एक जुलाई की सुबह, जब सातवीं बी के बच्चे अपनी नई क्लास में घुस रहे थे, हरिप्रसाद शर्मा भोपाल के शिवाजी नगर में अपने घर की खिड़की से आकाश देख रहे थे।
उनका कोई काम नहीं था।
पहली बार — 38 साल में — सुबह के आठ बजे उनका कोई काम नहीं था।
पहला मौसम — जुलाई (राहत का)
पहले हफ्ते में उन्होंने वो सब किया जो कभी नहीं कर पाए थे।
छत पर बैठकर चाय पी। दोपहर में सो गए। पड़ोस के मेहता जी के साथ ताश खेले। पत्नी सुलोचना के साथ सब्ज़ी मंडी गए — पहली बार जीवन में उन्होंने खुद गोभी छाँटी।
“अच्छी है,” उन्होंने कहा।
“हमेशा ऐसी ही आती है,” सुलोचना ने कहा। “तुम आज पहली बार देख रहे हो।”
उन्हें अच्छा लगा। सच में।
पेंशन पहली तारीख को आ गई थी — छत्तीस हज़ार रुपए। कम नहीं थी। प्रोविडेंट फंड भी था। बेटा दिल्ली में था, बहू समझदार थी, पोती अभी दो साल की थी। सब ठीक था।
वो हर रात आठ बजे बिस्तर पर जाते और सुबह छह बजे उठते — 38 साल की आदत थी, जाती नहीं थी।
पर जुलाई में उठकर खिड़की देखते और मन में एक हल्का-सा भाव आता — आज कहीं नहीं जाना।
वो भाव उस महीने में सुकून जैसा था।
दूसरा मौसम — सितंबर (ऊब का)
सितंबर तक वो ताश से ऊब चुके थे।
मेहता जी के नाती आ गए थे — अब वो खाली नहीं थे। टीवी पर सास-बहू के सीरियल थे जो सुलोचना देखती थीं और शर्मा जी समझ नहीं पाते थे। एक दिन उन्होंने किसी यूट्यूब चैनल पर ब्रह्मांड के बारे में कोई वीडियो देखा — बीच में नींद आ गई।
वो रात में जल्दी उठ जाते।
बिस्तर पर लेटे रहते। छत देखते।
एक रात उन्होंने मन में गिना — कितने बच्चों को उन्होंने पढ़ाया था? सातवीं से दसवीं तक गणित। 38 साल। हर साल चार सेक्शन। औसत 40 बच्चे।
करीब छह हज़ार।
उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
छह हज़ार बच्चे थे जो कभी उनसे डरते थे, कभी उनसे प्यार करते थे, जिनके लिए वो रोज़ सुबह उठते थे। अब उनमें से कोई नहीं था।
अगले दिन उन्होंने सुलोचना से कहा, “मुझे कुछ करना चाहिए।”
सुलोचना ने कहा, “हाँ।”
“क्या करूँ?”
“सोचो।”
उन्होंने सोचा। कुछ नहीं सूझा।
तीसरा मौसम — दिसंबर (अदृश्य होने का)
दिसंबर में बेटा परिवार के साथ आया। घर में शोर हो गया। पोती दौड़ी-भागी। सुलोचना रसोई में थीं। बहू अपने फोन पर थी। बेटा पुराने दोस्तों से मिलने निकल गया।
शर्मा जी ड्राइंग रूम में बैठे थे।
कोई उनसे बात नहीं कर रहा था।
वो उठे, बाहर निकले, गली में घूमने लगे। पुराने विद्यालय के पास से गुज़रे। गेट पर एक नया दारबान था — उसने उन्हें रोका।
“किससे मिलना है?”
शर्मा जी ने कहा, “कोई नहीं। बस… मैं यहाँ पढ़ाता था।”
दारबान ने एक बार देखा और कहा, “ठीक है, आगे जाइए।”
वो अंदर नहीं गए।
वापस आ गए।
रात को जब सब सो गए तो उन्होंने एक पुराना एलबम निकाला। 1995 की एक फोटो थी — वो और उनकी क्लास, सालाना पुरस्कार समारोह। उन्होंने उसमें अपना चेहरा ढूँढा।
वो बीच में थे। बच्चों से घिरे हुए।
अभी वो किसी के बीच में नहीं थे।
उन्होंने एलबम बंद किया और बहुत देर तक बैठे रहे।
चौथा मौसम — मार्च (सीखने का)
फरवरी के आखिर में कुछ हुआ।
सुलोचना की भाँजी का विवाह था। वहाँ एक बुज़ुर्ग सज्जन थे — कोई सत्तर साल के — जो एक कोने में बैठे कागज़ पर कुछ लिख रहे थे। शर्मा जी ने पास जाकर देखा।
वो हिंदी में कुछ लिख रहे थे — पर लिखावट ऐसी थी जैसे किसी ने शब्दों को गढ़ा हो। हर अक्षर जैसे उसकी जगह पर बैठाया गया हो। पतली, गहरी, सधी हुई लकीरें।
“ये क्या है?” शर्मा जी ने पूछा।
“हिंदी कलिग्राफी,” उन्होंने कहा। “देवनागरी सुलेख। सीखोगे?”
