लाहौर के मोची दरवाज़े पर उस शाम हवा में लाठियों की गंध थी।
तिरेसठ साल का एक आदमी मंच पर खड़ा था। उसकी छाती पर लाठियों के निशान थे, सीने की हड्डियों में दर्द की एक धीमी, गहरी लहर चल रही थी, और उसके बाएँ कंधे से नीचे तक एक ऐसा भारीपन उतर रहा था जिसे शब्दों में बताना मुश्किल था।
डॉक्टरों ने उसी दोपहर कहा था — “घर जाइए लाला जी। आराम कीजिए।”
लाला लाजपत राय ने सुना। फिर बोले — “आराम? आज?”
और शाम को वो मोची दरवाज़े पर खड़े थे।
भीड़ ख़ामोश थी। हज़ारों लोग। काले झंडे अब भी हाथों में थे, पर उन्हें लहराने की हिम्मत किसी में नहीं बची थी। सब उस बूढ़े आदमी को देख रहे थे जिसकी पगड़ी अब भी सिर पर थी, पर जिसका चेहरा सुबह से बीस साल बूढ़ा हो चुका था।
उन्होंने आवाज़ ऊँची की। आवाज़ टूटी नहीं।
“मैं घोषणा करता हूँ — आज मुझ पर पड़ी हर लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में आख़िरी कील साबित होगी।”
भीड़ ने सुना। भीड़ रोई।
लाला जी मंच से उतरे। उन्हें सहारा देने वाले हाथ बहुत थे, पर वो किसी पर ज़्यादा नहीं झुके। चले। एक-एक क़दम चले। जैसे पंजाब का शेर अपनी आख़िरी गुफ़ा की तरफ़ लौट रहा हो।
31 अक्टूबर — पहला दिन
रात भर बुख़ार रहा। सुबह डॉ. गोपीचंद भार्गव ने नब्ज़ देखी और चेहरा थोड़ा सख़्त किया।
“लाला जी, छाती की चोट सतही नहीं है। अंदर कुछ हुआ है।”
“कितना अंदर?”
“कह नहीं सकते। एक्स-रे करना पड़ेगा। पर आप लेटे रहिए।”
लाला जी ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने आँखें बंद कीं, और जब डॉक्टर कमरे से निकल गए, तो उन्होंने अपने सहायक फ़ीरोज़चंद से कहा — “क़लम लाओ। एक चिट्ठी लिखनी है मद्रास।”
फ़ीरोज़चंद ने कहा — “लाला जी, डॉक्टर ने—”
“मद्रास में कांग्रेस की कमेटी की बैठक है। मेरा संदेश जाना ज़रूरी है।”
चिट्ठी लिखी गई। लाला जी ने ख़ुद बोल कर लिखवाई। हर वाक्य ठहर-ठहर कर। हर साँस के बीच में एक खांसी।
2 नवंबर — चौथा दिन
लाहौर के घर के बाहर पूरे दिन लोग आते रहे। कुछ बूढ़े जिन्होंने उनके पिता राधा कृष्ण को पढ़ाते देखा था। कुछ नौजवान जिनकी आँखों में आग थी और जिन्हें लाला जी ने मना किया था — “ख़ून मत बहाओ। ये हमारी लड़ाई का तरीक़ा नहीं है।”
उस दिन एक नौजवान आया था। पतला, गोरा, मूँछें अभी पूरी नहीं आई थीं। लाला जी ने उसे देखा। मुस्कुराने की कोशिश की। दर्द के मारे मुस्कुरा नहीं पाए।
“भगत?”
भगत सिंह ने सिर झुकाया।
“क्रोध मत करो बेटा। क्रोध अंधा कर देता है।”
भगत सिंह कुछ नहीं बोले। बस लाला जी के हाथ को अपने माथे से छुआ। और चले गए।
बाद में इतिहास ने जो लिखा वो ये कि उस कमरे से निकलकर भगत सिंह ने एक और रास्ता चुना। पर उस दिन उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा था अपने साथियों से — “अब बात लाठी की नहीं रही।”
5 नवंबर — सातवाँ दिन
दिल्ली से तार आया। दिल्ली में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की एक बैठक होनी थी। मोतीलाल नेहरू ने ख़ुद लिखा था — “लाला जी, आप मत आइए। हम सब समझते हैं।”
लाला जी ने तार पढ़ा। पढ़ कर अलग रख दिया।
बीवी जी ने पूछा — “क्या लिखा है?”
“मना कर रहे हैं आने को।”
“तो?”
