बैग पर अब भी एक कार्टून मछली बनी थी, जिसका एक पंख धुलते-धुलते फीका पड़ गया था। मीरा कुछ देर उसे हाथ में पकड़े खड़ी रही। कल इसी बैग को लेकर उसे अस्पताल जाना था — अपनी पहली कीमोथेरेपी के लिए।
लखनऊ की उस गली में इस वक़्त सिर्फ़ एक कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आ रही थी। बाक़ी सब चुप था। पति राकेश दूसरे कमरे में सोने का नाटक कर रहे थे — मीरा को पता था कि वो सो नहीं रहे। पिछले बारह दिनों से इस घर में कोई ठीक से सोया नहीं था।
बारह दिन पहले डॉक्टर ने रिपोर्ट देखकर थोड़ी देर के लिए नज़रें टेबल पर टिका ली थीं। फिर बहुत धीरे से कहा था — “स्तन कैंसर है। पर घबराइए मत, स्टेज जल्दी पकड़ में आ गई है।”
मीरा को आज तक याद नहीं कि उस कमरे से वो कैसे बाहर निकली थी।
बैग में सबसे पहले उसने एक मोटा शॉल रखा।
बहन ने फ़ोन पर बताया था — उसकी एक सहेली कीमो करवा चुकी थी — कि वो जो कमरा होता है, बहुत ठंडा रहता है। “दीदी, गरम कपड़े ज़रूर रखना। और मोज़े। पैर बहुत ठंडे हो जाते हैं।”
मीरा ने ऊनी मोज़े की एक जोड़ी रखी। फिर सोचकर दूसरी भी रख दी।
एक पानी की बोतल। बहन ने कहा था मुँह का स्वाद बदल जाता है, कड़वा-सा, लोहे जैसा। इसलिए कुछ खट्टी-मीठी गोलियाँ भी — वही जो बेटी को पसंद थीं, इमली वाली। उसने डिब्बी से गिनकर छह निकालीं, फिर मुस्कुराई और पूरी डिब्बी ही रख दी।
एक छोटा तौलिया। हैंड सैनिटाइज़र। आधार कार्ड, अस्पताल की पर्ची, और वो मोटी फ़ाइल जिसमें अब उसकी ज़िंदगी रिपोर्टों की शक्ल में बंद थी।
फिर वो रुकी।
मोबाइल का चार्जर। हाँ। कुछ देखने को, सुनने को। पर मीरा को मालूम था कि वो कुछ नहीं देखेगी। वो बस वहाँ बैठी रहेगी और सुई को अपने अंदर उतरते देखती रहेगी।
सबसे आख़िर में उसने एक चीज़ रखी जो किसी सहेली ने नहीं बताई थी।
एक छोटी डायरी और एक पेन।
बैग ज़िप करने ही वाली थी कि दरवाज़े पर हल्की-सी आहट हुई।
“मम्मा?”
नौ साल की पीहू दरवाज़े पर खड़ी थी, आँखें मलते हुए, बाल बिखरे हुए। उसका पसंदीदा पीला फ़्रॉक, जिसमें वो सोती थी।
“तुम सोई नहीं अभी तक?” मीरा ने जल्दी से बैग एक तरफ़ सरका दिया, जैसे कोई चोरी छुपा रही हो।
“नींद नहीं आ रही।” पीहू अंदर आई और माँ के बिस्तर पर बैठ गई। थोड़ी देर पैर हिलाती रही। फिर बहुत धीरे से पूछा — “मम्मा, कल आप अस्पताल जा रही हो ना?”
मीरा का गला एक पल के लिए रुक गया।
“हाँ बेटा। डॉक्टर अंकल ने एक दवाई दी है। थोड़े दिन वो दवाई लेनी है।”
“वो दवाई से आपके बाल गिर जाएँगे?”
मीरा चौंकी। फिर समझ गई — बच्चे सुन लेते हैं। कोने में, फ़ोन पर, रसोई में फुसफुसाहटों में। उन्हें सब पता चल जाता है, बस वो पूछते देर से हैं।
उसने पीहू को अपने पास खींचा।
“शायद गिर जाएँ,” उसने कहा। झूठ नहीं बोला। “पर फिर वापस आ जाएँगे। पहले से अच्छे, घुँघराले।”
पीहू कुछ देर चुप रही।
“मम्मा, अगर आपके बाल गिर गए तो भी आप मेरी ही मम्मा रहोगी ना?”
