जंगल के उस कोने में कोई नहीं आता था जहाँ हरिया लकड़ी काटने जाता था। पेड़ वहाँ टेढ़े-मेढ़े थे, ज़मीन पथरीली थी, और रास्ता ऐसा था कि एक बार चूको तो काँटों में पैर फँस जाए।
पर हरिया को वही कोना पसंद था। वहाँ शोर नहीं था। बस हवा थी, और कभी-कभी किसी पंछी की आवाज़।
उस दिन भी वो वहीं था। कुल्हाड़ी हाथ में, कमर पर पुराना अंगोछा बँधा हुआ, और जेब में बस आधी रोटी।
घर पर मुन्नी इंतज़ार कर रही थी।
मुन्नी उसकी सात साल की बेटी थी। उसकी माँ दो साल पहले बीमारी में चली गई थी, और उसके बाद से घर में बस वो दोनों थे। हरिया जो कमाता था, वो बस इतना होता था कि एक वक़्त की दाल-चावल बन जाए। मुन्नी कभी शिकायत नहीं करती थी। बस रात को सोने से पहले पूछती थी — “बाबा, कल पेट भरकर खाना मिलेगा?”
हरिया कहता — “हाँ बेटा।”
पर अंदर से वो जानता था कि वो कितनी बार झूठ बोल चुका है।
उस दिन कुल्हाड़ी चलाते-चलाते वो थक गया था। पसीना आँखों में जा रहा था। उसने एक पेड़ के नीचे बैठकर पानी पीने का सोचा।
जिस पेड़ के नीचे वो बैठा, वो अजीब था।
बहुत छोटा नहीं था, पर बहुत बड़ा भी नहीं। पत्ते हल्के सुनहरे थे — हरे नहीं, सुनहरे। तना ऐसा था जैसे किसी ने उसे चिकना करके पॉलिश किया हो। और जब हवा चलती, तो पत्तियाँ ऐसी आवाज़ निकालतीं जैसे कोई बहुत धीरे से कुछ कह रहा हो।
हरिया ने आँखें बंद कीं। बुदबुदाया —
“काश आज एक रोटी और होती। मुन्नी का पेट भर जाता।”
उसने ये यूँ ही कहा था। जैसे थका हुआ आदमी हवा से बात करता है।
पर तभी —
उसकी जेब में कुछ हिला।
उसने हाथ डाला। एक गरम, ताज़ी रोटी। घी की महक। उसके अपने हाथ की उँगलियाँ काँपने लगीं।
उसने ऊपर देखा।
पेड़ अब थोड़ा छोटा था। बस इतना सा छोटा कि अगर कोई ध्यान से न देखे, तो पता भी न चले। पर हरिया को पता चल गया।
वो काफ़ी देर तक बैठा रहा। रोटी हाथ में थी। पेड़ चुप था।
फिर उसने धीरे से पूछा — “तू… तू सच में?”
पेड़ ने जवाब नहीं दिया। पर हवा एक बार और चली, और पत्तियाँ फिर वैसी ही धीमी आवाज़ में हिलीं।
हरिया रोटी जेब में रखकर घर लौटा।
मुन्नी ने रोटी देखी तो उसकी आँखें बड़ी हो गईं। “बाबा, ये कहाँ से?”
“किसी ने दी।”
“कौन देगा हमें?”
हरिया हँसा। “आज एक अच्छे इंसान से मुलाक़ात हुई।”
रात को मुन्नी सो गई। हरिया छत पर लेट गया। तारे देखता रहा।
वो सोच रहा था — अगर वो पेड़ सच में…
अगले दिन वो फिर उसी जगह गया।
पेड़ वहीं था। थोड़ा छोटा। पर वहीं।
हरिया उसके सामने बैठा।
बहुत देर तक कुछ नहीं माँगा।
फिर धीरे से बोला — “मुन्नी के पास एक भी ढंग की फ़्रॉक नहीं है। उसकी सहेलियाँ हँसती हैं उस पर। काश एक नई फ़्रॉक होती।”
जेब में कुछ नहीं हिला।
पर जब वो शाम को घर पहुँचा, तो दरवाज़े पर एक पोटली रखी थी। उसमें एक पीली फ़्रॉक थी — फूलों वाली। बिल्कुल नई।
मुन्नी ने पहनी तो ऐसी खुश हुई कि उसने हरिया को इतनी ज़ोर से गले लगाया कि हरिया की कमर दुख गई।
उस रात भी हरिया छत पर था।
उसने सोचा — पेड़ कितना छोटा हुआ होगा अब?
