रविवार की सुबह आशीष के सामने एक पत्र रखा गया था।
कागज़ पर कुछ नहीं लिखा था। बस एक लाइन: तुम्हारे पास एक दिन वापस जाने का मौक़ा है। कब?
वह पत्र किसी ने भेजा नहीं था — यह बस वहाँ मिला। आशीष पहले सोचा कि कोई मजाक है। पर जब उसने कागज़ को छुआ, तो उसके शरीर से एक गर्मी निकली। यह सच था। गहरे तरीक़े से सच।
नियम सरल थे। उसे सिर्फ़ एक दिन को चुनना था — कोई भी दिन, अपनी ज़िंदगी के किसी भी बिंदु से। वह उस दिन की सुबह जाग जाएगा। 24 घंटे तक वह सब कुछ फिर से कर सकता था। एक बार। बस एक बार।
और फिर? फिर उसकी नई यादें अपनी जगह ले लेंगी। पुरानी दुनिया मिट जाएगी।
उस हफ़्ते की तकलीफ़
आशीष दफ़्तर नहीं गया। सातों दिन घर में रहा, आईने के सामने बैठा, अपने जीवन को पलटता रहा।
पहले दिन: उसने 7 अप्रैल को सोचा। वह दिन जब उसकी शादी टूटी थी।
नेहा उसके सामने खड़ी थी, उसका सूटकेस भरा हुआ था। “तुम कभी यहाँ नहीं हो,” वह बोली थी। “शरीर से हो, दिमाग़ से नहीं।”
आशीष ने सोचा: अगर वह उस दिन को फिर से जी ले? शायद वह कुछ कह सकता है। शायद वह उसके हाथ पकड़ सकता है। शायद…
पर ठहरो। अगर वह 7 अप्रैल को ठीक कर देता, तो शायद नेहा कभी चली ही न जाती। फिर वह घर ही न छोड़ता। फिर उसे वह नौकरी न मिलती। फिर वह अपने माता-पिता के साथ वह सप्ताह न बिताता।
और उस सप्ताह ने उसे बदल दिया था।
दूसरे दिन: उसने 12 नवंबर को याद किया।
उसका बेटा अभिषेक का स्कूल की कार्यक्रम था। आशीष ऑफिस से निकल ही नहीं पाया। जब वह घर पहुँचा, तो अभिषेक पहले से सो चुका था। बिस्तर पर एक मेडल रखा था, जो वह दिखाना भूल गया।
आशीष ने महसूस किया: अगर वह वह दिन फिर से जी ले? उस मीटिंग को छोड़ दे? अपने बेटे को अपनी बाहों में पकड़े?
पर ठहरो — अगर वह 12 नवंबर को ऑफिस नहीं गया, तो वह प्रमोशन न मिलती जो अगले महीने आया। फिर वह घर का यह नया हिस्सा न खरीद पाता। फिर उसके माता-पिता को बेहतर डॉक्टर न मिलते।
तीसरे दिन: उसने 23 जनवरी को देखा।
वह दिन जब उसके पिता ने दिल का दौरा पड़ा था। आशीष अस्पताल में पहुँचा, पर वह बहुत देर हो चुकी थी।
अगर वह उस सुबह घर पर रहता? अगर वह उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाता?
पर… पर अगर उसका पिता न मरता, तो उसकी माँ को वह स्वतंत्रता न मिलती। वह अकेलेपन में घबराहट में रहती, जो अब उसे मजबूत बनाया है। वह अपनी ज़िंदगी खुद जीना न सीखती। और शायद आशीष भी न सीखता कि अपनी माँ को कैसे पूरी तरह से आत्मनिर्भर देखा जाए।
दर्द चोट करता है। पर चोटें भी ढलाई करती हैं।
आधी रात का फैसला
आशीष का हाथ कांपता था जब वह सातवें दिन पर पहुँचा।
उसके सामने एक दिन और भी था — वह दिन जिसे वह भूल ही गया था।
पाँच साल पहले का एक दिन। 8 मई।
वह दिन जब उसने स्कूल के एक शिक्षक को देखा था, जो एक लड़के को पीट रहे थे। लड़का रो रहा था।
आशीष खड़ा हो गया था। उसने शिक्षक को रोकने को कहा था। उसका गुस्सा, उसके शब्द — अक्सर कठोर थे।
शिक्षक निलंबित हुआ। उस लड़के को न्याय मिला।
पर उसी दिन, आशीष की एक गलत टिप्पणी उस शिक्षक के बारे में निकली। वह बात बढ़-चढ़ कर कहे गए। शिक्षक के परिवार को अपमान हुआ। उसकी बेटी को स्कूल बदलना पड़ा।
अगर आशीष उस दिन को मिटा दे? अगर वह उस कमरे में न जाए?
तो वह लड़का क्या होगा? उस शिक्षक के हाथ उसे और पीटते रहेंगे। वह कभी आत्मविश्वास न पाएगा। एक बच्चा, टूटा हुआ, अपने माता-पिता को भी टूटे हुए दिखाएगा।
आशीष ने कागज़ उठाया।
वह लिखा हुआ दिन
उसने कलम पकड़ी। पर कुछ नहीं लिखा।
बजाय इसके, उसने कागज़ को जला दिया।
आग की लपटें उड़ीं। राख बिखर गई। और आशीष बस बैठा रहा, चुप।
क्योंकि वह समझ गया था।
एक भी दिन नहीं था जिसे वह सच में मिटाना चाहता था। हर दिन, हर दर्द, हर ग़लती — वह सब उसके भीतर मिट्टी रखती थी। उसके माता-पिता की करुणा। उसके बेटे का गर्व। उसके पूर्व-पत्नी की ईमानदारी। यहाँ तक कि उस शिक्षक का दर्द भी — वह भी एक सीख थी।
अगर वह एक दिन को मिटाता, तो उसे खुद को मिटाना पड़ता।
सुबह हुई।
कागज़ मेज पर नहीं था। खिड़की से धूप आ रही थी। आशीष के हाथ में राख थी, जो अब हवा में उड़ गई।
वह उठ खड़ा हुआ। बहुत हल्का था। जैसे कुछ वजन उतर गया हो।
दफ़्तर के लिए तैयार हो गया। माता-पिता को फोन किया। अभिषेक को स्कूल ले गया। उस दिन कुछ खास नहीं था।
पर सब कुछ अलग था।
क्योंकि अब वह जानता था: सबसे बड़ी ताक़त किसी दिन को मिटाना नहीं है।
सबसे बड़ी ताक़त यह है कि हर दिन को ठीक से जीया जाए। हर दिन को। बिना किसी को मिटाने की कोशिश किए।