“तो जाना है।”
रात की गाड़ी से वो दिल्ली रवाना हो गए। डिब्बे में लेटे रहे पूरे रास्ते। एक बार बीच में उठ कर बैठे, और खिड़की से बाहर देखा। बाहर पंजाब की रात थी। खेत। दूर कहीं एक दीया जल रहा था।
उन्होंने धीरे से कहा — किसी को नहीं, अपने आप को —
“बस अभी थोड़ा और काम बाक़ी है।”
8 नवंबर — दसवाँ दिन
दिल्ली की बैठक में लाला जी आए। कुर्सी पर बैठे। उठकर भाषण नहीं दे पाए। बैठे-बैठे ही बोले।
पंडित मदनमोहन मालवीय बग़ल में बैठे थे। बीच-बीच में लाला जी की पीठ पर हाथ रखते थे — जैसे ये भरोसा दिला रहे हों कि वो हैं, साथ हैं, चिंता मत करो।
लाला जी ने उस बैठक में जो कहा वो लंबा नहीं था। पर एक बात बार-बार दोहराई —
“साइमन कमीशन को हम बहिष्कार करेंगे। पूरी तरह। बिना समझौते के। ये हमारी आज़ादी की सबसे साफ़ लड़ाई है।”
बैठक के बाद जब वो खड़े होने लगे, तो लड़खड़ा गए। दो लोगों ने सहारा दिया। मालवीय जी ने धीरे से कहा — “लाला जी, अब घर चलिए।”
लाला जी मुस्कुराए। बहुत हल्के से।
“घर ही जा रहा हूँ।”
12 नवंबर — चौदहवाँ दिन
लाहौर वापसी पर वो ख़ुद चलकर नहीं उतर सके। उन्हें उतारा गया। घर तक एक ताँगे में लाया गया।
डॉक्टरों ने अब साफ़-साफ़ कहा — दिल पर बहुत भार पड़ा है। चोट के बाद का सदमा अब दिल को घेर रहा है। आराम ही एकमात्र दवा है।
लाला जी ने पहली बार सिर हिला कर हाँ कहा।
उस शाम उन्होंने अपने पुराने मित्रों को बुलवाया। तीन-चार लोग आए। लाला जी पलंग पर थे। तकिए के सहारे थोड़ा उठकर बैठे। हाथ में एक किताब थी — अनहैप्पी इंडिया। उन्हीं की लिखी हुई। उसी साल छपी थी।
उन्होंने किताब अपने पास रखी और एक मित्र से कहा —
“इसमें जो लिखा है, वो सच है। पर जो नहीं लिखा गया, वो ज़्यादा सच है। हमारी पीढ़ी जो देख रही है — ये देश की दूसरी पीढ़ी नहीं देखेगी। उन्हें आज़ादी मिलेगी। मुझे यक़ीन है।”
मित्र ने पूछा — “कैसे यक़ीन है लाला जी?”
लाला जी ने आँखें बंद कीं। फिर खोलीं।
“क्योंकि अब ब्रिटिश सरकार भी अंदर से डर गई है। डरी हुई सरकार ज़्यादा देर नहीं टिकती।”
16 नवंबर — सोलहवाँ दिन
रात को सीने में तेज़ दर्द उठा। बीवी जी ने डॉक्टर बुलाया। डॉक्टर ने इंजेक्शन दिया। दर्द कम हुआ, पर पूरी तरह गया नहीं।
लाला जी ने रात भर ज़्यादा बात नहीं की। एक बार बस इतना कहा — “कल मद्रास से ख़त आने वाला है। पढ़ कर सुनाना।”
बीवी जी ने हाँ कहा।
ख़त कल आया भी। पर वो पढ़ कर नहीं सुना सकीं।
17 नवंबर 1928 — अठारहवाँ दिन
सुबह क़रीब चार बजे लाला लाजपत राय का दिल बंद हो गया।
NCERT की कक्षा आठवीं की इतिहास की किताब — हमारे अतीत — III — में इस घटना का ज़िक्र है: साइमन कमीशन के विरोध में लाहौर के प्रदर्शन में लाठी चार्ज से लगी चोटों के कारण लाला जी की मृत्यु हुई। डॉक्टरों का मानना था कि अगर वो लाठियाँ नहीं पड़ी होतीं, तो वो अभी कई साल और जीते।
ख़बर लाहौर में सूरज निकलने से पहले फैल गई।
वो रात
उस रात लाहौर में जो ख़ामोशी थी, उसके बारे में बाद में कई लोगों ने लिखा।
बाज़ार बंद थे। मस्जिदों और मंदिरों से कोई आवाज़ नहीं। आरती नहीं। अज़ान नहीं। जैसे शहर ने ख़ुद अपनी आवाज़ रोक ली हो।
अनारकली बाज़ार से लेकर मोची दरवाज़े तक — जहाँ अठारह दिन पहले लाला जी ने वो आख़िरी भाषण दिया था — पूरे रास्ते पर दीये जल रहे थे। किसी ने कहा नहीं था जलाने को। लोग अपने-अपने घर के सामने रख रहे थे।
एक नौजवान — कोई नहीं जानता उसका नाम — मोची दरवाज़े के सामने उस जगह पर बैठ गया जहाँ लाला जी ने उस शाम भाषण दिया था। पूरी रात बैठा रहा। न रोया, न बोला। बस बैठा रहा।
सुबह जब लोग आए तो उसने सिर्फ़ इतना कहा — “वो कील तो ठुक गई थी उस शाम। अब बस ताबूत बाक़ी है।”
ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में आख़िरी कील ठुकने में उन्नीस साल और लगने थे। पर पहली कील जो ठुकी थी, वो लाहौर के मोची दरवाज़े पर उस शाम ठुकी थी — जब एक तिरेसठ साल का बूढ़ा आदमी, जिसकी पसलियाँ टूट चुकी थीं, मंच पर खड़ा हुआ था और जिसने एक वाक्य बोला था।
लाहौर की वो रात — 17 नवंबर 1928 की रात — सिर्फ़ एक आदमी के जाने की रात नहीं थी।
वो भारत के बूढ़े धैर्य के मरने और एक नई पीढ़ी के जागने के बीच की रात थी।
उस रात के बाद भारत वैसा कभी नहीं रहा जैसा उससे पहले था।