सुबह साढ़े चार बजे सास ने दरवाज़ा खटखटाया — “उठो बहू, सरगी का वक़्त निकला जा रहा है।”
रिया आधी नींद में उठी, और वहीं, तकिए के नीचे हाथ डालते हुए, उसने पहली बार सोचा — सरगी होती क्या है, ये उसे ठीक-ठीक पता ही नहीं।
अपने घर में करवा चौथ कभी बड़ा त्योहार नहीं रहा। मम्मी कभी-कभी शाम को हल्का उपवास रखतीं, बस इतना ही। यहाँ, ससुराल में, पूरा घर हफ्ते भर पहले से इसकी तैयारी में लगा था — मेहंदी, चूड़ियाँ, एक थाली जो सालों से इस्तेमाल होती आई थी और जिस पर हर साल के निशान थे।
रिया ने चुपचाप साड़ी पहनी, नीचे गई, और वो सब किया जो उसने रात को गूगल पर पढ़ा था।
सरगी की थाली और वो सवाल जो उसने नहीं पूछा
सास ने थाली उसके सामने रखी — फल, मिठाई, सेवइयाँ, और एक छोटी कटोरी में कुछ जो रिया पहचान नहीं पाई।
“ये खा लो, बाकी दिन भर कुछ नहीं मिलेगा,” सास मुस्कुराते हुए बोलीं, जैसे ये सबसे मामूली बात हो।
रिया ने सिर हिलाया, जैसे उसे सब पता हो। उसने पूछना चाहा — ये कटोरी वाली चीज़ क्या है, कितना खाना है, पानी कब तक पी सकते हैं — लेकिन सवाल गले में ही अटक गया। सब उसे ऐसे देख रहे थे जैसे ये उसका भी बचपन का त्योहार हो। वो कैसे कहती कि उसने पिछले चौबीस साल में करवा चौथ का व्रत कभी नहीं रखा?
उसने चुपचाप खा लिया, बिना गिनती किए, बिना पूछे। सूरज निकलने से पहले उसका पेट भरा था, लेकिन मन में एक अजीब सी खालीपन बैठ गई — किसी और के त्योहार में मेहमान बनकर आने जैसी।
दोपहर, प्यास, और वो झूठी मुस्कान
दोपहर तक गला सूखने लगा। रिया ने पानी की बोतल को तीन बार हाथ में उठाया और तीनों बार वापस रख दिया।
फोन पर सहेलियों के मैसेज आ रहे थे — “कैसा लग रहा है पहला करवा चौथ?” उसने रिप्लाई में एक दिल वाली इमोजी भेज दी, ज़्यादा कुछ लिखने की हिम्मत नहीं हुई। सच लिखती तो क्या लिखती — कि उसे नहीं पता चाँद कब निकलेगा, छलनी किस तरफ से पकड़नी है, और पूजा की थाली में क्या-क्या रखा जाता है?
ननद ने हँसते हुए पूछा, “भाभी, आपकी मम्मी के यहाँ भी इतनी धूमधाम होती थी करवा चौथ पर?”
“हाँ, कुछ-कुछ,” रिया ने कहा, और तुरंत खिड़की की तरफ देखने लगी, जैसे कुछ बहुत ज़रूरी बाहर हो रहा हो।
झूठ बड़ा नहीं था। लेकिन हर बार जब उसने ऐसा कोई छोटा झूठ बोला, उसे लगा जैसे वो अपने ही घर में किसी और की भूमिका निभा रही है।
चाँद निकलने से पहले की वो चुप्पी
शाम को जब पूजा की तैयारी शुरू हुई, रिया चुपचाप बाकी औरतों के पीछे खड़ी हो गई। हर कोई जानता था कब हाथ जोड़ने हैं, कब चलनी घुमानी है, कब दिया दिखाना है। रिया बस नकल कर रही थी — एक सेकंड पीछे, एक हरकत देर से।
छत पर जब वो चाँद का इंतज़ार करने गई, बाकी सब औरतें एक साथ खड़ी बातें कर रही थीं, हँस रही थीं, पुरानी करवा चौथ की कहानियाँ सुना रही थीं। रिया थोड़ी दूर खड़ी रही, हाथ में छलनी लिए, ये सोचती हुई कि क्या उसकी भूख और उसकी बेचैनी असली है या बस एक परफॉर्मेंस।
तभी उसे लगा कि किसी ने पीछे से उसका हाथ हल्के से पकड़ा।
अर्जुन ने वो देखा जो किसी ने नहीं देखा
अर्जुन धीरे से उसके पास आया, हाथ में पानी का एक छोटा गिलास और एक बिस्किट लिए।
“अभी नहीं,” रिया फुसफुसाई, इधर-उधर देखते हुए, “किसी ने देख लिया तो?”
“किसी को कुछ नहीं दिखेगा,” उसने कहा, गिलास उसकी हथेली में थमाते हुए, “बस दो घूँट। कोई नहीं जानेगा, और मुझे परवाह भी नहीं अगर जान भी जाएँ।”
रिया ने उसकी तरफ देखा। “तुम्हें कैसे पता कि मुझे प्यास लगी है?”
“क्योंकि तुम सुबह से एक बार भी शिकायत नहीं कर रही,” वो मुस्कुराया, “और तुम हमेशा शिकायत करती हो जब सब ठीक होता है। आज सुबह से चुप हो। मुझे लगा शायद तुम्हें डर लग रहा है कुछ गलत करने का।”
रिया की आँखों में अचानक पानी आ गया। किसी ने उससे नहीं पूछा था दिन भर में कि वो ठीक है या नहीं। सबने बस मान लिया था कि वो जानती है, कि उसे भी उतना ही आता है जितना इस घर में सबको।
“मुझे नहीं पता था छलनी किधर से पकड़नी है,” उसने धीरे से कहा, “मुझे नहीं पता सरगी में क्या खाना होता है, या चाँद को कैसे देखना है शीशे में। मैंने बस सबकी नकल की आज दिन भर।”
अर्जुन हँसा नहीं। उसने उसका हाथ पकड़ा और कहा, “तो अगले साल से मैं तुम्हें सिखाऊँगा — अपने तरीके से, अपनी रफ़्तार से। ये तुम्हारा व्रत है, माँ का नहीं, दादी का नहीं। जैसे तुम चाहो वैसे मनाओ।”
चाँद जब आख़िरकार बादलों के पीछे से निकला, रिया ने छलनी में सबसे पहले चाँद को नहीं, अर्जुन के चेहरे को देखा। उसने पानी उसके हाथ से पिया, बिना ये सोचे कि कोई देख रहा है या नहीं। पहली बार उस दिन, वो व्रत उसका अपना लगा।
