यम ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा था।
लाखों वर्षों में, लाखों आत्माएँ उनकी रस्सी में बँधीं, और वो चल दिए — बिना रुके, बिना सुने, बिना पीछे झाँके। मृत्यु का यही नियम है। कोई पीछा नहीं कर सकता जहाँ यम जाते हैं।
फिर उस शाम साल के जंगल में, एक स्त्री का पदचाप उनकी रस्सी की सरसराहट से भी तेज़ सुनाई दी।
जंगल के रास्ते पर एक परछाई जो पीछे नहीं हटी
सत्यवान का शरीर अब मिट्टी था। यम ने उसकी आत्मा अपनी मुट्ठी के आकार में समेटी — एक जलते दीये जितनी छोटी, एक जीवन जितनी भारी — और दक्षिण की ओर चल दिए। पीछे सावित्री थी, जंगल की धूल में घुटनों तक धँसी, पर खड़ी।
यम को उसका खड़ा रहना अजीब नहीं लगा। लोग रोते हैं, चीखते हैं, गिर पड़ते हैं। ये सामान्य है। असामान्य ये था कि वो चल पड़ी।
तीन कदम। फिर दस। फिर सौ।
यम की गति मनुष्य की आँख नहीं पकड़ सकती — हवा भी उनसे पीछे रह जाती है। पर सावित्री उनके साथ-साथ चल रही थी, जैसे उसने अपने पैरों से समय का नियम ही बदल दिया हो।
“लौट जाओ,” यम ने कहा, बिना रुके। “जो मार्ग तुम्हारे लिए नहीं बना, उस पर मत चलो।”
“जहाँ मेरे पति जाएँगे,” सावित्री बोली, साँस भी न टूटी, “वहाँ पत्नी का धर्म भी जाएगा। ये मार्ग किसी और के लिए बना हो या न बना हो — आज ये मेरा भी है।”
यम ने पहली बार पीछे मुड़कर देखा
यहीं वो क्षण आया जो किसी शास्त्र में विस्तार से नहीं लिखा — यम रुके।
सिर्फ आधे पल के लिए। पर मृत्यु के लिए आधा पल भी एक युग है, क्योंकि यम कभी रुकते नहीं। वो पीछे मुड़े और पहली बार किसी मनुष्य की आँखों में झाँका, ये जानने के लिए नहीं कि वो कैसा दुख सहेगी — बल्कि ये समझने के लिए कि उसके भीतर डर क्यों नहीं है।
सावित्री की आँखों में आँसू थे, पर कोई कँपकँपी नहीं। जैसे उसने रोने और रुकने को अलग-अलग रख दिया हो।
“तुम जानती हो मैं कौन हूँ,” यम ने कहा।
“मैं जानती हूँ तुम न्यायी हो,” सावित्री ने जवाब दिया। “और न्यायी को सुनने से डर नहीं लगता।”
यम, जिन्होंने राजाओं की गुहार अनसुनी की थी, ऋषियों की तपस्या को नज़रअंदाज़ किया था, एक क्षण के लिए ठिठक गए — क्योंकि इस स्त्री ने भीख नहीं माँगी थी। उसने तर्क रखा था।
तीन वरदान, एक चाल
यम ने वही किया जो सदियों की परंपरा में देवता करते हैं जब कोई भक्ति उनके नियमों से बड़ी लगने लगे — उन्होंने एक वरदान की पेशकश की, सोचकर कि इससे वो लौट जाएगी।
“माँगो,” यम बोले। “सत्यवान के प्राण के अलावा, जो चाहो।”
सावित्री ने पहला वरदान माँगा — अपने अंधे सास-ससुर के लिए आँखों की रोशनी। यम ने दिया, और चल दिए। सावित्री भी चल दी।
दूसरा वरदान — अपने ससुर का खोया हुआ राज्य वापस। यम ने दिया। और सावित्री फिर उनके कदमों के साथ हो ली, जैसे कोई बात ही न हुई हो।
तीसरी बार यम ने रुककर पूछा, “और क्या चाहिए?”
सावित्री मुस्कुराई — इस पूरी यात्रा की पहली मुस्कान। “मुझे सौ पुत्र चाहिए, सत्यवान से।”
यम ने बिना सोचे “तथास्तु” कह दिया। और उसी शब्द में, बिना जाने, वो हार गए।
जब यम को हार माननी पड़ी
रस्सी यम के हाथ में हल्की पड़ने लगी। सत्यवान की आत्मा जैसे उनकी मुट्ठी से फिसलने लगी हो।
“तुमने अभी-अभी क्या कर दिया?” यम ने खुद से पूछा, पहली बार अपने ही वचन पर चौंकते हुए।
सावित्री ने कुछ नहीं कहा। उसे कहने की ज़रूरत नहीं थी। सौ पुत्र सत्यवान के बिना कैसे जन्मेंगे — ये सवाल यम ने खुद अपने वरदान में गूँथ दिया था।
एक देवता जिसने कभी कोई निर्णय वापस नहीं लिया, उस शाम पहली बार अपने ही न्याय के जाल में फँसा। और उन्होंने वो किया जो शायद यम के इतिहास में सिर्फ एक बार हुआ — वो हँसे।
“तुमने मुझसे भीख नहीं माँगी,” यम ने कहा, सत्यवान की आत्मा को उसके शरीर की ओर लौटाते हुए। “तुमने मुझे मेरे ही शब्दों से हरा दिया। ये हार, मृत्यु को भी स्वीकार करनी पड़ती है।”
सत्यवान की छाती में साँस लौटी। जंगल में सिर्फ हवा की आवाज़ रह गई, और दूर कहीं एक चिड़िया, जिसे नहीं पता था कि अभी-अभी मृत्यु यहाँ से हारकर लौटी है।
इस कथा से जुड़े सवाल
सावित्री और सत्यवान की कहानी का करवा चौथ से क्या संबंध है? करवा चौथ पर सावित्री की कथा इसलिए सुनाई जाती है क्योंकि इसे पति की लंबी आयु और दांपत्य निष्ठा की सबसे बड़ी मिसाल माना जाता है — एक पत्नी की भक्ति जो मृत्यु के नियम तक को झुका देती है।
सत्यवान की मृत्यु कैसे हुई थी? कथा के अनुसार सत्यवान को शाप मिला था कि विवाह के एक वर्ष बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी। नियत दिन जंगल में लकड़ी काटते समय उसकी मृत्यु हुई, और सावित्री, जो पहले से ये जानती थी, उस दिन उसके साथ ही गई थी।