शर्मा जी ने कहा, “मेरी उम्र में?”
उन्होंने मुस्कुराकर कहा, “मैंने 68 में शुरू किया था।”
मार्च में शर्मा जी ने एक कलम खरीदी। एक खास स्याही। एक मोटा कागज़।
पहले दिन उनका “अ” टेढ़ा निकला।
दूसरे दिन भी।
तीसरे दिन वो सुबह चार बजे उठे — बिना किसी कारण के, बस नींद खुल गई — और उन्होंने अँधेरे में बैठकर “अ” लिखा।
इस बार थोड़ा सीधा था।
अगले हफ्ते से वो रोज़ सुबह एक घंटा लिखते। पहले अक्षर। फिर मात्राएँ। फिर शब्द। धीरे-धीरे उनकी उंगलियाँ याद करने लगीं।
सुलोचना एक सुबह उठीं और देखा कि वो दीपक की रोशनी में झुके हुए कुछ लिख रहे हैं।
उन्होंने कुछ नहीं कहा। चाय बनाई। उनके पास रख दी।
शर्मा जी ने ऊपर देखा, मुस्कुराए, फिर झुक गए।
पाँचवाँ मौसम — जून (लौटने का)
मई के अंत में पड़ोस की श्रीमती पांडे का बेटा रोहन घर आया। दसवीं के बोर्ड में गणित में फेल हो गया था। उसकी माँ घबराई हुई थीं।
शर्मा जी ने रोहन को देखा — लड़का सिर झुकाए था।
“बैठ,” उन्होंने कहा।
रोहन बैठा।
“कहाँ अटकता है?”
“बीजगणित।”
“कौन-सा हिस्सा?”
“समीकरण।”
“ठीक है।”
उन्होंने कागज़ निकाला और लिखना शुरू किया।
एक घंटे बाद रोहन उठा। उसके चेहरे पर कुछ था — वो भाव जो शर्मा जी ने हज़ारों बार देखा था, जब किसी बच्चे को अचानक कोई चीज़ समझ आती है।
अगले हफ्ते रोहन फिर आया। उसके साथ दो और बच्चे थे।
जून के पहले हफ्ते में शर्मा जी की छत पर हर शाम पाँच बजे छह बच्चे बैठते थे। कोई फीस नहीं। कोई रजिस्टर नहीं। बस एक पुरानी ब्लैकबोर्ड-सी स्लेट जो उन्होंने कहीं से निकाली थी, और चाक।
एक शाम एक बच्ची ने पूछा, “सर, आप स्कूल में क्यों नहीं पढ़ाते?”
शर्मा जी ने कहा, “रिटायर हो गया।”
“मतलब?”
“मतलब अब वो नहीं करना था जो करता था।”
“तो अब?”
उन्होंने छत की दरार देखी, फिर बच्चों को देखा।
“अब यह करता हूँ।”
उस रात सुलोचना ने कहा, “आज खाना खाते वक्त तुम बोल रहे थे।”
“हाँ?”
“तुम बहुत दिनों से खाने पर चुप रहते थे।”
शर्मा जी को याद आया — जुलाई, अगस्त, सितंबर, अक्टूबर… एक लंबा खालीपन।
“मुझे पता नहीं चला कब बदला।”
सुलोचना ने थाली उठाई। जाते-जाते कहा, “मुझे पता था।”
शर्मा जी अकेले बैठे रहे।
बाहर से किसी बच्चे की हँसी आई — शायद रोहन था, गली में किसी से बात कर रहा था।
उन्होंने अपनी उंगलियाँ देखीं। कलम की स्याही के निशान थे। चाक की धूल भी थी — कहीं से आ गई थी, जाने कैसे।
38 साल में उनकी उंगलियाँ हमेशा ऐसी ही रहती थीं।
उन्हें अच्छा लगा।