Biography

लालम्मा के घर में एक चीज़ ऐसी थी जिसे वो कभी फेंक नहीं पाई।

Rajhussain · 22-May-2026 8 मिनट में पढ़ें
लालम्मा के घर में एक चीज़ ऐसी थी जिसे वो कभी फेंक नहीं पाई।

एक पुराना मिट्टी का तेल वाला लैंप। काला पड़ चुका शीशा, जंग खाई हुई बत्ती घुमाने वाली चकरी, और नीचे की टंकी में अब भी थोड़ा-सा सूखा हुआ केरोसिन, जो सालों से वैसे ही जमा था।

उसकी बेटी, सुमा, अब बाईस साल की थी और बेंगलुरु के एक कॉलेज में इंजीनियरिंग पढ़ती थी। जब वो छुट्टियों में घर आती, तो माँ का सामान समेटते हुए हर बार उस लैंप पर हाथ रुक जाता।

“अम्मा, ये अब क्यों रखा है?” वो हँसकर पूछती।

लालम्मा कुछ नहीं कहती। बस लैंप को फिर उसी कोने में रख देती, जहाँ वो पिछले दस साल से रखा था।

सुमा को पता था कि माँ नहीं बताएगी। पर सुमा को याद था।

बात 1996 की है। कर्नाटक के एक गाँव में, उडुपी से कुछ घंटे अंदर। बिजली के खंभे गाँव तक आए तो थे, पर तार उन पर कभी नहीं चढ़े। सरकारी फाइलों में गाँव “रोशन” था। हकीकत में सूरज ढलते ही सब कुछ काला हो जाता।

सुमा तब सात साल की थी।

उन दिनों उसकी पूरी शाम उसी लैंप के इर्द-गिर्द घूमती। सूरज डूबने से पहले माँ लैंप जलाती, क्योंकि माचिस की एक तीली बचानी होती थी। फिर सुमा और उसका छोटा भाई उसी एक छोटी-सी पीली लौ के पास सिमट जाते — एक किताब, दो बच्चे, और रोशनी का एक ऐसा घेरा जो हथेली से बड़ा नहीं था।

लौ हिलती तो अक्षर हिल जाते।

सुमा को सबसे बुरा वो वक़्त लगता जब हवा चलती। दरवाज़े की झिर्री से हवा आती, लौ काँपती, और कमरा एक पल के लिए पूरा अँधेरा हो जाता। माँ झट से हाथ की ओट कर देती।

और फिर वो खाँसी।

केरोसिन का धुआँ कमरे में भरता रहता — बारीक, काला, मीठा-सा। दिन भर वो छत पर एक काली परत जमा करता था, और रात भर सुमा के सीने में। सुबह उठती तो नाक के अंदर तक काला। कभी-कभी इतनी ज़ोर की खाँसी आती कि किताब बंद करनी पड़ती।

माँ कहती, “बस थोड़ा और पढ़ ले बेटा, फिर बुझा देंगे।”

“थोड़ा और” का मतलब था — जब तक केरोसिन है।

वो आदमी एक दोपहर आया था।

सुमा को उसका चेहरा ठीक से याद नहीं, पर एक बात याद है — वो गाँव वालों जैसा नहीं बोलता था, फिर भी उनके जैसा ही बैठ गया था, ज़मीन पर, चाय का गिलास हाथ में लिए।

वो किसी बड़ी कंपनी से नहीं लगता था। उसके पास कोई बड़ा वादा नहीं था। उसने सिर्फ़ एक छोटा-सा काला चौकोर पैनल दिखाया और कहा कि इसे छत पर रखेंगे, और इससे एक बल्ब जलेगा।

लालम्मा को यक़ीन नहीं हुआ।

“बिना तार के बल्ब?” उसने पूछा। “और जब बादल होंगे तब?”

आदमी हँसा नहीं। उसने सवाल को गंभीरता से लिया, जैसे वो सबसे ज़रूरी सवाल हो — और शायद था भी। उसने समझाया कि दिन भर सूरज की रोशनी एक डिब्बे में जमा होती रहेगी, जैसे घड़े में पानी, और रात को वही रोशनी बल्ब को मिलेगी।

फिर पैसे की बात आई। और यहीं असली अड़चन थी।

पैनल का दाम सुनकर लालम्मा का चेहरा उतर गया। इतने पैसे तो उसके पास साल भर में नहीं जुटते।

“एक बार में नहीं,” आदमी ने कहा। “हर महीने थोड़ा-थोड़ा। जितना आप अभी केरोसिन पर ख़र्च करती हैं, क़रीब उतना ही।”

लालम्मा चुप हो गई।

वो हर हफ़्ते केरोसिन पर पैसा ख़र्च करती थी और उसके बदले उसे मिलता था धुआँ, खाँसी, और एक ऐसी रोशनी जो हवा से डर जाती थी। यही पैसा अगर बल्ब के लिए लगे —

उसने हाँ कह दी। पति से पूछे बिना। पहली बार ज़िंदगी में कोई इतना बड़ा फ़ैसला उसने अकेले लिया था।

बल्ब जिस शाम पहली बार जला, सुमा को वो शाम पूरी तरह याद है।

आदमी ने स्विच दबाया। एक पल कुछ नहीं हुआ। फिर कमरा भर गया।

सिर्फ़ कमरा नहीं — कोने भर गए। छत दिख गई। दीवार पर माँ ने जो भगवान की पुरानी तस्वीर टाँगी थी, वो दिख गई, जिसे सुमा ने सालों से दिन की रोशनी में ही देखा था। भाई का चेहरा दिख गया — पूरा, साफ़, बिना काँपती परछाई के।