तीसरे दिन वो फिर गया।
पेड़ अब साफ़-साफ़ छोटा था। उसकी कमर तक आता था।
हरिया उसके सामने बैठा। थोड़ी देर पेड़ को छुआ। तना अब भी चिकना था, पर ठंडा।
“मुझे माफ़ करना,” उसने कहा। “मैं तुझे ख़त्म नहीं करना चाहता। पर…”
उसने रुककर साँस ली।
“मेरी झोंपड़ी की छत बारिश में टपकती है। पिछले साल मुन्नी को बुख़ार हो गया था। काश एक पक्की छत होती।”
पेड़ चुप।
पर शाम को जब वो लौटा, तो उसकी झोंपड़ी की छत पर सूखी, मज़बूत टीन की चादरें लगी थीं। किसने लगाईं, वो नहीं जानता था।
मुन्नी ने पूछा — “बाबा, छत कैसे ठीक हो गई?”
हरिया का गला भर आया। उसने कुछ नहीं कहा।
चौथे दिन वो गया तो पेड़ अब उसके घुटनों तक था।
हरिया उसके सामने बैठ नहीं पाया। ज़मीन पर पाँव मोड़कर बैठा। पेड़ अब उसके चेहरे के सामने था — एक छोटा, सुनहरा, थका हुआ पेड़।
हरिया ने बहुत देर तक उसे देखा।
“मैं तुझसे आज कुछ नहीं माँगूँगा,” उसने कहा। “बस तेरे पास बैठूँगा।”
वो बैठा रहा। दोपहर हो गई। फिर शाम।
पेड़ हिला नहीं।
लौटते वक़्त उसके मन में एक अजीब बात थी — आज पेड़ पहले से छोटा नहीं हुआ था।
घर पहुँचा तो मुन्नी रोटी सेंक रही थी। नई फ़्रॉक पहने, टपकती छत के नीचे नहीं, बल्कि सूखे घर में।
उसने हरिया को देखा और मुस्कुराई।
हरिया उसके पास बैठा। उसके बाल सहलाए।
“बाबा,” मुन्नी ने पूछा, “आप उदास क्यों हो आजकल?”
“उदास नहीं हूँ, बेटा।”
“फिर?”
हरिया ने कुछ नहीं कहा। बस उसका सिर अपनी गोद में रख लिया।
मुन्नी आँखें बंद किए लेटी रही। हरिया उसके बाल सहलाता रहा।
बाहर अंधेरा हो गया। कहीं दूर कुत्ता भौंका। फिर चुप हो गया।
हरिया को लगा कि उसकी छाती में कुछ है जो बहुत भारी है, पर बहुत गरम भी है। उसने सोचा कि ये क्या है। फिर उसे समझ आया।
ये मुन्नी थी। उसका हाथ उसके बाल में। उसकी साँस उसकी गोद में।
ये कोई पेड़ नहीं दे सकता था।
ये पहले से उसके पास था।
अगले दिन वो जंगल नहीं गया।
उसने पास के गाँव में जाकर एक छोटी सी चाय की दुकान वाले से पूछा — “काम मिलेगा क्या? लकड़ी काटने के अलावा कुछ?”
दुकान वाले ने उसे देखा। थोड़ी देर सोचा। फिर कहा — “हाँ, मुझे एक मदद करने वाला चाहिए। सुबह से शाम। दो वक़्त का खाना और थोड़े पैसे।”
हरिया ने हाँ कह दी।
बहुत साल बाद, जब मुन्नी बड़ी हुई, तो उसने एक बार पूछा — “बाबा, उन दिनों हमें वो रोटी, वो फ़्रॉक, वो छत… कहाँ से मिली थी?”
हरिया हँसा।
“एक दोस्त था,” उसने कहा। “जंगल में।”
“क्या वो अब भी है?”
“पता नहीं।” हरिया ने खिड़की के बाहर देखा। “मैं उसके पास वापस नहीं गया। उसने बहुत दिया मुझे। पर एक चीज़ ऐसी थी जो वो नहीं दे सकता था।”
“क्या?”
हरिया ने मुन्नी को देखा। उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मुन्नी ने पहले कभी नहीं देखा था।
“तू,” उसने कहा।
जंगल के उस कोने में आज भी एक छोटा सा सुनहरा ठूँठ है। बहुत छोटा। बस ज़मीन से थोड़ा सा बाहर।
कोई नहीं जानता वो वहाँ कब से है।
हवा चलती है तो उसके पास घास हिलती है — बहुत धीरे, जैसे कोई बहुत धीमे से कुछ कह रहा हो।