसे खुद अपने जवाब पर यकीन नहीं था।
“धन्यवाद, कुणाल। अगला।”
वो बाईस साल का था। पूरे सात मिनट मंच पर रहा। और उतरते वक्त उसे लगा जैसे सीढ़ियाँ बहुत लंबी हो गई हों।
AI स्टार्टअप की सुर्खियाँ और एक कमरे का सच
भोपाल लौटने वाली ट्रेन में चौदह घंटे थे। स्लीपर डिब्बे की ऊपर वाली बर्थ पर लेटे-लेटे उसका फ़ोन बार-बार चमकता रहा।
“AI कंपनी ने जुटाए चार सौ करोड़।”
“कॉलेज छोड़ा, AI बनाया, अब करोड़ों की कंपनी।”
“हर युवा के पास अब एक AI आइडिया है — क्या आपके पास है?”
उसे याद आया, डेढ़ साल पहले इन्हीं सुर्खियों ने उसे नौकरी का ऑफ़र लेटर लौटाने की हिम्मत दी थी। तब हर खबर एक दरवाज़े जैसी लगती थी। आज हर खबर एक आईना थी, जिसमें उसका अपना चेहरा छोटा दिख रहा था।
घर पहुँचा तो माँ ने कुछ नहीं पूछा। बस चाय रख दी, वही स्टील का गिलास, और उसके कमरे का पर्दा थोड़ा खींच दिया ताकि धूप लैपटॉप पर न पड़े।
वो कमरा पहले दीदी का था। दीवारें अब भी हल्की गुलाबी थीं, और एक कोने में अब भी उनका पुराना ड्रेसिंग टेबल खड़ा था जिस पर अब एक सेकंड-हैंड मॉनिटर रखा था। यही उसका ‘ऑफ़िस’ था। यहीं से ‘मुनीमजी’ बना था।
रात को उसने वो हिसाब खोला जिसे वो रोज़ देखता था और रोज़ बंद कर देता था।
फ्रीलांस से बचाए ₹2,80,000। पापा की एक FD, जो उन्होंने बिना कुछ कहे तोड़ दी थी — ₹1,00,000। हर महीने सर्वर और AI का बिल, जो डॉलर में आता था और रुपये में चुभता था — लगभग ₹38,000। बाकी खर्च अलग।
उसने गुणा-भाग किया। पाँच महीने। ज़्यादा से ज़्यादा छह।
सुर्खियों में कभी यह हिस्सा नहीं छपता था। उनमें करोड़ होते थे, पर यह कभी नहीं होता था कि किसी के पापा ने अपनी FD क्यों तोड़ी।
उस रात खाने पर पापा ने सिर्फ एक सवाल पूछा। “कितने लोग पैसे देते हैं इसके?”
“अभी कोई नहीं, पापा। अभी हम यूज़र्स बना रहे हैं।”
पापा ने सिर हिलाया और रोटी तोड़ी। उस चुप्पी में जितना था, वो किसी इन्वेस्टर के सवाल से ज़्यादा भारी था।
शबाना आंटी का खाता
मोहल्ले की ग्यारह दुकानें ‘मुनीमजी’ मुफ़्त में इस्तेमाल करती थीं। सच कहें तो दस दुकानें कभी-कभी खोलती थीं। रोज़ सिर्फ एक दुकान इस्तेमाल करती थी — गली के मोड़ पर शबाना आंटी का जनरल स्टोर।
वो फ़ोन से ऐसे बात करती थीं जैसे सामने कोई सचमुच का मुनीम बैठा हो।
“मुनीमजी, पिंटू की मम्मी, डेढ़ सौ, दूध-ब्रेड, महीने के आख़िर में देंगी।”
“मुनीमजी, बड़े वाले पप्पू — छोटे वाले नहीं, ध्यान से — सवा दो सौ।”
कुणाल को उनकी शिकायतें याद थीं। “तुम्हारा मुनीमजी ‘सवा’ नहीं समझता।” “दो पप्पू हैं, बेटा, एक नहीं।” उसने ये सब एक फ़ाइल में लिख रखी थीं, जिसका नाम था ‘छोटे बग’। उसने इन्हें कभी ज़रूरी नहीं समझा। ज़रूरी तो डेमो था, पिच डेक था, बड़ा मंच था।
भोपाल लौटने के तीसरे दिन वो उनकी दुकान पर गया। उसने सोच लिया था कि साफ़ बता देगा — शायद उसे यह सब बंद करना पड़े।
वो सवाल जिसका जवाब किसी पिच डेक में नहीं था
“बंद?” शबाना आंटी ने चश्मा नाक से नीचे सरकाया। “फिर मेरे खाते का क्या होगा? पिछले छह महीने का सारा उधार इसी में है।”
“आंटी, कोई बड़ी कंपनी ऐसी चीज़ बना देगी। मुफ़्त में। मैं उनसे नहीं लड़ सकता।”
आंटी हँसीं — वैसी हँसी जो बच्चों की बेवकूफ़ी पर आती है।
“बड़ी कंपनी आएगी तो आएगी। वो मेरी दुकान पर बैठेगी? उसे पता है कि रामप्रसाद जी हर महीने सात तारीख़ को ही पैसे देते हैं, क्योंकि उनकी पेंशन सात को आती है? उसे पता है कि ‘मस्जिद वाली गली की भाभी’ और ‘नई भाभी’ दो अलग लोग हैं?”