कोई नाचने नहीं लगा। कोई चिल्लाया नहीं।

बस — सब चुप हो गए।

माँ की आँखें भर आईं, पर वो रोई नहीं। उसने सिर्फ़ बल्ब की तरफ़ देखा, फिर सुमा की किताब की तरफ़, और धीरे से कहा — “अब पूरी पढ़ लेना।”

उस रात लैंप नहीं जला।

जो बात किसी ने उस शाम नहीं समझी, वो सालों बाद समझ आई।

बल्ब ने रोशनी नहीं दी थी। बल्ब ने वक़्त दिया था।

पहले सुमा की पढ़ाई की एक सीमा थी — केरोसिन की सीमा, धुएँ की सीमा, माँ के “बस थोड़ा और” की सीमा। अब वो सीमा हट गई। वो रात नौ बजे तक पढ़ सकती थी, दस बजे तक भी। जितना मन करे।

खाँसी धीरे-धीरे कम हुई। छत पर नई काली परत जमनी बंद हो गई।

पहले साल सुमा कक्षा में बीच में कहीं रहती थी। तीसरे साल वो अव्वल आई।

ये कोई जादू नहीं था। उसकी अध्यापिका ने एक बार कहा था कि सुमा हमेशा से तेज़ थी — बस उसके पास घंटे नहीं थे। अब घंटे थे।

बल्ब के साथ और भी चीज़ें बदलीं, जो किसी ने सोची नहीं थीं।

पड़ोस की औरतें शाम को लालम्मा के घर आने लगीं। पहले अँधेरा होते ही सब अपने-अपने घरों में बंद हो जाते थे। अब लालम्मा के आँगन में रोशनी थी, तो वहाँ बैठक जमने लगी। कोई सिलाई ले आती, कोई बच्चे का होमवर्क।

लालम्मा ने एक छोटा-सा काम शुरू किया — शाम को अगरबत्ती बनाना, औरतों के साथ बैठकर। पहले ये नामुमकिन था; अँधेरे में हाथ नहीं चलते थे। अब रोशनी थी, तो हाथ भी चले और थोड़ी कमाई भी हुई।

जो पैसा बल्ब की किस्त में जाता था, वो अब अगरबत्ती से वापस आने लगा। और कुछ बच भी जाता।

दो साल बाद घर में दूसरा बल्ब लगा — रसोई में।

सुमा को बेंगलुरु के कॉलेज में दाख़िला मिला, तो वो पहली बार सोच में पड़ी कि क्या पढ़े।

उसने एनर्जी इंजीनियरिंग चुनी।

जब प्रोफ़ेसर ने पहली क्लास में पूछा कि किसने सोलर सिस्टम पास से देखा है, तो पूरी क्लास में सिर्फ़ सुमा का हाथ उठा। बाक़ी सब शहर के बच्चे थे, जिनके घर में चौबीसों घंटे बिजली थी। उन्होंने सोलर पैनल किताबों में देखा था। सुमा ने उसे अपनी छत पर देखा था, अपने बचपन में।

उस दिन उसे पहली बार लगा कि गाँव से आना कोई कमी नहीं — एक नज़र है, जो शहर के बच्चों के पास नहीं।

जो आदमी उस दोपहर आया था, सुमा को बाद में पता चला कि वो अकेला नहीं था। उसके पीछे एक पूरी सोच थी।

एक इंजीनियर था, जिसने अमेरिका में पढ़ाई की थी और वहीं देखा था कि दूर के मुल्कों में ग़रीब लोग भी सोलर रोशनी इस्तेमाल कर रहे हैं। उसने सोचा — अगर वहाँ हो सकता है, तो भारत के गाँवों में क्यों नहीं?

लोग उससे कहते थे कि ग़रीब आदमी सोलर नहीं ख़रीद सकता, बहुत महँगा है। पर उसकी समझ अलग थी।

उसने कहा — ग़रीबी का मतलब ये नहीं कि आदमी सस्ती और घटिया चीज़ का हक़दार है। ग़रीब को भी अच्छी चीज़ चाहिए — बस उसे ख़रीदने का सही तरीक़ा चाहिए।

बेंगलुरु के एक रेहड़ी वाले ने उसे ज़िंदगी का सबसे बड़ा सबक़ सिखाया था। उसने कहा था — “तीन सौ रुपये महीना महँगा है, पर दस रुपये रोज़ ठीक है।”

बात वही पैसा था। फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि उसे कैसे चुकाया जाए।

इसी एक सोच ने हज़ारों घरों की शामें बदल दीं। एक के बाद एक गाँव, एक के बाद एक छत। कोई बड़ा एलान नहीं, कोई शोर नहीं — बस एक के बाद एक बल्ब जलते गए, और उन बल्बों के नीचे न जाने कितने बच्चे रात देर तक पढ़ते रहे।

अब सुमा छुट्टियों में घर आती है, तो छत पर वही पुराना पैनल है — थोड़ा फीका पड़ गया है, पर अब भी काम करता है।

और कोने में वो लैंप है, जिसे लालम्मा ने कभी फेंका नहीं।

एक रात सुमा ने माँ से फिर पूछा — “अम्मा सच बताओ, ये टूटा-फूटा लैंप क्यों रखा है? कितना पुराना हो गया।”

लालम्मा कुछ देर चुप रही। फिर बोली —

“ताकि याद रहे कि कितना अँधेरा था।”

सुमा कुछ नहीं बोली। उसने लैंप को उठाया, उस पर जमी धूल को आस्तीन से पोंछा, और वापस उसी कोने में रख दिया — पहले से थोड़ा सीधा करके।

बाहर छत पर पैनल चुपचाप दिन की रोशनी जमा कर रहा था। शाम को फिर बल्ब जलना था। सुमा को रात देर तक पढ़ना था — अब अपनी मर्ज़ी से।

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