Biography

सर्जरी की तारीख वाली पर्ची उस आदमी के हाथ में थी, और वो उसे ऐसे देख रहा था जैसे वो कोई विदेशी भाषा में लिखी हो।

Rajhussain · 24-May-2026 7 मिनट में पढ़ें
सर्जरी की तारीख वाली पर्ची उस आदमी के हाथ में थी, और वो उसे ऐसे देख रहा था जैसे वो कोई विदेशी भाषा में लिखी हो।

बैंगलोर के उस अस्पताल के बाहर, बरामदे में, वो आदमी बैठा था। चालीस के आसपास उम्र। चेहरे पर वो धूप जो खेत में सालों खड़े रहने से मिलती है, मशीन से नहीं। पैरों में हवाई चप्पल, जिसका एक फीता टूटकर दोबारा गाँठ से बाँधा गया था। उसकी पत्नी पास में खड़ी थी, पल्लू को उँगलियों में लपेटती-खोलती हुई।

डॉक्टर ने उससे कहा था कि उसके लड़के के दिल में एक छेद है। जन्म से। और अगर वो छेद बंद नहीं हुआ, तो बच्चा शायद अगली सर्दी न देख पाए।

फिर डॉक्टर ने ख़र्च बताया था।

वो आदमी गणित नहीं जानता था, पर ज़मीन का हिसाब जानता था। उसने मन ही मन जोड़ा — दो एकड़ खेत, अगर पूरा बेच दे। बैल। पत्नी के कान की बालियाँ, जो शादी में माँ ने दी थीं। और तब भी पूरा नहीं पड़ता था।

वो उठा नहीं। बस बैठा रहा। जैसे उठने का कोई फ़ायदा ही न हो।


ऐसे ही किसी आदमी को देखकर एक सर्जन के मन में एक सवाल अटक गया था, और वो सवाल कई सालों तक उसके पीछा करता रहा।

सवाल आसान था। इतना आसान कि किसी ने उससे पहले शायद उसे गंभीरता से पूछा ही नहीं था:

दिल का ऑपरेशन इतना महँगा क्यों है?

उस सर्जन का नाम था देवी प्रसाद शेट्टी।

कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ ज़िले के एक छोटे से गाँव किन्निगोली में, 1953 में, नौ बच्चों के परिवार में आठवें नंबर पर पैदा हुआ एक लड़का। बचपन में, जब वो स्कूल में था, एक दिन उसके शिक्षक ने क्लास में आकर एक ख़बर सुनाई थी — दक्षिण अफ्रीका के एक डॉक्टर, क्रिस्टियान बार्नार्ड ने, दुनिया का पहला दिल प्रत्यारोपण किया है। एक इंसान का दिल, दूसरे इंसान के सीने में।

उस दिन उस लड़के ने तय कर लिया कि वो दिल का डॉक्टर बनेगा।

बना भी। पढ़ाई कर्नाटक में, फिर इंग्लैंड में। लंदन के गाय’स हॉस्पिटल में बरसों काम किया। हाथ में वो हुनर आ गया जो दुनिया में बहुत कम लोगों के पास होता है — किसी का सीना खोलकर, उसके धड़कते दिल को सुधारकर, उसे वापस सिल देना।

पर हुनर ने उसे वो सवाल नहीं दिया। सवाल उसे मरीज़ों ने दिया।

देश लौटने के बाद वो ऐसे लोगों से रोज़ मिलने लगा — किसान, मज़दूर, छोटी दुकानों वाले — जिनके बच्चों या जिनके अपने दिल में कोई गड़बड़ी थी, और जिनके पास इलाज के पैसे नहीं थे। डॉक्टर बता देता था कि क्या करना है। पर बताने और कर पाने के बीच में जो खाई थी, उसे लाखों रुपए ही पाट सकते थे। और लाखों रुपए उनके पास नहीं थे।

शेट्टी एक बात से और भी परेशान थे। मदर टेरेसा कुछ समय उनकी मरीज़ रही थीं — वो उनके निजी डॉक्टरों में से एक थे। उनके साथ बिताए वक़्त ने एक चीज़ उनके अंदर बैठा दी थी: कि इलाज सिर्फ़ अमीरों का अधिकार नहीं हो सकता।

पर दान से कितनों का इलाज होगा? एक का? सौ का? देश में हर साल लाखों लोगों को दिल की सर्जरी की ज़रूरत थी, और दान की बाल्टी से समंदर नहीं भरता।

यहीं पर शेट्टी ने वो सोच निकाली जो आगे चलकर सबकुछ बदलने वाली थी। बाद में उन्होंने इसे एक वाक्य में कहा, और ये वाक्य अब दुनिया भर के बिज़नेस स्कूलों में पढ़ाया जाता है:

“दान को बड़ा नहीं किया जा सकता। पर अच्छे बिज़नेस के सिद्धांतों को किया जा सकता है।”


