Fictional

भूतिया हवेली की कहानी

Rajhussain · 31-August-2026 5 मिनट में पढ़ें
भूतिया हवेली की कहानी

राजस्थान के खजूर के बागों के बीच एक हवेली थी। सौ साल पुरानी, खिड़कियाँ ईंट से बंद, दीवारें गहरे भूरे रंग की। लोग कहते थे कि रात को उसमें से चीखें आती हैं। महिलाओं की रुलाई, पुरुषों की कराहें, किसी चीज को पटकने की आवाज़।

दिलीप सिंह ने इस कहानी को पाँच साल पहले सुना था, और तब से उसे भूल नहीं पाया। पत्रकार था वह—अच्छा वाला नहीं, बस आजकल का। जो सच खोजता नहीं, जो सच बेचता है।

“मैं वहाँ एक रात रुकूँगा,” उसने अपने संपादक से कहा। “और सब कुछ खोल दूँगा। भारत की सबसे प्रसिद्ध हवेली सिर्फ एक झूठ है।”

संपादक ने मुस्कुराया। यह सब जानता था।

रात भर की खोज

दिलीप शाम छः बजे हवेली के दरवाज़े पर था। ताला जंग खाया हुआ, लकड़ी सड़ी हुई, हवा रुकी हुई।

अंदर घुसते ही सब कुछ ख़ामोश हो गया। सड़ी लकड़ी की बू, चूहों का मल, और कहीं दूर नीचे की ओर—पानी बहने की आवाज़?

“आओ, आवाज़ दो,” दिलीप ने फुसफुसाया।

कोई जवाब नहीं।

वह ऊपर की मंजिल पर गया। सीढ़ियाँ हर कदम पर चरमराईं। चाँद की रोशनी खिड़कियों के छिद्रों से घुस रही थी, और वह अपनी छाया को पीछा करता हुआ चलता रहा। कमरों में बिस्तर थे, सफ़ेद चादरें, मेज़ें, कुर्सियाँ—सब धूल से ढके, और सब यथावत, जैसे लोग अभी सोकर उठे हों।

तीसरी मंजिल पर वह रुका।

एक आवाज़ सुनाई दी। धीमी, कहीं गहराई से—कुछ गिरा, या किसी ने गिराया।

दिलीप की साँस तेज़ हुई। यह देख रहा था। यह हो रहा था।

“कौन है?” उसने आवाज़ दी।

कोई जवाब नहीं। लेकिन जो सन्नाटा आया, वह अलग था। वह निगरानी का सन्नाटा था।

जो आवाजें सुनाई दीं

रात के दो बजे, दिलीप सीढ़ियों के पास बैठा था, अपने फ़ोन की रोशनी बंद किए। उसने सिगरेट जलाई थी। गहरी साँस ली।

तभी, दूर की ओर से, एक आवाज़ आई।

“अरे… कौन है?”

ख़ासी, किसी औरत की। पर पहचानने वाली, जिज्ञासु। डर की नहीं।

दिलीप उठ गया।

“मैं एक पत्रकार हूँ,” उसने कहा। “बस… रात भर के लिए।”

कोई जवाब नहीं।

लेकिन अब दिलीप को सुनाई देने लगा। पैरों की आवाज़, और फिर—धीरे-धीरे, एक खिड़की का पर्दा हिलना। चेहरा नहीं दिख रहा, बस एक छोटी-सी परछाई, अँधेरे में चलती हुई।

“तुम्हारा नाम?” दिलीप ने पूछा।

“मेरा नाम मत पूछो,” आवाज़ आई। “बस चली जाओ।”

“नहीं। मैं ठहरूँगा।”

“तुम पागल हो।”

सच असली था

तीसरी मंजिल की छत पर दिलीप को मिला।

एक लड़की—पच्चीस की, शायद कम उम्र की। धूल भरे कपड़ों में, बाल उलझे हुए, पर आँखें साफ़, जागे हुए। हाथ में एक चाकू था।

“तुम हवेली में रहती हो,” दिलीप ने कहा।

“आठ महीने से।”

“तुम आवाज़ें निकालती हो? चीखें?”

