सुबह छह बजे महेश की आँख खुली तो सबसे पहले उसके दाहिने हाथ ने काँपना शुरू किया।
ये कोई नई बात नहीं थी। बीस साल से सुबह यही हाथ काँपता आया था — जब तक पहला घूँट गले से नीचे न उतर जाए। इंदौर के इस घर में, इस कमरे में, इसी बिस्तर पर, हर सुबह यही होता था। काँपता हाथ, फिर अलमारी की तरफ बढ़ते कदम, फिर थोड़ी राहत।
पर आज महेश ने हाथ की तरफ देखा और कुछ अजीब सोचा।
उसने सोचा — आज नहीं।
कोई सपना नहीं आया था रात को। कोई फरिश्ता नहीं उतरा था। डॉक्टर ने कुछ नया नहीं कहा था। पत्नी ने रोकर समझाया नहीं था — वो तो दो साल पहले ही समझाना छोड़ चुकी थी। कुछ भी नहीं हुआ था। बस इतना कि आज सुबह, छह बजे, पैंतालीस साल के एक थके हुए आदमी ने अपने काँपते हाथ को देखा और मन ही मन कहा — सिर्फ आज। बाकी कल देखेंगे। आज पीना नहीं है।
सात बजे तक उसे लगा कि ये आसान है।
उसने चाय बनाई। चीनी ज़्यादा डाल दी, हाथ काँप रहा था इसलिए। बरामदे में बैठकर पी। सामने वाले घर में किसी ने रेडियो चलाया हुआ था, पुराना गाना। महेश ने आँखें बंद कीं और सोचा — देखो, बैठा तो हूँ। ज़िंदा हूँ। कोई पहाड़ नहीं टूटा।
आठ बजे उसका बेटा रोहन स्कूल के लिए निकला। सत्रह साल का। बैग कंधे पर। उसने पापा को बरामदे में बैठा देखा तो एक पल रुका।
रोज़ इस वक्त पापा या तो सो रहे होते थे, या आँखें लाल किए कमरे में बैठे होते थे। बरामदे में चाय के साथ — ये नया था।
“जा रहा हूँ,” रोहन ने कहा।
“हाँ बेटा। पढ़ाई ठीक से।”
रोहन एक सेकंड और रुका, जैसे कुछ और कहना चाहता हो। फिर गेट खोलकर निकल गया। महेश ने उसकी पीठ देखी और एक बात महसूस की जो बहुत दिनों से नहीं हुई थी — शर्म नहीं। आज उसे अपने बेटे के सामने शर्म नहीं आई।
ग्यारह बजे शरीर ने सवाल पूछना शुरू किया।
पहले पसीना आया, हालाँकि पंखा चल रहा था। फिर पेट में कुछ मरोड़ने लगा। हाथ का काँपना अब सिर्फ हाथ तक नहीं था — पूरे शरीर में एक हल्की सी थरथराहट थी, जैसे अंदर कोई बहुत डरा हुआ बैठा हो।
महेश दुकान नहीं गया आज। उसका कपड़े का छोटा-सा बिज़नेस था, सराफा बाज़ार के पास। मुनीम सँभाल लेगा, उसने सोचा। पर असली बात ये थी कि वो जानता था — दुकान का मतलब है दोपहर, और दोपहर का मतलब है वो ठेका जो दुकान से तीन गली छोड़कर है। बीस साल से वो रास्ता उसके पैर बिना सोचे चल लेते थे।
आज वो उस रास्ते से दूर रहना चाहता था। इसलिए घर पर रुका।
उसने फोन उठाया। स्क्रीन पर कुछ नाम थे जिन्हें वो दबाना चाहता था। रमेश — जिसके साथ शाम बीतती थी। फिर वो दूसरा नंबर, शराब वाला, जो घर तक पहुँचा देता था अगर बारिश हो या मन न हो निकलने का।
उसका अंगूठा रमेश के नाम पर रुका।