सोचिए एक आम सर्जन की तरह नहीं, एक हिसाब लगाने वाले आदमी की तरह।

अगर एक अस्पताल दिन में एक या दो दिल की सर्जरी करता है, तो हर सर्जरी पर अस्पताल का पूरा ख़र्च — इमारत, मशीनें, बिजली, स्टाफ़ — बँटता है सिर्फ़ एक या दो मरीज़ों पर। ख़र्च आसमान छूता है।

पर अगर वही अस्पताल दिन में तीस सर्जरी करे? तो वही ख़र्च तीस मरीज़ों पर बँट जाता है। हर सर्जरी सस्ती हो जाती है। और जो सर्जन दिन में चार दिल छूता है, उसके हाथ उससे ज़्यादा मँझते हैं जो हफ़्ते में एक छूता है — मतलब सर्जरी सिर्फ़ सस्ती नहीं, बेहतर भी हो जाती है।

ये कोई जादू नहीं था। ये वही तरकीब थी जिससे फ़ोर्ड ने कार सस्ती की थी — एक-एक करके नहीं, हज़ारों एक साथ। बस शेट्टी इसे कारों पर नहीं, दिलों पर लगा रहे थे। बाद में अख़बारों ने उन्हें यही नाम दिया — दिल की सर्जरी का हेनरी फ़ोर्ड।

2001 में, बैंगलोर के पास, शेट्टी ने नारायणा हृदयालय की नींव रखी। एक ऐसा अस्पताल जो छोटा नहीं सोचता था। बड़ा सोचता था — इसलिए कि बड़े पैमाने पर ही सस्ता हो सकता था।

शुरुआत में यहाँ रोज़ इतनी सर्जरी होने लगीं जितनी अमेरिका के बड़े-बड़े अस्पताल पूरे हफ़्ते में नहीं करते थे। कोई अमीर मरीज़ पूरा पैसा देता। कोई किसान, जिसके पास कुछ नहीं था, उसका इलाज भी होता — कभी बहुत कम पैसों में, कभी मुफ़्त। अमीर का पैसा गरीब के इलाज को थाम लेता था। पूरा हिसाब एक-दूसरे को सँभाल लेता था।

और शेट्टी सिर्फ़ अस्पताल बनाकर नहीं रुके। 2003 में उन्होंने कर्नाटक के किसानों के लिए एक बीमा योजना बनाई — यशस्विनी। महीने के चंद रुपयों में, गाँव का एक किसान सैकड़ों तरह की सर्जरी का हक़ पा जाता था। वही किसान, जो कभी अस्पताल के बरामदे में पर्ची हाथ में लिए बैठा रह जाता था — अब उसके हाथ में एक रास्ता था।


जिस बच्चे के दिल में छेद था, उसके पिता को आख़िर वो रास्ता मिला या नहीं — ये कहानी एक नहीं, हज़ारों परिवारों की है, और हर परिवार का अंत अलग रहा होगा। पर जो बात पक्की है, वो ये कि देश में अब ऐसी जगहें थीं जहाँ एक गरीब आदमी अपने बच्चे का दिल ठीक करवाने की उम्मीद लेकर जा सकता था — और अक्सर वो उम्मीद टूटती नहीं थी।

देवी शेट्टी ने अपने हाथों से पंद्रह हज़ार से ज़्यादा दिल के ऑपरेशन किए हैं — इनमें भारत का पहला नवजात शिशु का दिल का ऑपरेशन भी शामिल है, जो उन्होंने 1992 में किया था। और जो अस्पताल उन्होंने खड़ा किया, वो आज पूरे भारत में फैले 47 स्वास्थ्य केंद्रों का एक जाल बन चुका है, जहाँ मिलकर एक लाख से ज़्यादा दिल की सर्जरी हो चुकी हैं।

भारत में आज दिल के बायपास का ऑपरेशन उतने में हो जाता है जितने में पश्चिम के देशों में शायद एक रात अस्पताल में रुकने का बिल भी न बने। और शेट्टी अब भी रुके नहीं हैं — उनका कहना है कि वो इस ख़र्च को और नीचे लाना चाहते हैं, इतना नीचे कि कोई बच्चा सिर्फ़ इसलिए न मरे क्योंकि उसका बाप गरीब था।


उस सवाल पर वापस आते हैं, जिससे ये सब शुरू हुआ था।

दिल का ऑपरेशन इतना महँगा क्यों है?

ज़्यादातर लोग ये सवाल पूछते हैं, फिर कंधे उचकाकर आगे बढ़ जाते हैं। दुनिया ऐसी ही है, मान लेते हैं।

देवी शेट्टी ने मान नहीं लिया। उन्होंने उस सवाल को पकड़े रखा, बरसों, जब तक उसका जवाब एक अस्पताल की शक्ल में खड़ा नहीं हो गया।

शायद असली कहानी यही है — हुनर तो उनके पास था ही, हज़ारों दिल सिल देने का। पर जो चीज़ अलग थी, वो ये कि उन्होंने एक गरीब आदमी के हाथ में पकड़ी पर्ची को देखकर मुँह नहीं फेरा। उन्होंने पूछा — ऐसा क्यों है? — और फिर उस सवाल का जवाब ढूँढने में अपनी पूरी ज़िंदगी लगा दी।

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