रानाघाट स्टेशन की वो सुबह बहुत ठंडी थी।
फरवरी 2020। प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर अभी रोशनी ठीक से नहीं फैली थी। चाय वाले की भट्टी से धुआँ उठ रहा था और शिआलदा जाने वाली पहली लोकल अभी आधे घंटे दूर थी। बेंच पर बैठी एक औरत अपने पुराने सूती शॉल को कसकर लपेट रही थी।
उसकी उम्र साठ के आस-पास थी। बाल खुले थे, थोड़े उलझे हुए। पैरों में रबर की चप्पल। हाथ में एक छोटा सा कपड़े का थैला जिसमें शायद कुछ टिफ़िन था, या कुछ नहीं भी हो सकता था।
कुछ महीने पहले, इसी औरत का चेहरा देश के हर मोबाइल फ़ोन में था।
रानू मंडल।
जुलाई 2019 में एक लड़के ने इसी स्टेशन पर उसका वीडियो बनाया था — लता मंगेशकर का “एक प्यार का नगमा है” गाते हुए। वीडियो वायरल हुआ। हिमेश रेशमिया ने बुलाया। मुंबई गई। तीन गाने रिकॉर्ड किए। टीवी पर आई। ट्रोल हुई। मीम बनी। फिर एक दिन सब चुप हो गया।
और अब, सात महीने बाद, वो वापस यहीं थी। उसी प्लेटफॉर्म पर। उसी बेंच पर।
लेकिन ये वो रानू नहीं थी जो जुलाई में यहाँ बैठती थी।
प्लेटफॉर्म पर एक आदमी अपना बैग लिए तेज़ी से चलता आया। चालीस के आस-पास का होगा। कलकत्ता की किसी कंपनी में काम करता था, हर सोमवार सुबह यही ट्रेन पकड़ता था। आज भी।
बेंच के पास से गुज़रते हुए उसके कदम धीमे हुए। फिर रुक गए।
उसने रानू को देखा। एक बार। दूसरी बार।
“आप…” उसके मुँह से निकला।
रानू ने ऊपर देखा। उसकी आँखों में पहचान का कोई संकेत नहीं था — न खुशी, न नाराज़गी। बस एक थकी हुई शांति।
“हाँ बेटा?”
आदमी हिचकिचाया। उसने अपना फ़ोन निकाला, फिर रख लिया। फिर निकाला।
“आप रानू दीदी हैं ना? वो जिनका गाना…”
रानू ने हल्का सा सिर हिलाया।
“बैठ जाओ बेटा। ट्रेन देर से आएगी।”
आदमी का नाम सुब्रतो था। वो बैठ गया, थोड़ी दूरी पर। उसे समझ नहीं आ रहा था क्या कहे।
कुछ देर दोनों चुप रहे। एक कुत्ता प्लेटफॉर्म के दूसरे छोर पर भौंका। चाय वाले ने अपना पहला कस्टमर बनाया।
“मैंने आपका वो गाना सुना था,” सुब्रतो ने आख़िर कहा। “हिमेश जी के साथ वाला। मेरी पत्नी को बहुत पसंद था।”
रानू मुस्कुराई। पहली बार उसके चेहरे पर कुछ हिला।
“तीन गाने रिकॉर्ड किए थे,” उसने कहा। आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी, बस तथ्य था। “एक चला। दो नहीं चले।”
“पर आप यहाँ क्यों…?” सुब्रतो ने पूछा, फिर रुक गया। शायद ये सवाल पूछना नहीं चाहिए था।
रानू ने थैले से एक छोटी सी डिब्बी निकाली। उसमें सुपारी थी। एक टुकड़ा मुँह में डाला।
“मेरा घर यहीं है बेटा। रानाघाट में। बेटी के साथ रहती हूँ। उसकी तबियत ठीक नहीं रहती।”
“पर मुंबई…”
“मुंबई अच्छी जगह है।” उसने धीरे से कहा। “बहुत साफ़। होटल के कमरे में एसी था। खाना अच्छा था। पर…”
वो रुकी।
“पर वो मेरी जगह नहीं थी।”
सुब्रतो को कुछ समझ आया, कुछ नहीं।
“मैंने पढ़ा था कि आपको बहुत trolling हुई थी। मेकअप वाली फ़ोटो…”
रानू ने हल्के से हाथ हिलाया, जैसे वो बात उड़ा रही हो।
“बेटा, मुझे पता ही नहीं था कि लोग क्या-क्या कह रहे थे। मेरे पास उस तरह का फ़ोन नहीं था। कोई बताता तो सुन लेती। फिर भूल जाती।”
“आपको गुस्सा नहीं आया?”
