अयोध्या के महल में रात गहरी थी।
राजा दशरथ अपने पलंग पर लेटे थे — आँखें खुली, पर कुछ नहीं देखतीं। पिछले कई वर्षों से उनकी आँखों में रोशनी कम होती गई थी, और अब बस इतना दिखता था कि दीये का पीला धब्बा कहाँ है। बाकी सब अंधेरा।
पर उन्हें पता था — आज रात आख़िरी है।
ये बात किसी ने कही नहीं थी। वैद्य भी नहीं। पर शरीर जब जाने को होता है, तो वो ख़ुद बताता है। साँस छोटी, छाती हल्की, और हाथ-पैरों में एक अजीब ठंड जो रजाई से नहीं जाती।
रानी कौशल्या कमरे के कोने में बैठी थीं। उन्होंने कुछ देर पहले पूछा था, “महाराज, कुछ चाहिए?”
दशरथ ने सर हिलाया था। नहीं।
जो चाहिए था, वो अब इस संसार में किसी के पास नहीं था।
पचास साल हो गए थे उस रात को।
दशरथ तब जवान थे। शिकार पर निकले थे — अकेले, क्योंकि उन्हें भीड़ पसंद नहीं थी जब वो जंगल में हों। उन्हें अपनी एक कला पर बहुत गर्व था: शब्दभेदी बाण। आवाज़ सुनकर तीर चलाना। बिना देखे, सिर्फ़ कान से निशाना लगाना।
रात गहरी थी। सरयू का किनारा।
कहीं पानी में कुछ गिरने की आवाज़ आई — गुड़ुक… गुड़ुक… गुड़ुक। जैसे कोई हिरण पानी पी रहा हो। या हाथी सूंड डुबो रहा हो।
दशरथ ने तीर निकाला। प्रत्यंचा खींची। आवाज़ की दिशा में छोड़ दिया।
सीधा।
फिर — आवाज़ बदल गई।
पानी की आवाज़ नहीं रही। एक मनुष्य की चीख़ निकली। छोटी, धीमी, फटी हुई। जैसे किसी ने अंदर ही दबा ली हो।
दशरथ का दिल एक पल को रुक गया।
वो भागे। पैर काँपते हुए। तीर चलाने वाले हाथ अब बेजान।
किनारे पर एक लड़का गिरा था — शायद सोलह-सत्रह का। एक हाथ में मिट्टी का घड़ा, आधा भरा हुआ। तीर उसके सीने में था।
दशरथ नीचे झुके। लड़के की आँखें खुली थीं — पर डर से नहीं। थकान से।
“कौन है?” लड़के ने पूछा, बहुत धीरे।
“मैं… मैं राजा दशरथ हूँ।”
लड़का चुप रहा। फिर बोला, “मेरा नाम श्रवण है। मेरे माँ-बाप वहाँ हैं, उस पेड़ के नीचे। दोनों अंधे हैं। प्यासे हैं। ये पानी उनके लिए था।”
दशरथ कुछ नहीं बोल पाए।
“राजन…” श्रवण की साँस उखड़ रही थी। “तीर मत निकालिए। निकालेंगे तो जान जल्दी जाएगी। पहले ये पानी ले जाइए उनके पास। उन्हें बताइए कि मैं — मैं देर से आ रहा हूँ। तीर निकालकर मेरे शरीर को मत छोड़िएगा। उन्हें मत बताइएगा कि उनका बेटा… कि मैं…”
उसकी आवाज़ बीच में टूट गई।
“वो बूढ़े हैं, राजन। प्यासे हैं। पहले उन्हें पानी।”
दशरथ ने वो घड़ा उठाया।
उनके हाथ इतने काँप रहे थे कि पानी छलक रहा था। पर वो चले — उस पेड़ के नीचे, जहाँ दो अंधे बूढ़े बैठे थे। औरत कुछ गुनगुना रही थी। आदमी कान लगाए हुए था — बेटे के लौटने की आवाज़ सुनने के लिए।
“श्रवण?” बूढ़े आदमी ने पूछा जब पैरों की आहट सुनी।
दशरथ चुप।
“बेटा, इतनी देर क्यों? पानी ले आया?”