लड़की मुस्कुराई। वह मुस्कुराहट दिलीप के शरीर से सारा खून निकाल गई।

“जब कोई आता है, तो हाँ। या फिर कुछ गिराती हूँ। जानवरों को मारती हूँ।” उसका गला सूखा था। “लोग डरते हैं। डर से वह चले जाते हैं। और मैं जीवित रहती हूँ।”

“तुम भाग गई हो?”

“नहीं। मुझे भगाया गया। और फिर मैं यहाँ आ गई क्योंकि यह एक जगह है जहाँ कोई नहीं आता। भूतों के डर से।”

दिलीप का दिल जोर से धड़कने लगा। यह कहानी थी। यह असली थी।

“तुम्हारे माता-पिता?” उसने पूछा।

लड़की ने चाकू को पलटा। “मेरे पिता ने मुझे जहर दिलाने की कोशिश की, क्योंकि मैंने एक गलत लड़के को पसंद कर लिया। मेरी माँ ने मुझे मार डालने के लिए कहा ताकि कुल की नामोरी न हो। मैं भाग गई।”

दिलीप सुन रहा था, और साथ-साथ, वह अपनी कहानी लिख रहा था। शीर्षक: भारत की सबसे डरावनी हवेली का सच। इंटरव्यू, विवरण, नाम—सब कुछ।

यह वायरल होगा।

“मुझे पता है कि तुम क्या सोच रहे हो,” लड़की ने कहा। “तुम मेरी कहानी बेचोगे।”

“वह… वह सच है,” दिलीप ने कहा।

“और फिर क्या होगा? मेरा परिवार सब कुछ जान जाएगा। मेरी बहन को भी बदनामी मिलेगी। मेरी माँ मुझे ढूँढ़ लेगी। या मुझे खत्म करने के लिए किसी को भेजेगी।”

“पर यह तो…?”

“यह असली है। असली भी होना चाहिए?” लड़की की आँखों में कुछ नहीं था—न गुस्सा, न आशा। बस, एक चुनाव की खोज। “तुम मेरी कहानी ले सकते हो। पर अगर तुम ले लोगे, तो मैं यहाँ नहीं रहूँगी। न भूत बनकर, न छिपकर। मैं यहाँ नहीं रहूँगी।”

जब अँधेरा इंसान में होता है

दिलीप के पास दो विकल्प थे। दोनों में से एक चुनना था।

वह छत पर बैठ गया। रात भर बैठा रहा। लड़की भी। कुछ नहीं कहते हुए।

जब सुबह की पहली रोशनी आई, तब दिलीप ने अपना फ़ोन निकाला। सारे नोट्स, सारे वीडियो, सब कुछ। और उसने सब कुछ डिलीट कर दिया।

“तुम्हारा नाम मैं अपने साथ ले जाऊँ?” उसने पूछा।

“हाँ,” लड़की ने कहा।

“बाकी सब भूल जाऊँ?”

“हाँ।”

दिलीप नीचे आया। और हवेली से निकल गया। सड़क पर एक फ़ोन कॉल की।

“संपादक जी,” उसने कहा। “यह हवेली… यह सिर्फ एक पुरानी जगह है। कुछ नहीं है। मैं अगली कहानी लिख दूँ?”

उसके बाद, अगली सुबह, एक अखबार में खबर आई: राजस्थान की भूतिया हवेली का सच: सिर्फ एक गाँव की कहानी। कुछ साक्षातकार, कुछ परिकल्पना, कुछ झूठ। दिलीप की कहानी ख़तम हो गई।

और हवेली में?

रात को, अगर कोई ध्यान से सुने, तो अब भी आवाज़ें हैं। लेकिन वह कोई और हैं।

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