अठारहवें दिन की शाम को, जब युद्ध समाप्त हो चुका था, गांधारी ने पहली बार अपनी आँखों की पट्टी खोली।
एकतीस वर्ष।
एकतीस वर्ष से उसकी आँखें इस पट्टी के पीछे बंद थीं। पट्टी जिसे उसने गांधार में अपने विवाह की रात, अपने हाथों से बाँधा था। रेशमी कपड़े की वो पट्टी — जो प्रेम थी, जो प्रतिज्ञा थी, जो उसने सोचा था कि पुण्य है।
रोशनी आँखों में चुभी। जैसे किसी ने लोहे की सुई चुभो दी हो।
और फिर उसने देखा।
कुरुक्षेत्र का वो मैदान जो अब कब्रिस्तान था।
दुर्योधन — उसका पहलौठा बेटा — जमीन पर पड़ा था। जाँघें टूटी हुईं। उसका वो चेहरा जो गांधारी ने कभी नहीं देखा था। जन्म के दिन से लेकर आज तक — कभी नहीं।
गांधारी को याद आया कि दुर्योधन के जन्म के दिन, जब उसकी दासी ने कहा था — “माँ, बेटा हुआ है” — तब उसने पट्टी के नीचे से उसकी कल्पना की थी। छोटे-छोटे हाथ। चाँदनी जैसा माथा। अपने पिता की आँखें — अंधी, हाँ, पर जिनमें एक अजीब गहराई थी।
पर उसने कभी देखा नहीं था।
एकतीस वर्ष का वो बेटा — जिसे जन्म के बाद गांधारी ने पहली बार आज देखा।
मरा हुआ।
वो धीरे-धीरे चली।
युद्धभूमि पर। एक-एक शव के पास।
दुःशासन — जिसकी हँसी पूरे महल में गूँजती थी, जिसकी हँसी गांधारी ने सुनी थी पर देखी नहीं थी। वो पड़ा था। उसका कवच छाती पर टूटा हुआ।
विकर्ण — जिसने द्रौपदी के चीरहरण का विरोध किया था। अकेला कौरव जिसने सभा में सच बोला था। गांधारी को उस दिन किसी ने बताया था — “माँ, विकर्ण ने कुछ अच्छा किया आज।” और गांधारी ने उस दिन सोचा था कि कभी उसका चेहरा देखेगी। कभी उसे अपनी आँखों से पहचानेगी।
कभी नहीं आया वो कभी।
गांधारी के पाँव रुक गए।
एक पल के लिए उसे वो शाम याद आई — जब वो गांधार में थी। पिता सुबल ने कहा था: “तुम्हारा विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार धृतराष्ट्र से होगा।”
उसे पता था। वो जानती थी कि धृतराष्ट्र अंधे हैं।
उस रात उसने सोचा था — अगर मेरा पति संसार नहीं देख सकता, तो मैं भी नहीं देखूँगी। ये विचार आया और उसे लगा था कि ये प्रेम है। ये समर्पण है। ये सबसे बड़ी पत्नीव्रता का काम होगा जो कोई कर सकती है।
उसने रेशम का टुकड़ा माँगा था। खुद बाँधा था। खुद।
पिता रो पड़े थे। उसकी सहेलियाँ रो पड़ी थीं।
पर गांधारी नहीं रोई थी। उसे लग रहा था कि वो कुछ बड़ा कर रही है।
हस्तिनापुर में भी वही भाव रहा।
सबने कहा — गांधारी की पतिव्रता अद्वितीय है।
धृतराष्ट्र ने एक बार कहा था — “गांधारी, तुम महान हो।”
और गांधारी के भीतर कुछ फूल गया था। जैसे अहंकार नहीं, पर कुछ उससे मिलता-जुलता।
वो अंधेरे में बैठी रहती थी। महसूस करती रहती थी। सुनती रहती थी।
उसे लगता था कि वो सब जानती है।
पर आज, इस मैदान पर —
गांधारी को समझ आया।
वो कुछ नहीं जानती थी।
अपने बेटों को नहीं जानती थी।
उसने दुर्योधन का क्रोध सुना था। उसकी आवाज में जो घमंड था — वो सुना था। पर उसके चेहरे पर जब वो रोता था — वो नहीं देखा था। बच्चे तो चेहरे से रोते हैं। आँसू सिर्फ आँखों से नहीं निकलते — वो होंठ काँपते हैं, भौंहें टेढ़ी होती हैं, नाक सुर्ख होती है। वो कभी नहीं देखा।