दशरथ कुछ नहीं बोल पाए। बस घड़ा बूढ़े आदमी के हाथों में रख दिया।
बूढ़े ने हाथ छुआ — और रुक गए।
“ये… ये हाथ श्रवण का नहीं है।”
उन्होंने सब कुछ बताया।
बूढ़ी औरत पहले तो हँसी — जैसे कोई बेहूदा मज़ाक हो। फिर रोई नहीं। बस बैठी रही। फिर एक आवाज़ निकाली जो दशरथ ने आज तक नहीं सुनी थी, और आज तक भूले नहीं — एक माँ की आवाज़ जब उसके अंदर का सब कुछ एक साथ टूटता है।
बूढ़े पिता ने श्राप दिया।
“राजन, तू भी इसी तरह मरेगा। पुत्र-वियोग में। बेटे को देखे बिना। बेटे को पुकारते हुए। जैसे आज हम तड़प रहे हैं — वैसे ही तू तड़पेगा।”
और फिर दोनों ने अपने प्राण त्याग दिए। श्रवण के पास ही। तीनों एक साथ चिता पर गए।
दशरथ अकेले अयोध्या लौटे। अकेले — पर अकेले नहीं। उनके पीछे एक श्राप था जो साथ-साथ चलता था।
पचास साल।
बीच में बहुत कुछ हुआ। रानियाँ आईं। राज्य बड़ा हुआ। लोग कहते थे, “राजा दशरथ बहुत भाग्यशाली हैं।” दशरथ हँस देते थे। उन्हें पता था — एक चीज़ अभी बाकी है। श्राप पूरा होना बाकी है।
और श्राप पूरा होने के लिए — पहले एक पुत्र चाहिए था।
जो अब तक उन्हें मिला नहीं था।
ये बात किसी को समझ नहीं आती थी। महल में दबी आवाज़ों में बात होती कि राजा निःसंतान क्यों हैं। दशरथ चुप रहते। उन्हें कभी-कभी लगता — शायद ईश्वर उन्हें श्राप से बचा रहे हैं। पुत्र नहीं होगा, तो पुत्र-वियोग भी नहीं होगा।
पर रात को वो श्रवण को सपने में देखते।
वो लड़का घड़ा लिए खड़ा रहता। कुछ नहीं कहता। बस देखता रहता।
आज दशरथ अंधे थे।
ये बात अजीब थी, और साथ ही ठीक भी। श्रवण के माँ-बाप अंधे थे। उनका बेटा उनकी आँखें था। दशरथ का बेटा — होगा। एक दिन होगा। और उस दिन वो भी अंधे होंगे — आँखों से नहीं तो दिल से। अपने बेटे के बिना।
ये सोचकर वो काँप उठे।
कौशल्या पास आईं। “महाराज, पानी पिएँगे?”
दशरथ ने धीरे से सर हिलाया।
कौशल्या ने मिट्टी का लोटा उठाया। पानी डालने लगीं।
गुड़ुक… गुड़ुक… गुड़ुक।
दशरथ की आँखों से आँसू बहने लगे। पचास साल बाद, पहली बार खुलकर। कौशल्या घबरा गईं — “क्या हुआ? क्या दर्द हो रहा है?”