रानू ने पहली बार सीधे सुब्रतो की आँखों में देखा।
“बेटा, मैं यहाँ बैठकर गाती थी। पच्चीस साल। तीस साल। कोई पैसा देता था, कोई नहीं देता था। कोई सुनता था, कोई नहीं सुनता था। मुझे फ़र्क नहीं पड़ता था। मैं गाती थी क्योंकि और कुछ नहीं था। और…” उसने एक पल रुककर कहा, “…क्योंकि गाना अच्छा लगता था।”
सुब्रतो चुप रहा।
“फिर वो लड़का आया वीडियो बनाने वाला। मैं उसे जानती भी नहीं थी। उसने पूछा भी नहीं। बस बना लिया। फिर अचानक…”
उसने हाथों से कुछ ऐसा दिखाया जैसे आसमान फट गया हो।
“…अचानक सब आ गए। टीवी वाले। फ़ोटो वाले। हिमेश जी के लोग। मुझे समझ नहीं आया क्या हो रहा है। मैंने सोचा — अब मेरी ज़िंदगी बदल जाएगी। बेटी का इलाज होगा। घर ठीक होगा।”
ट्रेन का अनाउंसमेंट हुआ। शिआलदा लोकल आधे घंटे और देर से आएगी। प्लेटफॉर्म पर लोग बढ़ने लगे थे।
“फिर?” सुब्रतो ने पूछा।
“फिर एक साल हो गया।”
रानू ने अपना थैला गोद में रखा।
“मुंबई से जब वापस आई तो लगा कुछ बदल गया है। पर बेटा, सच बताऊँ? कुछ नहीं बदला था। मेरा वो वाला घर वैसा ही था। बेटी की दवाई का खर्च वैसा ही था। बस मैं अंदर से थक गई थी।”
उसने प्लेटफॉर्म की तरफ़ देखा।
“और एक दिन मैं फिर यहाँ आ गई। बैठ गई। और जब बैठी तो…” उसकी आवाज़ धीमी हो गई, “…तो मुझे लगा, मैं घर आ गई।”
सुब्रतो को कुछ अजीब लगा। ये बात उसने सोची नहीं थी।
“दीदी, पर ये तो स्टेशन है। ये आपका घर कैसे होगा?”
रानू हँसी। एक छोटी सी, असली हँसी।
“बेटा, घर वो नहीं होता जहाँ छत होती है। घर वो होता है जहाँ तुम तुम होते हो।”
वो थोड़ी देर चुप रही। फिर बोली —
“मुंबई में मैं रानू मंडल नहीं थी। मैं ‘वायरल वाली आंटी’ थी। ‘विदुषी जी की कॉपी’ थी। ‘मेकअप वाली बूढ़ी औरत’ थी। सबने मुझे कुछ बना दिया था। मेरे पास कोई जवाब नहीं था।”
“और यहाँ?”
“यहाँ मैं वो हूँ जो गाती है। बस।”
सुब्रतो ने अपना फ़ोन निकाला। शायद फ़ोटो लेना चाहता था, या वीडियो। उसके हाथ रुक गए।
“दीदी, मैं… क्या मैं आपको रिकॉर्ड कर सकता हूँ? बस गाते हुए? कोई वीडियो नहीं डालूँगा। बस अपने पास रखूँगा।”
रानू ने उसे देखा।
“तुम क्यों रिकॉर्ड करोगे?”
“क्योंकि…” सुब्रतो रुका। उसे ख़ुद नहीं पता था क्यों। “क्योंकि अच्छा लगेगा।”
रानू मुस्कुराई। उसने अपना शॉल थोड़ा सीधा किया।
“बेटा, फ़ोन रख दो। बैठकर सुनो।”
और फिर रानू मंडल ने गाना शुरू किया।
“एक प्यार का नगमा है…”
वही गाना। वही आवाज़।
पर अब उसके पीछे कोई कैमरा नहीं था। कोई वायरल होने का इंतज़ार नहीं था। कोई हिमेश रेशमिया फ़ोन नहीं करने वाले थे।
बस एक प्लेटफॉर्म था। एक ठंडी सुबह थी। एक थका हुआ आदमी था जो ध्यान से सुन रहा था। और एक औरत थी जो आख़िरकार वो थी जो वो हमेशा से थी।
सुब्रतो की आँखें भर आईं। उसे ख़ुद हैरानी हुई।
गाना ख़त्म हुआ। प्लेटफॉर्म पर दो-तीन और लोग रुक गए थे, बिना आवाज़ किए सुन रहे थे।
रानू ने एक लंबी साँस ली।
“बस इतना ही,” उसने धीरे से कहा।
शिआलदा लोकल आख़िर आ ही गई।
सुब्रतो उठा। उसने अपनी जेब से कुछ नोट निकाले।
रानू ने मना किया।
“नहीं बेटा। आज नहीं। आज तुमने सुना। ये काफ़ी है।”
सुब्रतो ने नोट वापस रख लिए। उसे ख़ुद नहीं पता था क्यों, पर उसने हाथ जोड़े।
“दीदी, फिर मिलेंगे।”
रानू ने सिर हिलाया।
ट्रेन के दरवाज़े पर खड़े होकर सुब्रतो ने पीछे देखा। रानू वहीं बैठी थी। बेंच पर। शॉल लपेटे। सुपारी चबाते हुए।
जैसे वो हमेशा से वहाँ थी। जैसे वो हमेशा वहीं रहेगी।
ट्रेन चल पड़ी।
प्लेटफॉर्म पीछे छूटने लगा। रानू की आकृति छोटी होती गई।
सुब्रतो को एक बात समझ आई जो उसे शायद ज़िंदगी भर याद रहेगी।
रानू मंडल ने अपनी प्रसिद्धि खोई थी। पर उसने जो वापस पाया था, वो उससे कहीं बड़ा था।
उसने ख़ुद को वापस पाया था।
वो आदमी जो अपने काम से प्यार करता हो, उसके लिए मंच की ज़रूरत नहीं होती। तालियों की ज़रूरत नहीं होती। कैमरे की ज़रूरत नहीं होती।
बस एक बेंच चाहिए। एक सुबह चाहिए। और एक गाना जो दिल से निकले।
रानाघाट स्टेशन पर अगले दिन भी रानू मंडल आई होगी। उसके अगले दिन भी। उसके अगले दिन भी।
कोई वीडियो नहीं बनेगा। कोई ट्वीट नहीं होगा। कोई हिमेश रेशमिया फ़ोन नहीं करेगा।
पर वो गाएगी।
क्योंकि गाना उसका था।
और किसी ने भी उससे वो नहीं छीना।