दुःशासन को बुखार हुआ था एक बार — बचपन में। बहुत तेज। सारी रात। गांधारी उसके पास बैठी रही थी, उसका हाथ थामे। पर उसने नहीं देखा था कि उसके माथे पर पसीना कैसा दिखता है, उसकी आँखें जब बंद होती हैं तो उसका चेहरा कितना छोटा लगता है।
माँ आँखों से माँ होती है।
और गांधारी के पास आँखें नहीं थीं।
तभी एक आवाज आई।
“गांधारी।”
कृष्ण।
वो पीछे खड़े थे। शाँत। उनका रथ दूर था। वो पैदल आए थे।
गांधारी का हाथ काँपा। उसके भीतर जो दर्द था — वो एक जगह इकट्ठा होने लगा। वो दर्द जो एकतीस वर्ष का था। वो दर्द जो सौ बेटों की माँ का था। वो दर्द जो एक ऐसी स्त्री का था जिसने अपनी आँखें बंद करके सोचा था कि वो पुण्य कर रही है।
“तुम रोक सकते थे।” गांधारी की आवाज थरथराई। “तुम्हारे पास शक्ति थी। तुमने नहीं रोका।”
कृष्ण चुप रहे।
“मैं तुम्हें शाप देती हूँ।”
और शाप के शब्द उसके मुँह से निकले — पर जैसे ही वो बोल रही थी, उसे लगा कि ये शब्द खोखले हैं। ये क्रोध असली है, ये दर्द असली है — पर कहीं गहरे में, एक और सच था जो गांधारी अभी तक खुद से छुपाती आई थी।
कृष्ण ने शाप स्वीकार किया। सिर झुकाया।
फिर उन्होंने कहा — “गांधारी, तुमने कभी उन्हें देखा ही नहीं था। उनके पाप भी नहीं, उनके पश्चाताप भी नहीं।”
गांधारी के पाँव तले जमीन खिसकी।
वो बात याद आई जो उसने खुद एक बार सोची थी — और फिर पट्टी के अंधेरे में दबा दी थी।
दुर्योधन एक बार — वो कोई बारह वर्ष का रहा होगा — महल के बाहर बगीचे में रो रहा था। एकांत में। किसी ने देखा नहीं था, पर एक दासी ने गांधारी को बताया था। “राजकुमार अकेले रो रहे हैं।”
गांधारी उठी थी। पर रुक गई थी।
क्योंकि वो जानती थी — अगर वो गई, तो दुर्योधन उसे देखेगा और वो उसे नहीं देख पाएगी। उस बच्चे के आँसू नहीं देख पाएगी। वो क्षण जो एक माँ के लिए होता है — वो नहीं होगा।
और उस शर्म से, उस असमर्थता से बचने के लिए — गांधारी नहीं गई थी।
दुर्योधन अकेला रोया था।
अब वो यहाँ पड़ा था।
और गांधारी की आँखों में आँसू आए — खुली आँखों में।
पहली बार खुली आँखों में।
जो आँसू एकतीस वर्ष पहले रोने चाहिए थे — पर पट्टी के पीछे छुपा दिए गए थे।
उसने सोचा था कि पट्टी बाँधकर उसने सब कुछ दे दिया।
पर सच ये था कि पट्टी बाँधकर उसने सब कुछ ले लिया। खुद से। अपने बेटों से।
एक माँ की नजर — जो बेटे को बिना कहे समझती है, जो चेहरे पर पढ़ लेती है, जो आँखों से गले लगाती है — वो कभी नहीं मिली थी उन सौ बच्चों को।
उन्हें एक माँ की आवाज मिली थी। उसका स्पर्श मिला था। उसका आशीर्वाद मिला था।
पर उसकी नजर नहीं मिली थी।
सूरज डूब रहा था।
कुरुक्षेत्र पर लाली फैल रही थी।
गांधारी धीरे-धीरे झुकी। उसने दुर्योधन के माथे पर हाथ रखा।
पहली बार उसके चेहरे को महसूस किया — आँखें खुली थीं।
उसकी आँखों में जो शक्ति थी — जो तप थी — वो सब रो पड़ी।
रेशम की पट्टी अभी भी उसके हाथ में थी। उसने उसे देखा।
फिर उसे जमीन पर रख दिया।
वहीं। कुरुक्षेत्र की माटी पर।
जो कभी उठाने का मन नहीं हुआ।
गांधारी जंगल चली गई। धृतराष्ट्र और कुंती के साथ। वहाँ एक दिन वन में आग लगी। वो तीनों नहीं भागे।
कहते हैं उस आग में गांधारी ने आँखें बंद नहीं कीं।
पहली बार — आँखें खुली रखीं।