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करवा चौथ की कहानी: जब पति ने चुपके से रखा व्रत

Rajhussain · 06-September-2026 5 मिनट में पढ़ें
करवा चौथ की कहानी: जब पति ने चुपके से रखा व्रत

सुबह पौने छह बजे अनन्या की नींद टूटी तो कमरे में अंधेरा था, पर किचन से बर्तनों की हल्की आवाज़ आ रही थी। वो चौंकी — करण इतनी सुबह?

वो दबे पांव बाहर आई। करण गैस पर दूध चढ़ा रहा था, और साथ में दो प्लेटों में सर्गी सजा रहा था। एक उसकी माँ की भेजी हुई मिठाई, एक फल, थोड़े मेवे।

“ये… दो प्लेट क्यों?” अनन्या ने पूछा, आवाज़ अब भी नींद में लिपटी हुई।

करण ने बिना मुड़े जवाब दिया, “तुम्हारा व्रत है ना आज।”

“हाँ, पर तुम्हारी प्लेट क्यों?”

वो अब मुड़ा। थोड़ा हिचकिचाया, फिर बोला, “सोचा इस बार साथ रखूं।”

सुबह छह बजे की चुप्पी

अनन्या हँस पड़ी, आधी नींद में, आधी हैरानी में। “तुम? तुमने तो पानी बिना पिए दो घंटे भी नहीं निकाले कभी।”

“पता है,” करण ने कंधे उचकाए, “पर हर साल तुम सुबह अकेले उठती हो, अकेले सर्गी खाती हो, दिन भर प्यासी रहती हो, और मैं शाम को बस चांद देखने आ जाता हूं दस मिनट के लिए। इस बार लगा — कम से कम एक दिन तो साथ चलूं।”

अनन्या कुछ नहीं बोली। उसने बस सर्गी की प्लेट उठाई और दोनों चुपचाप खाने लगे, घड़ी की सुई साढ़े छह की तरफ बढ़ती हुई, बाहर अभी अंधेरा।

खाना खत्म होते ही करण ने पानी का गिलास भरा, आधा पिया, और बाकी सिंक में गिरा दिया — जैसे खुद को यकीन दिला रहा हो कि अब वापसी नहीं।

ऑफिस में पानी की बोतल

दिन चढ़ते ही दोनों अपने-अपने दफ्तर निकल गए। करण की मेज़ पर हमेशा की तरह पानी की बोतल रखी थी, भरी हुई, पर उसने उसे छुआ नहीं।

दोपहर की मीटिंग में जब सबने कॉफी मंगाई, करण ने “नहीं, मैं ठीक हूं” कह दिया। किसी ने पूछा तक नहीं क्यों — शायद सोचा तबीयत ठीक नहीं। उसने बताया भी नहीं कि वजह क्या है। ये बात सिर्फ उसकी और अनन्या की थी।

तीन बजे उसने अनन्या को मैसेज किया — “कैसा चल रहा है?”

जवाब आया — “गला सूख रहा है। तुम?”

“सर घूम रहा है थोड़ा। पर ठीक हूं।”

“पहली बार है ना, इसलिए। मुझे भी पहले साल ऐसा ही हुआ था।”

करण ने फोन रख दिया और खिड़की से बाहर देखता रहा। उसे अचानक याद आया — पिछले चार सालों में उसने कभी नहीं पूछा था कि अनन्या को दफ्तर में प्यास कैसे सहनी पड़ती है, या मीटिंग रूम में कॉफी की खुशबू से कैसे मुंह मोड़ना पड़ता है।

करवा चौथ की कहानी में एक नया किरदार

शाम छह बजे तक करण का सर सच में भारी होने लगा था। उसने कभी सोचा नहीं था कि सिर्फ पानी ना पीना इतना मुश्किल हो सकता है। दफ्तर से निकलते वक्त उसके एक सहकर्मी ने मज़ाक में पूछा, “आज कुछ अलग लग रहे हो, सब ठीक?”

करण मुस्कुराया, कुछ बोला नहीं।

घर पहुंचकर उसने देखा अनन्या बालकनी में बैठी है, हाथों में मेहंदी अब भी हल्की सी महक रही है, आंखें छत की तरफ, चांद ढूंढती हुईं।

वो उसके बगल में बैठ गया। दोनों ने कुछ नहीं कहा। सिर्फ बैठे रहे, दो थके हुए, प्यासे लोग, एक ही आसमान को देखते हुए।

अनन्या ने आखिर पूछा, “क्यों किया ये आज?”

करण ने थोड़ी देर सोचा। “क्योंकि मैं जानना चाहता था कि तुम हर साल क्या महसूस करती हो। सिर्फ पूजा नहीं — पूरा दिन। और अब जान गया — ये सिर्फ भूख-प्यास की बात नहीं है। ये पूरे दिन किसी को याद रखने की बात है।”

चांद से पहले वो लम्हा

रात पौने आठ बजे मोहल्ले में शोर बढ़ने लगा — छतों पर, बालकनियों में औरतें छलनी लिए खड़ी थीं, इंतज़ार में। अनन्या भी उठी, अपनी थाली सजाई, छलनी उठाई।

करण उसके पीछे खड़ा हो गया — पास से देखने के लिए नहीं, बल्कि साथ खड़े होने के लिए।

जब चांद निकला, अनन्या ने छलनी से पहले चांद को देखा, फिर करण को। उसकी आंखों में पानी आ गया, पर वजह प्यास नहीं थी।

करण ने पानी का गिलास उसके हाथ में थमाया, धीरे से कहा, “पहले तुम पियो।”

अनन्या ने गिलास लिया, एक घूंट पी, फिर वही गिलास करण की तरफ बढ़ा दिया।

“नहीं,” वो बोली, “आज दोनों साथ पिएंगे।”

दोनों ने एक ही गिलास से घूंट भरा, बालकनी की हल्की रोशनी में, नीचे सड़क पर किसी और घर से पटाखों की हल्की आवाज़ आती हुई। किसी ने कुछ नहीं कहा। कहने की ज़रूरत नहीं थी।

इस कथा से जुड़े सवाल

करवा चौथ का व्रत क्यों रखा जाता है? पारंपरिक रूप से विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुरक्षा की कामना के लिए यह व्रत रखती हैं, सूर्योदय से लेकर चांद निकलने तक बिना अन्न-जल के।

क्या पति भी करवा चौथ का व्रत रख सकते हैं? पारंपरिक रीति में यह व्रत महिलाओं का माना जाता रहा है, पर आजकल कई शहरी जोड़ों में पति भी साथ में व्रत रखने लगे हैं — यह किसी नियम से नहीं, बल्कि आपसी समझ और साथ के एहसास से जुड़ा फैसला होता है।

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