कुणाल चुप रहा।
“तुम्हारा मुनीमजी ये सब जानता है। क्योंकि तुम यहाँ आते हो। बैठते हो। मेरी डाँट सुनते हो।”
उसी वक्त दुकान के पीछे वाले घर में किसी का प्रेशर कुकर सीटी मार गया। आंटी ने फ़ोन उठाया और बोलीं, “मुनीमजी, नई भाभी, अस्सी।”
स्क्रीन पर आया: ₹80,000।
आंटी ने स्क्रीन उसकी तरफ़ घुमा दी। “ये देखो। ये होता है रोज़।”
कुणाल को जैसे किसी ने धीरे से झिंझोड़ दिया। मंच पर जो गलती हुई थी, वो AC की गलती नहीं थी। वो उसकी अपनी गलती थी। उसने ‘मुनीमजी’ को अपने शांत, गुलाबी कमरे में टेस्ट किया था — जहाँ न कुकर की सीटी थी, न ग्राहकों की आवाज़ें, न सड़क का शोर। उसने एक दुकान के लिए नहीं, एक मंच के लिए ऐप बनाया था।
नीले ब्लेज़र वाले सज्जन के सवाल का जवाब उसके पास अब था। वो किसी स्लाइड में नहीं आता। वो इस गली में था।
दो सौ रुपये का नोट
अगले तीन हफ़्ते उसने कोई नई फ़ीचर नहीं बनाई।
उसने माँ से कहा कि रसोई में कुकर चढ़ाते वक्त फ़ोन पास रख दें। उसने गली के शोर, दुकान की घंटी और बच्चों की चीख-पुकार की रिकॉर्डिंग जमा की। उसने ‘सवा’, ‘डेढ़’ और ‘ढाई’ सिखाए। और सबसे ज़रूरी — उसने ‘मुनीमजी’ को शक करना सिखाया। अब पाँच हज़ार से ऊपर की कोई भी रकम आती, तो ऐप वापस पूछता: “अस्सी हज़ार? पक्का?”
महीने के आख़िर में वो फिर शबाना आंटी की दुकान पर गया, इस बार हाथ में एक छपी हुई पर्ची लेकर।
“आंटी, अगले महीने से मुनीमजी के ₹199 महीना लगेंगे।”
“सौ,” आंटी ने बिना ऊपर देखे कहा।
“आंटी, सर्वर का बिल…”
“डेढ़ सौ।”
“एक सौ निन्यानवे, आंटी। इससे कम में बंद करना पड़ेगा।”
आंटी ने गल्ले से दो सौ का एक मुड़ा हुआ नोट निकाला और काउंटर पर रख दिया। फिर हथेली आगे बढ़ाई।
“एक रुपया वापस। हिसाब हिसाब होता है।”
कुणाल ने जेब टटोली और एक का सिक्का उनकी हथेली पर रख दिया। उस दिन उसने किसी से पहली बार अपने काम के पैसे लिए थे।
महीने के अंत तक ग्यारह में से चार दुकानों ने पैसे दिए। कुल ₹796। बिल अब भी ₹38,000 था। हिसाब अब भी नहीं बैठता था, और कुणाल ये जानता था।
पर इस बार उसे पता था कि वो किसके लिए बना रहा है।
अख़बारों में जो AI स्टार्टअप की कहानी छपती है, उसमें यह हिस्सा नहीं होता। उसमें कुकर की सीटी नहीं होती, दो पप्पू नहीं होते, और एक रुपये का वो सिक्का नहीं होता जो वापस करना पड़ता है।
उस रात कुणाल ने शबाना आंटी वाला दो सौ का नोट अपने मॉनिटर के ऊपर टेप से चिपका दिया — ठीक उस पुरानी कतरन के बगल में जो डेढ़ साल से वहाँ लगी थी, जिस पर लिखा था “AI कंपनी ने जुटाए चार सौ करोड़।”
दीवार पर अब दो रकमें थीं।
एक किसी और की थी।
दूसरी उसकी अपनी।
यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है। इसके सभी पात्र, दुकानें और घटनाएँ लेखक की कल्पना हैं।
अगर आप भी पैसों या काम के दबाव में खुद को अकेला महसूस कर रहे हैं, तो किसी भरोसेमंद इंसान से बात करें। भारत सरकार की मुफ़्त हेल्पलाइन Tele-MANAS (14416) पर भी बात की जा सकती है।