एक कॉल। सिर्फ एक कॉल और रमेश आधे घंटे में पहुँच जाता। फिर सब आसान हो जाता। ये कँपकँपी, ये पसीना, ये अंदर बैठा डरा हुआ आदमी — सब शांत हो जाता।
महेश ने फोन उल्टा करके मेज़ पर रख दिया। स्क्रीन नीचे। जैसे आँखें बंद कर लेने से कोई चीज़ गायब हो जाती हो।
उसने कॉल नहीं की।
एक बजे उसने खाना नहीं खाया, उल्टी जैसा लगा।
दो बजे वो लेट गया, पर नींद नहीं आई। छत के पंखे को घूमते देखता रहा। पंखा घूम रहा था, उसके अंदर कुछ और घूम रहा था।
बीस साल। उसने हिसाब लगाने की कोशिश की और छोड़ दी। बीस साल में कितनी सुबहें ऐसी ही काँपते हाथ से शुरू हुई होंगी। कितनी शामें धुँधली। बेटे का पहला कदम — उसे याद नहीं। याद होगा भी कैसे। रोहन की माँ कब घर छोड़कर मायके चली गई, ये भी ठीक से याद नहीं। बस इतना याद है कि एक दिन घर में दो लोग थे — वो और रोहन। और रोहन उससे बात कम करता था।
ये सब याद करना अच्छा नहीं लगा। पर आज पहली बार बीस साल में, ये यादें धुँधली नहीं थीं। साफ थीं। और साफ होना दर्द देता है।
तीन बजे सबसे मुश्किल वक्त आया।
शरीर अब चिल्ला रहा था। हाथ इतने काँप रहे थे कि उसने पानी का गिलास उठाया तो आधा गिर गया। माथे पर पसीना। दिल ज़ोर से धड़क रहा था, जैसे छाती से बाहर आ जाएगा। और दिमाग — दिमाग बहुत समझदार बातें कर रहा था।
एक पैग से क्या होगा। बस एक। शरीर को थोड़ी राहत मिल जाएगी। फिर कल से बंद। आज तो हालत खराब है, आज माफ है। कौन सी रोज़ की बात है। बस आज।
ये आवाज़ बहुत मीठी थी। बहुत समझदार। बीस साल से यही आवाज़ हर रोज़ जीतती आई थी।
महेश उठ खड़ा हुआ। पैर अलमारी की तरफ बढ़ने लगे, अपने आप, जैसे उन्हें रास्ता पता हो।
वो अलमारी के सामने खड़ा हो गया।
अलमारी खाली थी। कल रात उसने खुद खाली की थी। पर अलमारी का खाली होना मायने नहीं रखता था — ठेका तीन गली दूर था, और उसके पास पैसे थे, और उसके पैर रास्ता जानते थे।
वो वहीं खड़ा रहा। अलमारी के सामने। काँपता हुआ। बहुत देर तक।
और फिर उसने वो किया जो उसने पूरे दिन में सबसे मुश्किल काम किया — उसने कुछ नहीं किया। बस खड़ा रहा। काँपता रहा। दरवाज़े की तरफ नहीं गया। सिर्फ इतना। सिर्फ खड़े रहना।
घड़ी में तीन बजकर बीस मिनट। फिर तीस। फिर साढ़े तीन।
मीठी आवाज़ धीरे-धीरे थकने लगी।
चार बजे रोहन घर आया।
उसने गेट खोला, अंदर आया, और पापा को कमरे में अलमारी के सामने खड़ा देखा — पसीने से भीगा, काँपता हुआ, चेहरा सफेद।
रोहन की पहली सोच डर थी। पापा गिर तो नहीं जाएँगे। पापा की तबीयत — पर रोहन ने ये सब कभी समझा नहीं था। उसे नहीं पता था कि शरीर शराब छोड़ने पर ऐसे काँपता है। उसे लगा पापा बीमार हैं।