और यहीं, इस एक सवाल पर, मीरा का सारा बाँध टूटने को आया। पिछले बारह दिन से जो आँसू उसने सबके सामने रोके थे — डॉक्टर के सामने, राकेश के सामने, अपनी माँ के फ़ोन के सामने — वो सब इस एक मासूम सवाल पर बाहर आने को मचल उठे।
पर वो रोई नहीं।
उसने पीहू का माथा चूमा और हँसते हुए कहा — “पगली। बाल बदलने से मम्मा थोड़ी बदल जाती है? देख, गंजी मम्मा और भी जल्दी पकड़ लेगी तुझे, बाल बीच में नहीं आएँगे।”
पीहू खिलखिला दी। उस हँसी में मीरा ने अपनी पूरी रात का इनाम पा लिया।
“अब सो जा। और सुन — कल सुबह मैं निकलूँगी तब तू स्कूल में होगी। मैंने तेरे लिए टिफ़िन में आलू के परांठे रखे हैं, तेरे फ़ेवरेट। और एक चिट्ठी भी रखी है बैग में। टिफ़िन के बाद पढ़ना, क्लास में नहीं।”
“क्या लिखा है उसमें?”
“पढ़ेगी तो पता चलेगा।”
पीहू को उसने उसके कमरे तक छोड़ा, रजाई ओढ़ाई, और जब तक उसकी साँसें गहरी नहीं हुईं, वहीं बैठी रही।
अपने कमरे में वापस आकर मीरा ने वो डायरी निकाली।
मेज़ पर बैठी। पेन खोला। बल्ब की पीली रोशनी में पन्ना सफ़ेद और बहुत बड़ा लग रहा था।
उसने लिखा —
“आज की रात मैं डरी हुई हूँ।”
फिर रुकी। इस वाक्य को देखती रही। ये पहली बार था जब उसने ये बात किसी से कही थी — काग़ज़ से ही सही। दिनभर वो सबके लिए मज़बूत बनी रही थी। राकेश के लिए, पीहू के लिए, अपनी बूढ़ी माँ के लिए जो हर घंटे फ़ोन करके रोती थी और जिसे उसी को संभालना पड़ता था।
बस इस डायरी के सामने उसे मज़बूत बनने की ज़रूरत नहीं थी।
उसने आगे लिखा —
“मुझे मौत से इतना डर नहीं लग रहा जितना इस बात से कि पीहू बड़ी होगी और मैं नहीं रहूँगी उसके पास। उसकी शादी, उसकी पहली नौकरी, उसका पहला दिल टूटना। ये सब कौन देखेगा उसके साथ।”
“राकेश अच्छे हैं पर वो चोटी नहीं बना पाते। पीहू के बाल बहुत उलझते हैं सुबह।”
ये लिखते-लिखते वो हँस पड़ी, और उसी हँसी के बीच पहली बार उसकी आँख से एक आँसू टपका, सीधा डायरी के पन्ने पर। स्याही थोड़ी फैल गई।
उसने आँसू को उँगली से पोंछा और लिखती रही —
“पर मैं हार नहीं मानूँगी। डॉक्टर ने कहा है जल्दी पकड़ में आ गया है। मैं ये दवाई लूँगी, चाहे जितनी तकलीफ़ हो। मैं पीहू की चोटी बनाने के लिए ज़िंदा रहूँगी।”
फिर वो रुकी, क्योंकि अगला वाक्य उसे आ नहीं रहा था।
बहुत कुछ कहना था और शब्द ख़त्म हो गए थे। कुछ डर इतने बड़े होते हैं कि उन्हें पूरी तरह लिखा नहीं जा सकता। मीरा ने डायरी वहीं अधूरी छोड़ दी, बीच वाक्य में, और पेन बंद कर दिया।
कुछ बातें अधूरी रहना ही उनका पूरा होना है।
सुबह छह बजे अलार्म बजने से पहले ही मीरा की आँख खुल गई।
उसने पीहू के लिए परांठे बनाए, टिफ़िन में रखे, और बैग की अंदर वाली जेब में वो चिट्ठी रखी जिसमें सिर्फ़ इतना लिखा था — “मेरी बहादुर बच्ची, मम्मा शाम को घर आ जाएगी। फ़्रिज में तेरे लिए रसमलाई है। आई लव यू। — मम्मा।”
राकेश गाड़ी निकाल चुके थे। मीरा ने वो नीला बैग कंधे पर टाँगा — कार्टून मछली वाला बैग — और एक बार पलटकर अपने घर को देखा।
रसोई की वो खिड़की जहाँ से सुबह की धूप आती थी। दीवार पर पीहू की बनाई हुई टेढ़ी-मेढ़ी ड्रॉइंग। चप्पलों की कतार दरवाज़े पर। सब वैसा ही था। सब अपनी जगह।
मीरा ने गहरी साँस ली।
अस्पताल का गेट सुबह की रोशनी में सफ़ेद और बड़ा दिख रहा था। बाहर ऑटो रुके थे, चाय की एक दुकान खुल रही थी, एक बुज़ुर्ग आदमी अपनी पत्नी का हाथ थामे धीरे-धीरे अंदर जा रहा था।
मीरा एक पल गेट के बाहर रुकी।
फिर उसने बैग की पट्टी कंधे पर कसकर पकड़ी, ठीक वैसे ही जैसे पीहू पहली बार स्कूल जाते वक़्त अपने बैग की पट्टी पकड़ती थी, और अंदर की ओर क़दम बढ़ा दिया।
दरवाज़ा अपने-आप खुला।
वो अंदर चली गई।