दशरथ बोल नहीं पाए।
वो आवाज़।
वो उसी रात की आवाज़ थी।
वो आवाज़ जो उन्हें लगा था कि कोई जानवर है। वो आवाज़ जिसके लिए उन्होंने तीर छोड़ा था। वो आवाज़ जो असल में एक बेटा अपने माँ-बाप के लिए पानी भर रहा था।
पचास साल वो ये आवाज़ रोज़ सुनते थे — सपनों में। पर आज जब कौशल्या लोटे से पानी डाल रही थीं, और दशरथ की आँखें कुछ नहीं देख सकती थीं — उन्हें लगा कि वो फिर से उसी किनारे पर हैं। फिर से अंधेरा है। फिर से पानी की आवाज़ है। फिर से उनके हाथ में तीर है।
“कौशल्या।”
“जी, महाराज।”
“मुझे लगता है… मैंने अपनी ज़िंदगी में सबसे बड़ा पाप किया था। और उसकी सज़ा अभी तक पूरी नहीं हुई।”
कौशल्या कुछ नहीं बोलीं।
“एक श्राप है मुझ पर। पुत्र-वियोग का। पर बेटा अभी हुआ ही नहीं। तो श्राप पूरा कैसे होगा?”
उन्होंने हाथ बढ़ाया। कौशल्या का हाथ थामा।
“शायद… शायद ईश्वर ने मुझे इसीलिए बेटा नहीं दिया। कि मैं श्राप के बिना ही चला जाऊँ। कि मेरी मौत आसान हो।”
कौशल्या की आँखों में आँसू आ गए। पर वो जानती थीं — महाराज को अभी ये बात बताना ठीक नहीं कि उन्होंने पुत्रकामेष्ठि यज्ञ की तैयारी शुरू कर दी है। ऋषि वशिष्ठ कह चुके हैं — एक यज्ञ हो, तो शायद ईश्वर पुत्र दें।
वो चुप रहीं।
दशरथ ने धीरे से अपनी आँखें बंद कीं।
“बस एक बात का अफ़सोस है, कौशल्या।”
“क्या, महाराज?”
“उस लड़के का नाम श्रवण था। उसने मरते वक़्त मुझसे एक काम कहा था — कि उसके माँ-बाप को पानी पिलाऊँ। मैंने वो काम कर दिया। पर एक काम और था जो मैं कभी नहीं कर पाया।”
“क्या?”
“उसकी माँ ने मरने से पहले रोते हुए कहा था — ‘मेरा बेटा मुझे माँ कहकर बुलाता था। अब कौन बुलाएगा?'”
दशरथ की आवाज़ काँपी।
“मैंने उस दिन वादा किया था अपने आप से — अगर कभी मुझे बेटा हुआ, तो मैं उसे सिखाऊँगा कि वो अपनी माँ को रोज़ — रोज़ — माँ कहकर बुलाए। हर दिन। एक दिन भी न छूटे।”
वो रुके।
“पर बेटा हुआ ही नहीं, कौशल्या। और अब… अब शायद नहीं होगा।”
बाहर रात की हवा चली।
महल में कहीं दूर शंख बजा। ऋषि वशिष्ठ यज्ञ की तैयारी कर रहे थे। दशरथ को पता नहीं था। उन्हें लगता था कि वो आज मर जाएँगे — श्राप पूरा हुए बिना, बेटे को देखे बिना, बेटे को होते देखे बिना।
पर ईश्वर का चक्र अलग था।
यज्ञ होगा। पुत्र होगा। चार पुत्र होंगे। एक का नाम राम रखा जाएगा।
और एक दिन, बहुत साल बाद, वो राम वन जाएगा। और दशरथ पलंग पर लेटे-लेटे “राम… राम… राम…” पुकारते हुए मरेंगे।
बिल्कुल वैसे ही जैसे श्रवण के पिता ने कहा था।
बिल्कुल वैसे ही जैसे एक माँ ने रोते हुए कहा था — “अब मुझे माँ कौन कहेगा?”
पर ये सब बाद की बात है।
अभी, इस रात, दशरथ अंधे हैं। बूढ़े हैं। और एक तीर — जो उन्होंने पचास साल पहले अंधेरे में छोड़ा था — अभी भी हवा में है। अभी भी चल रहा है। अभी रुका नहीं है।
वो तीर कभी रुकेगा नहीं।
वो तीर ही उनकी ज़िंदगी है।