वो कुछ नहीं बोला। शायद इसलिए कि बीस साल में उसने पापा से बात करना ही छोड़ दिया था। शब्द उनके बीच बहुत पहले खत्म हो गए थे।
रोहन रसोई में गया। एक गिलास में पानी भरा। वापस आया। और बिना कुछ कहे, वो गिलास पापा की तरफ बढ़ा दिया।
महेश ने बेटे के हाथ की तरफ देखा। फिर बेटे के चेहरे की तरफ। सत्रह साल का लड़का, जिसकी आँखों में डर था, और सवाल था, और कुछ ऐसा भी था जिसका नाम महेश को पता नहीं था पर जो उसने बहुत सालों से नहीं देखा था।
उसने काँपते हाथ से गिलास लिया। पानी फिर थोड़ा छलका। उसने पिया।
“ठीक हो पापा?” रोहन ने पूछा। तीन शब्द। पूरे दिन का सबसे भारी सवाल।
महेश ने हाँ कहना चाहा। आवाज़ नहीं निकली। उसका गला भर आया। उसने सिर्फ सिर हिलाया।
रोहन वहीं ज़मीन पर बैठ गया, पापा के पास। बोला कुछ नहीं। बस बैठ गया।
और दोनों वहाँ रहे — एक काँपता हुआ बाप, एक चुप बेटा, बीच में एक खाली गिलास।
पाँच बजे कँपकँपी थोड़ी कम हुई।
छह बजे महेश थोड़ा खा पाया। रोहन ने मैगी बनाई थी, जली हुई, पर महेश को बीस साल में इतना स्वाद किसी चीज़ में नहीं आया था।
सात बजे वो दोनों बरामदे में बैठे थे। सामने वाले घर का रेडियो फिर बज रहा था।
“स्कूल में कैसा रहा?” महेश ने पूछा।
रोहन ने पापा की तरफ देखा, हैरानी से। पापा ने ये सवाल कब पूछा था आखिरी बार, उसे याद नहीं। शायद कभी नहीं।
“ठीक,” रोहन ने कहा। फिर थोड़ा रुककर, “मैथ का टेस्ट था।”
“कैसा गया?”
“पता नहीं। शायद ठीक।”
ये बात कुछ नहीं थी। मैथ का टेस्ट। शायद ठीक। पर बीस साल बाद बाप-बेटे के बीच ये पहली असली बातचीत थी, और दोनों को ये पता था, और किसी ने इसका ज़िक्र नहीं किया।
रात ग्यारह बजे महेश बिस्तर पर लेटा। नींद नहीं आ रही थी। शरीर अभी भी बेचैन था।
उसने आज को गिना। एक दिन। सिर्फ एक दिन। बीस साल के मुकाबले एक दिन कुछ भी नहीं था। बूँद भर भी नहीं।
पर उसने एक चीज़ सीखी थी आज। उसने सीखा था कि तीन बजे की वो मीठी आवाज़ — वो झूठ बोलती है। वो कहती है कि ये नामुमकिन है, और फिर एक दिन गुज़र जाता है और पता चलता है कि मुमकिन था। मुश्किल था, पर मुमकिन था।
कल फिर तीन बजेंगे। कल फिर वो आवाज़ आएगी। महेश को नहीं पता था कि कल वो जीतेगा या हारेगा।
पर ये उसने आज नहीं सोचा।
आज उसने बस इतना सोचा कि कल भी वो यही करेगा जो आज किया — सुबह उठकर अपने काँपते हाथ को देखेगा और कहेगा, सिर्फ आज। बाकी कल देखेंगे।
बगल के कमरे से रोहन के कमरे की रोशनी की एक लकीर दरवाज़े के नीचे से आ रही थी। लड़का अभी जाग रहा था। शायद पढ़ रहा था। शायद सोच रहा था कि आज पापा को क्या हुआ था।
महेश ने उस रोशनी की लकीर की तरफ देखा बहुत देर तक।
और फिर, बीस साल में पहली बार, वो बिना पिए सो गया।